शनिवार, 18 सितंबर 2010

मुझे याद करोगे ?



"आनन्द, आओ दूध पी लो....." रुचि ने बाल्कनी से जोर से आवाज लगाई.
शाम के लगभग सात बजने वाले थे. सूर्य डूब चुका था. पश्चिमी क्षितिज पर लालिमा बिखरी हुई थी. बाहर अभी उजाला था. चारो तरफ़ बने मकानो के बीच छोटे से पार्क में बच्चे खेल रहे थे. उनमें आनन्द भी था.
"अभी आता हूँ..." आनन्द ने रुचि की ओर देखे बिना ही उत्तर दिया और खेल जारी रखा.
"जल्दी आ जाओ..." कहकर रुचि अन्दर चली गयी.

रूचि के बुलावे से आनन्द समझ चुका था कि उसके खेल का समय अब समाप्त हो चुका है. उसे जाना पड़ेगा. जाकर दूध पीकर उसे पढ़ने बैठना होगा. रुचि ने उसके हर काम का समय निर्धारित कर रखा है. लौटते समय रास्ते मे सोचने लगा कि जल्दी से परीक्षाएँ समाप्त हो जाएँ तो वह गाँव चला जाएगा और फिर पूरे दिन खेल ही खेल. कोई भी पढ़ने को नहीं कहेगा. उसकी छ्ठी कक्षा की परीक्षाएँ चल रही थीं.

आनन्द इस कस्बे में पिछले तीन सालों से रह रहा है. उसके पिताजी यहाँ एक बैंक में मैनेजर हैं. उसका गाँव यहाँ से मात्र चालीस किलोमीटर दूर है. तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई उसने वहीं की थी. गाँव में अच्छी पढ़ाई न होने के कारण पिताजी उसे और माँ को यहाँ साथ ले आए. यहाँ रहते हुए तीन साल बीत जाने के बाद भी उसका मन अपने गाँव में ही बसता है. चूँकि गाँव बहुत दूर नहीं है इसलिए स्कूल मे जब भी छुट्टियाँ होती हैं वह माँ के साथ गाँव चला जाता है.

जब पढ़ने बैठा तो उसे याद आया- आज तो मौसी की शादी है. बारात आने वाली होगी. लोग नए नए कपड़े पहन कर तैयार हो रहे होंगे. मेरी परीक्षा नहीं होती तो मैं भी आज वहीं होता. कितना मजा आता. मन में खीझ हुई की शादी के समय ही परीक्षा क्यों शुरु हो गई. सोचते सोचते वह उदास हो गया.

रुचि दरवाजे पर खड़ी होकर देख रही थी कि आनन्द की नज़र किताबों से हटकर शून्य में खो गई है.

"क्या सोच रहे हो आनन्द?" पास आकर पूछा.

"कुछ नहीं" आनन्द ने सिर हिलाते हुए कहा. पढ़ने का उपक्रम करने लगा. नज़रें नीचे किताब पर गड़ा दी.

रुचि ने उसके चेहरे की उदासी को देख लिया था. वह वहीं टेबल से टिक कर खड़ी हो गई और आनन्द के चेहरे को अपने हाथों से ऊपर उठाते हुये पूछा, "क्या बात है, बोलो न...मम्मी की याद आ रही है? " आनन्द को माख आ गया और उसकी आँखें भरभरा गयीं.

"हे, ऐसा नहीं करते आनन्द" वह कुर्सी के पास उससे सटकर खड़ी हो गई. उसके सिर को अपने सीने से लगाती हुई और आँसुओं को हाथों से पोछती हुई बोली, "रोते नहीं...अरे दो-तीन दिन की तो बात है. एग्जाम्स खत्म होते ही तुम्हारे पापा तुम्हें लिवा जाएँगे." थोड़ी देर में वह सामान्य हो गया. रुचि उससे कल की परीक्षा के बारे मे बातें करने लगी.

आनन्द के सगी मौसी की शादी थी. माता-पिता का जाना आवश्यक था. परीक्षा के कारण आनन्द नहीं जा सका और उसे पिताजी के एक डाक्टर मित्र के यहाँ रुकना पड़ा. दोनो परिवारों के बीच बहुत ही मधुर सम्बन्ध था.

़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़


रुचि की जब बारहवीं की परीक्षाएँ समाप्त हुई तो दीदी के यहाँ चली आई थी। आने के पहले बहुत उत्साहित थी, किन्तु इस छोटे से कस्बे में आकर उसका सारा उत्साह जल्दी ही समाप्त हो गया. वह बड़े शहर में पली बढ़ी थी. पिताजी अच्छे खासे रईस थे. वहाँ उनका काफी बड़ा बंगला था. यहाँ न तो कहीं घूमने फिरने लायक है और न ही उसकी सहेलियाँ हैं. कस्बे में कुल मिलाकर एक सिनेमाघर था जिसकी कुर्सियों पर तीन घन्टे बैठना भी अपने आप में एक कसरत थी. सारा दिन तीन कमरों के इस छोटे से प्लैट में बिताना उसे जल्द ही ऊबाऊ लगने लगा. जीजाजी सुबह दस बजे तक अपने क्लीनिक चले जाते और दीदी घर के काम में लग जाती. रुचि टेलीविजन देखती, दीदी से गप्पें मारती, मन होता तो दीदी के काम में हाथ बँटा देती. वैसे बहुत अधिक काम नहीं था. घर में तीन लोग ही थे . दीदी की शादी दो साल पहले ही हुई थी.


उस दिन जब गाँव जाने से पहले आनन्द के पिता उसे यहाँ छोड़ने आए थे तब पहली बार रुचि आनन्द से मिली थी. गोल-मटोल चेहरा, गोरा चिट्टा रंग. छोटी छोटी मासूम आँखों में थोड़ी सी उदासी थी. पहली बार माँ से अलग रहना था शायद इसी कारण. सभी लोग ड्राइंग रूम में बैठकर चाय पीते हुए बातें कर रहे थे. सामने सेन्ट्रल टेबल पर चाय के साथ का नाश्ता रखा हुआ था. आनन्द चुप चाप बैठा हुआ था. उससे सम्बन्धित कोई भी बात कही या पूछी जाती तो सिर हिलाकर या सिर्फ़ हाँ-ना में उत्तर दे देता. आन्टी जी के बार बार कहने पर उसने एक समोसा उठा लिया और धीरे धीरे खाने लगा. डाक्टर साहब की पत्नी को वह आन्टी जी कहकर बुलाता था.

"आनन्द तो बहुत शर्मीला है" रुचि ने कहा. वह उसे काफ़ी देर से गौर से देख रही थी.

"अभी इसके पापा यहाँ हैं न इसलिए ऐसा दिख रहा है" आन्टी जी ने हँसते हुए कहा, "एक बार उन्हे जाने दो फिर देखना कि कितना शर्मीला है"

सभी लोग हँसने लगे. आनन्द थोड़ा झेंप गया. फिर आन्टी जी ने बात को सम्भालते हुए उसकी झेंप मिटाने के लिये कहा, " नहीं नहीं, आनन्द बहुत ही अच्छा बच्चा है...पढ़ाई मे भी बहुत तेज है."

वास्तव में आनन्द दूसरों से बहुत कम बातचीत करता था. लेकिन उसके अन्दर बाल-सुलभ चंचलता और शरारत काफी थी जिससे आन्टी जी अवगत थीं. दोनों लोगों के घरों मे बहुत दूरी न थी. एक दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता था. हाँ, वह अपने पापा के सामने वह बहुत शान्त रहता था.

आनन्द का बिस्तर रुचि के कमरे में लगा दिया गया और यह तय हुआ कि वह डाक्टर साहब के स्टडी रूम में अपनी पढ़ाई करेगा. उसमें कुर्सी- मेज भी था जिससे पढ़ने में सुविधा होगी. वैसे भी डाक्टर साहब उस कमरे का उपयोग कभी कभार ही दोपहर के खाने के बाद घन्टे- दो घन्टे के लिए करते थे. रात में क्लीनिक से लौटते लौटते १०-११ बज जाता था.

शाम को आनन्द स्टडी-रूम में पढ़ रहा था. कल उसकी परीक्षा थी. रुचि उत्सुकता वश कमरे में आ गई. बस यह देखने की वह क्या कर रहा है.

"कल किस सब्जेक्ट का पेपर है?" रुचि उसके पास आकर खड़ी हो गई थी.

"साइंस का"

"सब तैयार कर लिए हो ?"

उसने मुस्करा दिया. उस मुस्कराहट का अर्थ हाँ और ना दोनो ही था. वास्तव में उसके समझ में नही आया कि क्या कहूँ. सब तैयार होने का अर्थ हुआ कि प्रत्येक प्रश्न बिल्कुल भर्राटे से याद होना.

"अच्छा देखूँ कितना तैयार है" रुचि ने उसका नोट-बुक लेते हुए कहा, "मैं क्वेस्चन्स पूछूँ ?

आनन्द ने सहमति में सिर हिला दिया. रुचि उससे प्रश्न पूछने लगी. आनन्द को काफी कुछ याद था. फिर भी कई जगहों पर भूल जा रहा था. रुचि उसे एक बार अच्छे से सारा दुहराने को कहकर वहाँ से चली गई.


लगभग नौ बजे जब रुचि और आनन्द खाना खा चुके तब रुचि ने आनन्द से पूछा, "अभी पढ़ोगे या नींद आ रही है". आनन्द ने कहा कि अभी वह थोड़ी देर और पढ़ेगा और स्टडी-रूम में चला गया. रुचि आधे-एक घन्टे दीदी के साथ टेलीविजन देखती रही फिर उसे नींद आने लगी और वह अपने कमरे में सोने चली गई. जाते हुए आनन्द से कहकर गई कि अब काफ़ी देर हो चुकी है और वह भी आकर सो जाए. सुबह उठना पड़ेगा.

रात में रुचि की नीद अचानक खुल गई. देखा कि आनन्द अपने बिस्तर पर नहीं है. सामने दीवार घड़ी में दो बज रहे थे. कहाँ चला गया, सोचते हुए वह बिस्तर से उतरी. क्या अभी तक पढ़ रहा है? वह स्टडी रूम में गई. आनन्द कुर्सी पर बैठा हुआ था और उसका सिर मेज पर टिका था. कमरे की लाइट जल रही थी. हे भगवान, यह तो यहीं पर सो गया. वह उसे जगाने के लिए उसके पास आ गई. आनन्द का बायाँ हाथ मेज पर फैला हुआ था जिस पर उसने अपना बायाँ गाल टिका रहा था. दाहिना हाथ नीचे लटक रहा था. वह गहरी नींद में सो रहा था. उसके मासूम चेहरे को देखकर रुचि को एकदम से उसे जगाने की इच्छा नहीं हुई. जी चाहा कि ऐसे सोते ही वह बिस्तर पर पहुँच जाय. किन्तु वह इतना छोटा नहीं था कि वह उसे गोद में उठाकर ले जा पाती. और वहाँ इस तरह से सोते छोड़ना तो बिल्कुल भी ठीक नहीं था. उसने जगाने के लिए पहले आवाज दी. पर वह नहीं जागा. फिर उसका कन्धा पकड़कर झँझोड़ते हुए जगाने लगी, " आनन्द, आनन्द...". एक बार वह कुलबुलाकर जगा. अपना सिर उठाया. अपने दूसरे हाथ से रुचि का हाथ कन्धे से हटाकर दोनो हाथों के ऊपर मेज पर सिर टिकाकर सो गया. अभी भी नींद में था.

"ओह, यह लड़का....हे उठो....आनन्द...उठो..." रुचि ने उसके कन्धों को पकड़कर ऊपर उठाया और पीठ को कुर्सी की पीठ पर टिका दिया. उसका सिर बायीं तरफ़ झुक गया. आँखें अभी भी बन्द थी. रुचि ने उसके चेहरे को हाथों में पकड़कर हिलाते हुए जगाने लगी. उसने अपनी आँखें थोड़ी सी खोली और अर्धनिद्रा में बड़बड़ाया,"क्या है". रुचि ने देखा कि वह थोड़ा जगा है तो उसके कन्धों को पकड़कर खड़ा करते हुए बोली, " आनन्द, उठो...चलो बिस्तर पर सोओ...चलो उठो.." वह कनमनाकर उठ खड़ा हुआ. रुचि उसे अर्धनिद्रा के हालत में ही सहारा देकर कमरे तक ले आई और उसके बिस्तर पर सुला दिया. बिस्तर पर पड़ते ही वह फिर से गहरी निद्रा में सो गया.

सुबह आन्टी जी ने आनन्द को जल्दी जगाकर स्कूल के लिए तैयार किया. आठ बजे से उसकी परीक्षा थी. दोपहर में खाने के मेज पर रुचि रात की बात सबको बताकर खूब हँसी. पहले तो उसने आनन्द से पूछा, "रात में तुम कितने बजे सोने आए थे". आनन्द सोचने लगा. उसे कुछ याद ही नहीं आ रहा था. फिर रुचि ने बताया कि वह कुर्सी पर ही सो गया था. वह उसे किसी तरह से कमरे में ले आयी.

दूसरे दिन शाम को जब वह पढ़ रहा था तब उसे याद आया कि जूते दिन में गन्दे हो गये थे. बिना पालिश किए जूते अगर पहन कर वह जाएगा तो मैम डाटेंगी. अब समस्या यह थी कि जूते कैसे पालिश होंगे? उसने पहले कभी पालिश नहीं किया था. किसी को कहने में झिझक आ रही थी. कुछ देर सोचता रहा. फिर सोचा कि खुद ही कर लेता हूँ. मम्मी को देखा है पालिश करते हुए. बरामदे में एक स्टैंड पर सभी के जूते चप्पल रखे जाते थे. उसने देखा था वहीं पर पालिश की डिबिया और ब्रश रखा था. वह उठकर बरामदे मे गया और वहीं बैठकर पालिश करने लगा. आन्टी जी रसोई में थीं और रुचि टेलीविजन देख रही थी.

कुछ देर बाद रुचि किसी काम से बाहर बरामदे में आई. उसने देखा कि आनन्द जूते पालिश करने की कोशिश कर रहा है. उसके दोनों हाथों में पालिश लगी हुई है. चेहरे से पसीना चू रहा है. काफ़ी गर्मी थी. वहाँ कोई पंखा भी नहीं था. पसीने को पोछने में चेहरे पर भी पालिश लग गयी थी.

"अरे, ये क्या कर रहे हो.... ?" रुचि की आवाज सुनकर उसने चौंक कर सिर उठाया. फिर बोला, " जूते गन्दे हो गये थे."

"अच्छा उसे छोड़ो...चलो अन्दर...देखो क्या शकल बना ली है"

तभी आन्टी जी भी आ गयीं. आनन्द का हाल देखकर उन्हें बुरा लगा. उन्होने रुचि से कहा," तुम जूते पालिश कर दो, मैं इसका हाथ-मुँह धुलवाती हूँ. हाथ मुँह धुलवाते समय उन्होनें आनन्द को प्यार से हिदायद दी- बेटा, तुम्हें जो भी जरुरत हो मुझसे कह दिया करो. बाद में उन्होने रुचि से कहा," रूचि, तुम देख लिया करो कि उसे किसी चीज की जरुरत तो नहीं है. वह कहते हुए झिझकता है"

एक-दो दिन में रुचि ने आनन्द की पूरी जिम्मेदारी ले ली. वही उसे स्कूल के लिए तैयार करती. उसके बाल सँवारती, जूते पालिश करती, टाई बाँधती. शाम को उसके पाठ याद करवाती. उसके साथ ही खाना खाती. यह सब करना उसे अच्छा लगने लगा. उसने आनन्द के हर काम, पढ़ने, खेलने, खाने-पीने, सोने-जागने का समय निर्धारित कर दिया. अधिकतर समय उसके साथ ही रहती.

पहले दिन जब शाम को आनन्द खाना खा रहा था रुचि ने देखा कि उसने तीन रोटियाँ खाईं. उसे तीन की संख्या ठीक नहीं लगी थी. दूसरे दिन जब फ़िर आनन्द ने तीन रोटियाँ ही खाई तो उसने पूछा, "तुम हमेशा तीन रोटियाँ ही खाते हो ?" उसने हाँ कहा. फिर रुचि ने कहा कि तीन की संख्या शुभ नहीं होती और उसे एक और रोटी खाने को कहा. लेकिन आनन्द का पेट भर गया था और उसने मना कर दिया. फिर रुचि ने एक तरकीब निकाली. जब वह तीन रोटियाँ खा लेता तो उसे अपने मे से एक कौर खिलाती. पहली बार आनन्द को उसके हाथ से खाते हुए हिचकिचाहट हुई थी. क्योंकि दूसरे के हाथ से उसे खाने की आदत नहीं थी. किन्तु जल्दी ही वह बात उसके लिए सामान्य हो गई.

आनन्द की परीक्षाओं के बीच में एक-दो दिन का अवकाश होता था. छुट्टी के दिन प्रायः दोपहर में जब वह पढ़ाई से उबने लगता था तो रुचि उसके साथ लूडो या कैरम खेलती. जिससे उसका मन बहल जाय. कभी कभी झगड़ा भी हो जाता. अधिकतर झगडे़ का कारण आनन्द की बाल-सुलभ बेईमानी होती.

उस दिन दोनों लूडो खेल रहे थे. एक बार जब वह हारने लगा तो रुचि की नज़र बचाकर उसने अपनी गोटियाँ आगे बढ़ा दी. रुचि को पता चल गया और उसने यह कहते हुए खेलना बन्द दिया," मैं तुम्हारे साथ नहीं खेलूँगी, तुम हमेशा चीटिंग करते हो". वह अपने बिस्तर पर लेट गई और अपनी एक बाँह मोड़कर माथे पर रख लिया. उसकी आँखें उसके हाथ से ढँक गईं. आनन्द ने उसे उकसाने के लिए कहा, "हारने लगीं तो भाग गईं ".

"मुझे चीटर के साथ नहीं खेलना है" रुचि लेटे लेटे ही कहा.

"मैनें कोई चीटिंग नहीं की...आपने ठीक से देखा ही नहीं, मेरी गोटियाँ पहले से ही वहीं थीं " आनन्द का मन खेलने को कर रहा था. वह आगे बोला, "अच्छा चलिए फिर से खेलते हैं"

रुचि चुप रही. कुछ भी नहीं बोली. आनन्द उठकर उसके पास आ गया. "चलिए, फिर से खेलते हैं" उसे लगा की रुचि सच में गुस्सा हो गई है. उसने अपनी गलती स्वीकार की,"अच्छा अब चीटिंग नहीं करूँगा." रुचि अब भी चुप ही रही.

फिर आनन्द ने उसका हाथ माथे से हटाते हुए कहा,"चलिए न..."

" मैं अब नहीं खेलूँगी, मुझे नींद आ रही है", रुचि ने आँखें बन्द किए हुए ही कहा.

आनन्द उसके पास बैठकर उसे मनाने लगा, "नींद नहीं आ रही है...आप झूठ-मूठ की सो रही हैं" रुचि की पलकें अपनी उँगलियों से खोलने लगा. रुचि ने मुस्करा दिया. फिर हँसते हुए उठ बैठी और खेलने के लिए तैयार हो गई.

आनन्द के आने के बाद रुचि का भी मन यहाँ लगने लगा था. आनन्द भी उससे खूब घुल-मिल गया था और हर छोटी बड़ी बात उसे बताता. जब वह स्कूल चला जाता तो रुचि को कुछ खाली खाली सा लगने लगता. वह स्कूल से लौटता तो बाल्कनी में खड़ी उसकी राह देख रही होती. शाम को जब आनन्द पार्क में खेलता रहता तो वह बाल्कनी में खड़ी होकर देखती रहती. अँधेरा होने से पहले रोज वहीं से आवाज लगा कर बुलाती, " आनन्द, आओ दूध पी लो....." और आनन्द समझ जाता कि अब खेलने का समय खत्म हो चुका है.

उस दिन आनन्द की छुट्टी थी. लगभग दस बजे वह अपने एक दोस्त राजीव के घर चला गया यह कहकर कि एक-दो घंटे में वापस आ जाएगा. राजीव उसकी कक्षा में ही पढ़ता था और उसके घर भी आनंद और उसके माता-पिता का आना-जाना था और आंटी जी से भी जान-पहचान थी। उसका घर इनके घर से थोड़ी दूर था।

दोपहर हो गई लेकिन आनन्द वापस नहीं आया. रुचि को एक अजीब बेचैनी सी होने लगी. वह बार बार बाल्कनी तक जाकर देख आती. आन्टी जी ने कहा,"तुम क्यों इतना परेशान हो रही हो. वहीं रुक गया होगा. शाम तक आ जाएगा। राजीव की मम्मी ने उसे इतनी धूप में नहीं आने दिया होगा।"

"बोलकर तो गया था कि एक-दो घन्टे में आ जाएगा. कल उसका पेपर भी है."

"कल से वह तैयारी कर तो रहा है. सुबह भी उसने पढ़ाई की थी. और फिर राजीव के यहाँ उसकी मम्मी भी हैं. तुम बेकार में परेशान हो रही हो, वह शाम तक लौट आयेगा."

बात सिर्फ़ पढा़ई की नहीं थी, यह रुचि को पता था. अगले दिन उसकी गणित की परीक्षा थी जो उसका सबसे पसंदीदा विषय था और उसने पूरा तैयार कर लिया था, यह बात रुचि जानती थी. वास्तव में उसका इतने लम्बे समय तक न होना रुचि को खल रहा था.

शाम को जब वह लौटा तो रुचि उस पर एकदम से बिफर पड़ी, "तुम सारे दिन घूमते रहे...कह कर गये थे कि एक-दो घन्टे में लौट आउँगा...यह कोई तरीका है.... कल पेपर है और तुम्हें पढ़ने-लिखने का कोई होश नहीं है" यह उसके अपने मन की खीझ थी.

"कोई बात नहीं, अभी वह पढ़ लेगा. तुम उसे डाँटो मत" आन्टी जी को रुचि का डाँटना अच्छा नहीं लगा. फिर आनन्द से पूछीं , "भूख लगी है? कुछ खाओगे?" आनन्द ने नहीं मे सिर हिला दिया. "क्यों, दोपहर को ही तो खाए होगे न...अच्छा बिस्किट खा लो और दूध पी लो ". फिर उन्होनें रुचि को कहा कि वह आनन्द को दूध और बिस्किट दे दे.

रुचि के डाँटने के कारण आनन्द का चेहरा उतर गया था. वह स्टडी रूम में चला गया और किताब खोलकर बैठ गया. रुचि दूध लेकर आई. उसने चुपचाप दूध पी लिया. वह उससे बात करने की कोशिश कर रही थी. किन्तु कुछ भी पूछने पर या तो वह चुप रहता या हाँ-ना मे सिर हिला देता. रुचि को पछतावा होने लगा कि बेकार मे ही उसने डाँट दिया था. वह उसे मनाने लगी. उसे लाकर चाकलेट दिया. उसके पेट मे गुदगुदी की. थोड़ी देर मे वह मान गया और सामान्य हो गया.

़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़


देखते देखते एक सप्ताह बीत गया. अब आनन्द के एक विषय की परीक्षा और बाकी है. कल उसकी परीक्षा खत्म हो जायेगी. दो-तीन दिन बाद उसके पिता जी उसे गाँव लिवा ले जाएँगे. इतने दिनो में आनन्द कभी भी अपने घर वालों को याद करके उदास नहीं हुआ था. लेकिन जब आज रुचि ने पूछा कि" मम्मी की याद आ रही है?" तो अनायस ही उसकी आँखें भर आई थीं. रात मे सोते समय रुचि सोचने लगी कि तीन दिन बाद आनन्द चला जायेगा. सब कुछ खाली खाली सा हो जाएगा. बहुत देर तक उसे नींद नहीं आई.


अगले दिन जब आनन्द स्कूल से लौटा तो रुचि अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी थी. उसके सिर मे दर्द हो रहा था. डाक्टर साहब की डिस्पेंसरी थोड़ी दूर थी. बाहर बहुत धूप थी. इतनी धूप में रिक्शे से रूचि को डिस्पेंसरी ले जाना आंटी जी को ठीक नहीं लगा. इसलिए घर पर पड़ी सिर दर्द की गोली दे दी थी. यह सोचकर कि डाक्टर साहब दोपहर में खाना खाने के लिए लगभग दो बजे घर आएँगे ही तब देख लेंगे. अभी कुछ आराम था.


आनन्द आज लौटते समय बहुत खुश था. आज अन्तिम परीक्षा थी. रुचि ने उससे कहा था," जब तुम्हारे एग्जाम्स खत्म हो जाएँगे तब हम खूब मस्ती करेंगे." उसे सिनेमा दिखाने का वादा भी किया था. और सबसे बड़ी बात यह कि अब उसे पढ़ने लिए कोई नहीं कहेगा. खेलने से कोई नहीं मना करेगा. जब घर पहुँचा तो आन्टी जी ने दरवाजा खोला. प्राय: रुचि उसे बाल्कनी में खड़ी मिलती और जब वह ऊपर आता तो उसके कपड़े बदलवाती, उसकी परीक्षा के बारे में पूछती, फिर उसे खाना खिलाती. आन्टी जी उसके साथ ही कमरे में आ गईं. उन्होने आनन्द से कहा, " बेटा, कपड़े चेंज कर के चलो खाना खा लो" फिर उन्होने रुचि से पूछा,"कैसा लग रहा है अभी ?". रुचि ने कहा कि अभी ठीक है .

"क्या हो गया ? " आनन्द ने पूछा

"सिर में दर्द हो रहा है" आन्टी जी ने जवाब दिया. फिर बोलीं ,"मैं खाना लगाती हूँ, तुम दोनो लोग आ जाओ". वह चली गईं.

आनन्द रुचि के पास आ गया और बोला,"बहुत तेज दर्द कर रहा है?"

"नहीं अब तो ठीक लग रहा है..." रुचि ने उठकर बैठते हुए कहा, "तुम्हारा पेपर कैसा हुआ?"

"अच्छा हुआ...आप डिस्पेंसरी गईं थीं?..दवाई लीं" उसने पूछा.

"डिस्पेंसरी कैसे जाती, बाहर इतनी धूप है. और अधिक सिर-दर्द होने लगता....घर पर ही दवा ले ली थी." फिर मुस्कराते हुए आगे बोली, " अगर तुम बड़े होते तो मुझे बाइक पर बिठाकर डिस्पेंसरी ले जाते न"

"हाँ..." आनन्द ने आँखें बड़ी बड़ी करते हुए कहा," मैं अभी भी आपको ले जा सकता था अगर मेरी साइकिल होती तो."

"तो तुम मुझे साईकिल पर बिठा कर ले जाते ?...सो स्वीट ! " रुचि हँसने लगी. "अच्छा चलो, अब खाना खाते हैं."

अगले तीन दिनो में रुचि और आनन्द ने खूब मस्ती की. रुचि उसे सिनेमा भी ले गई. बाजार मे जादू का खेल लगा था. एक दिन उसे वह दिखाने ले गई. रुचि ने उसके लिए कई कामिक्स खरीदा. दोपहर भर लूडो और कैरम खेलते, टेलीविजन देखते. उसने रुचि को लट्टू नचाना सिखाया. रोज शाम को दोनो चाट खाने जाते.

तीन दिन पलक झपकते ही निकल गए. आनंद के पापा आज उसे ले जाने के लिए आ गए हैं। डिनर करते समय आंटी जी ने कहा -भाईसाहब आज आनंद को यहीं रहने दीजिये, घर पर भाभी जी तो हैं नहीं। सुबह यहीं से लिवाकर गाँव चले जाईयेगा।

रात के ग्यारह बज रहे होंगे. रूचि की आँखों में नीद नहीं थी. "कल वह चला जाएगा", रूचि बिस्तर पर लेती हुई सोच रही थी. पता नहीं क्यों एक व्यग्रता उसके मन को घेरे हुए थी. ऐसा लग रहा था कि कुछ छूट रहा हो. वह अपने बिस्तर से उठी और लाईट जलाई. आनंद गहरी नींद में सो रहा था. वह उसके बिस्तर के पास गई. कुछ देर तक खड़ी होकर उसके मासूम चेहरे को एक टक निहारती रही, फिर झुक कर उसके माथे को चूमा और उसके सिरहाने बैठ गई. देर तक अपनी उँगलियों को उसके माथे, बालों और चेहरे पर फिराती रही जैसे कि वह उन्हें अपने अन्दर समेट लेना चाहती हो. फिर उसके हाथ को अपने हाथों में लेकर उँगलियों पर न जाने क्या गिनने लगी. उसकी आँखों से आँसू बह निकले. कितनी देर तक यूँ ही बैठी रोती रही. कब नीद आ गई पता नहीं चला. बैठे बैठे ही दीवार से पीठ टिकाकर सो गई. जब आँख खुली तो करीब चार बज चुके थे. आनंद का हाथ उसकी गोद में था. वह उसके पैरों से लिपटकर सो रहा था. रूचि ने उसका हाथ हटाकर उसे दूसरी करवट सुलाया और अपने बिस्तर पर आकर लेट गई.

सुबह जाते समय रुचि ने उसे ढ़ेर सारी चाकलेट दी. उसके माथे को चूमा और पूछा, "मुझे याद करोगे ?" कहते हुए उसकी आँखें डबडबा गईं और गला रूँध गया. आनन्द को समझ में नहीं आया कि क्या कहे. ऐसा प्रश्न उसके सामने पहली बार आया था. उसने हाँ में सिर हिला दिया.

आनन्द की लगभग डेढ़ महीने की गर्मी की छुट्टियाँ थी. गाँव जाकर वह अपने दोस्तों के साथ खेल-कूद और मौज-मस्ती में लीन हो गया. उसे शायद ही कभी रुचि की याद आई होगी. छुट्टियाँ बिताकर जब वह लौटा तो एक दिन अपनी माँ के साथ आन्टी जी के घर गया. तब तक रुचि जा चुकी थी. जब आनन्द के परीक्षा के समय बातें होने लगी तो आन्टी जी ने हँसते हुए कहा, "आनन्द, जब तुम चले गए तो रुचि एकदम पागल हो गई थी. वह शाम को बाल्कनी में खड़ी होकर तुम्हें आवाज लगाती थी कि आनन्द आओ दूध पी लो"

बारह साल के आनन्द के लिए यह समझना कठिन था कि वह ऐसा क्यों करती थी।


़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! उम्दा पोस्ट!

    जवाब देंहटाएं
  2. such main aapki likhi ye kahaani dil ko chhu gai ...

    जवाब देंहटाएं
  3. काबिले तारीफ
    बहुत सुंदर लिखा आपने
    🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

    जवाब देंहटाएं