<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1495878999715631673</id><updated>2012-01-10T03:23:10.809-08:00</updated><title type='text'>कहानियों के आँगन में</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08654132523168281005</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_FKlnHW05pkA/SUtrfDU6MYI/AAAAAAAAAA4/TP9ixHWw7DI/S220/DSC00425.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>4</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1495878999715631673.post-6167111122457267307</id><published>2010-09-21T02:28:00.000-07:00</published><updated>2010-09-21T02:30:00.574-07:00</updated><title type='text'>गोपाल</title><content type='html'>नदी का कछार. &lt;br /&gt;किनारे से दस फर्लांग ऊपर दो चर्मकर्मी नदी में बहकर आए मरे हुए बैल का चमड़ा निकाल रहे थे. उनके पास ही बैठकर गोपाल उन्हे काम करता हुआ देख रहा था. सुबह के लगभग दस बज रहे होंगे.&lt;br /&gt;"का रे गोपला ! इहाँ आकर बैठा है" दस कदम दूर से ही चन्दू चीखते हुए गोपाल की ओर झपटे. आवाज सुनते ही गोपाल स्प्रिंग की तरह उठ खड़ा हुआ और पनपनाकर भागा. चन्दू उसके पीछे दौड़े और चालीस-पचास कदम की दौड़ के बाद उसे दबोच लिया. ग्यारह साल के गोपाल के कदम, बीस साल के बड़े भाई के लम्बे लम्बे कदमों को ज्यादा नहीं छका सके. पकड़ते ही लात-घूसों से पीटना शुरु कर दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’उहाँ चच्चा दो घन्टा तक जोह कर चले गए और तू भागकर हियाँ सिवान में मटरगस्ती कर रहा है." चन्दू लगातार पीटते हुए गोपाल को घर ले जाने लगे," सुबह से खोज खोज कर हलकान हो गए हैं सब लोग....पढे़गा नहीं तो क्या तू भी यही चमड़ा निकालेगा " जितना बोल रहे थे उतना ही पीट रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुँचा तो बाबू झाड़ू से पशुऒं का गोबर साफ करे थे. गोपाल को देखते ही उसकी तरफ लपके और उसी झाड़ू से दस झाड़ू मारे होंगे कि दलान से दौड़कर आई माई ने बीच बचाव किया, "का अब जान से ही मार डालेंगे"&lt;br /&gt;"इसका खाना-पीना सब बन्द करो...दुसाध कहीं का..." बाबू ने एक झाड़ू और लगाया. माई गोपाल को खींचकर आँगन में ले गईं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार खाना गोपाल के लिए नित्य की क्रिया थी. इसलिए असर तभी तक रहता था जब तक पिटाई होती थी. पिटाई का असर कभी भी उसके दिलो-दिमाग तक नहीं पहुँचता था. दिन भर में मार खाने के दो चार कारण तो पैदा कर ही लेता था. कभी किसी की हरी भरी बिरवाई को जड़ से उखाड़ देता, कभी किसी के मुर्गे को उसके ही चारा मशीन में काटकर छोड़ देता, कभी किसी का बाहर सूख रहा कपड़ा फाड़कर दो टुकड़े कर देता . लोग कहते थे कि उसे जो कुत्ते के काटने पर चौदह सुईयाँ लगी थीं उसकी गर्मी दिमाग में चढ़ गई थी. आस-पड़ोस में अगर किसी का कुछ भी नुकसान होता तो सबसे पहला शक गोपाल पर जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबू ने कहाँ तक पढ़ाई की थी यह तो वही जानते होंगे. हाँ, चन्दू नवीं कक्षा के आगे नहीं बढ़ पाए थे और दो प्रयासों के विफल होने के बाद  बाबू के साथ खेती बाडी में लग गए थे. पूरे परिवार में एक ही पढे़ लिखे व्यक्ति थे-चाचा. चाचा ने स्नातक  की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और गाँव से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक कस्बे के हाई स्कूल में अध्यापक की नौकरी कर रहे थे. हर सोमवार को जाते थे और शनिवार को वापस गाँव आ जाते थे. बाकी के दिन वहीं रहते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठ-नौ साल का होने पर गोपाल को गाँव के स्कूल मे भेजा गया. लेकिन वह दो साल में अक्षर भी ठीक से नहीं पहचान सका. चन्दू ने एक दिन बाबूजी के सामने ही चाचा से कहा, "चच्चा, गोपाल को वहीं अपने साथ ले जाते तो कुछ पढ़ना लिखना सीख जाता." बाबू ने भी चन्दू की बात का समर्थन किया. हालाँकि चाचा जानते थे कि पढ़ना-लिखना गोपाल के वश की बात नहीं है. फिर भी भाई की बात की खातिर ले जाने को तैयार हो गए. तय हुआ कि अगले सोमवार को गोपाल उनके साथ जाएगा. लेकिन सोमवार की सुबह गोपाल घर से गायब हो गया. चाचा अकेले ही चले गए. बाद में ढ़ूँढ़ने पर गोपाल भुट्टे के खेत में मचान पर सोता हुआ मिला था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज दूसरा सोमवार था. गोपाल को चाचा के साथ कस्बे में भेजने का पहला प्रयास विफल हो चुका था इसलिए इस बार रविवार की शाम से ही गोपाल की चौकसी की जा रही थी कि वह कहीं भाग न जाए. रात में चन्दू ने उसे अपनी चारपाई पर सुलाया. सुबह तक भागने का कोई भी मौका हाथ नहीं लग पाया था. माई ने सुबह के नाश्ते और दोपहर के खाने के लिए पूरियाँ बना दी थीं. गोपाल को कपड़ा पहनाकर तैयार कर दिया गया. सब लोग निश्चिंत हो गए कि अब तो चला ही आएगा. चाचा और गोपाल तैयार होकर दरवाजे पर आ गए. बाकी सब लोग भी विदा करने के लिए बाहर आ गए. दोनो लोग जब चलने को हुए तो गोपाल ने कहा, "प्यास लगी है. मैं पानी पीकर आता हूँ." वह घर के अन्दर चला गया. किसी को जरा सा भी सन्देह नहीं हुआ कि वह भाग जाएगा. जब काफी देर बाद नहीं लौटा तो घर के अन्दर देखा गया. आँगन के पीछे का दरवाजा खुला था. गोपाल फिर गायब. चन्दू सारा गाँव ढूँढ कर जब कछार पहुँचे तो वहाँ चर्मकर्मियों के साथ गोपाल मिला था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धुनाई तो पहली बार भी हुई थी जब वह खेत में मचान पर मिला था लेकिन आज कुछ ज्यादा ही मरम्मत हो गई थी. माई उसे खाना खिलाते हुए समझा रही थीं, " काहे ऐसा करते हो...तुम्हारी भलाई के लिए ही तो किया जा रहा है...इतना मार खाते हो फिर भी बाज नहीं आते...कायदे से चले क्यों नहीं जाते". गोपाल चुपचाप सुनता रहा फिर खाना खाकर उठते हुए बोला, " मुझे कहीं नहीं जाना है. मैं यहीं रहूँगा." कहते हुए घर से बाहर चला गया. माई ने अपना सिर पकड़ लिया,"हे भगवान क्या होगा इस लड़के का !".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले सोमवार को गोपाल के जाने की फिर सारी तैयारियाँ हुईं. इस बार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा गया. गाँव नदी के किनारे था. नदी पार करके तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद सड़क आती थी जहाँ से जाने के लिए बस मिलती थी. जब दोनो लोगों ने नदी पार कर ली तब चाचा ने राहत की साँस ली कि अब कोई खतरा नहीं है. दो किलोमीटर के बाद रास्ते में बुढ़वा बाबा का मन्दिर आता था. मन्दिर से सटा हुआ एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था. पास में एक कुँआ भी था जिस पर बाल्टी और डोर पड़ी रहती थी. आने जाने वाले लोग बरगद के चबूतरे पर सुस्ताते थे. कुँए से पानी निकालकर पीते थे. एक तरह से वह जगह पैदल यात्रियों के लिए बीच का एक पड़ाव बन गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी पीकर चाचा और गोपाल बरगद के चबूतरे पर बैठकर सुस्ता रहे थे. तभी गोपाल ने कहा, "मुझे निबटान लगी है".&lt;br /&gt;"सामने अरहर के खेत में चले जाओ". चाचा ने कहा. गोपाल जाने लगा तो उन्होने शंका जाहिर की, "भाग तो नहीं जाएगा ?" हालाँकि इसकी सम्भावना कम थी. अकेले इतनी दूर कैसे भाग कर जा सकेगा. इतनी हिम्मत तो नहीं कर पाएगा. फिर भी किसी भी सम्भावना से बचने के लिए वे उसके खेत में घुसते ही बोले "बस वहीं बैठ जा. ज्यादा अन्दर मत जा. मैं तुम्हें यहाँ से देख रहा हूँ. गोपाल वहीं बैठ गया. अरहर के तीन चार पौधों के पीछे चाचा को उसकी शर्ट दिखाई दे रही थी. तभी गाँव के कुछ परिचित व्यक्ति आ गए. चाचा का ध्यान थोड़ी देर के लिए गोपाल से हटा और गोपाल गायब.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो चाचा ने आवाज लगाई लेकिन जब उसने कोई उत्तर नहीं दिया तो उन्हें चिन्ता होने लगी. अनजान जगह थी. गाँव मे तो सब कुछ उसका देखा हुआ था और फिर वहाँ हर आदमी एक दूसरे को जानता था. यहाँ तो वह कहीं भटक सकता है. चाचा खेत के अन्दर थोड़ी दूर तक गए. लेकिन वह कहीं नहीं दिखा. आवाज लगाते रहे. कहते रहे," तुम बाहर आ जाओ, मैं कुछ नहीं कहूँगा. तुम्हें मारूँगा नहीं". अरहर के खेतों के पीछे ईंख के खेत लगे थे. पूरा सिवान भरा पड़ा था. उसे अकेले ढ़ूँढ़ पाना बहुत मुश्किल था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेत के अन्दर से गोपाल की निगाह बराबर चाचा के ऊपर थी. वह सोच रहा था कि थोड़ी देर तक इंतजार करके हर बार की तरह वे चले जाएँगे और वह वापस घर चला जाएगा. लेकिन इस स्थिति में चाचा शहर जा भी कैसे सकते थे. वे गाँव की ओर चल दिए. गोपाल ने जब उन्हें गाँव की ओर जाते देखा तो वह खेतों के अन्दर अन्दर ही उल्टी दिशा में चल दिया. चाचा गाँव आ गए. चन्दू और उसके कुछ दोस्त सईकिल लेकर गोपाल को ढूँढ़ने निकल पड़े. तीन-चार बजे तक चन्दू गोपाल को लेकर घर पहुँचे. चन्दू ने बताया कि जब वह बस स्टैंड पर पहुँचे तो वहाँ गोपाल बैठा हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उस दिन चाचा का जाना भी सम्भव न हो सका. अगले दिन चन्दू ने गोपाल को साईकिल से बस स्टैंड तक छोड़ा. चौथे प्रयास में गोपाल कस्बे पहुँच गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोपाल को मात्र ककहरा पता था. मात्रा और मिलावट भी पढ पाना उसके लिए मुश्किल था. चूँकि उम्र काफी हो चुकी थी इसलिए चाचा ने उसका नाम दूसरी कक्षा में लिखा दिया. किताब कापी सब खरीद दी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोपाल अब पढ़ाई करने लगा है. ऐसा चन्दू लोगों से कहते थे. वास्तव में गोपाल को अभी भी शब्द  ज्ञान नहीं हो पाया था. हाँ तीन-चार सप्ताह में इतना अवश्य हुआ था कि कक्षा में मास्टर जी ने पीट पीट कर उसे "शेर और चूहे" वाली कविता जुबानी याद करा दी थी. एक दिन चन्दू उसकी किताब लेकर बैठे और उसे पढने के लिए बोले- वह वही पाठ खोलकर भर्राटे से पढ़ने लगा. चन्दू को लगा कि अब यह पढ़-लिख जाएगा.&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;एक दिन जब चाचा अपने स्कूल से साढ़े चार बजे कमरे पर लौटे गोपाल नहीं था. उसका स्कूल पास में ही था और वह रोज चाचा से पहले ही कमरे पर पहुँच जाता था. उन्होने कमरे में नज़र दौड़ाई. सारा सामान यथावत पड़ा हुआ था. उसका स्कूल-बैग उसके बिस्तर पर था. उन्होने सोचा कि शायद बाहर खेल रहा होगा. हालाँकि उन्होंने हिदायत दे रखी थी कि उनके आने के बाद ही वह खेलने जाएगा. लेकिन बच्चा है चला गया होगा. यह सोचकर उन्होने कप़ड़े बदले और बाज़ार से कुछ सामान लाने चले गए. सोचे कि जब तक बाज़र से लौटेंगे तब तक वह भी आ जाएगा. उसके पास भी कमरे की एक चाभी रहती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक घन्टे बाद जब वे बाजार से लौटे तब भी गोपाल वापस नहीं आया था. अब उन्हें थोड़ी चिन्ता हुई. वे बाहर गए और पास के मैदान में खेल रहे बच्चों से पूछताछ की. पता चला कि गोपाल को किसी ने भी शाम को नहीं देखा था. अब चाचा की चिंता बढ़ गई. आस-पास सबसे पूछताछ किए. किसी ने भी गोपाल को नहीं देखा था. अब गोपाल की खोज शुरू हो गई. जब बस्ती के आस-पास कहीं नहीं मिला तो बाज़ार में खोजा गया. चाचा वहाँ पिछले सात-आठ साल से पढ़ा रहे थे इसलिए सभी लोग उन्हें जानते थे. खोजने में कई लोग शामिल हो गए. उनके एक मित्र अपनी मोटरसाईकिल लेकर उनके साथ खोजने में जुट गए. दशहरा आने वाला था. जगह जगह रामलीला हो रहा था. सब जगह जाकर लाउडस्पीकर पर उद्घोषणा करवाई गई. गोपाल का हुलिया बताया गया. सारी रात खोज चलती रही. लेकिन गोपाल का कहीं पता नहीं चला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन चाचा ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखवा दी. शाम तक भी गोपाल का कोई पता नहीं चला. किसी मित्र के कहने पर चाचा एक ज्योतिषी के पास भी गए. चाचा का खाना-पीना, सोना सब हराम हो गया. बहुत बड़ा कलंक लग गया. भाई का लड़का गायब हो गया. उसे यहाँ लाकर बहुत बड़ी गलती कर ली. पढ़कर वह कौन सा कलक्टर बन जाता. बहुत होता तो पाँचवीं पास कर लेता. जब बीच रास्ते बुढ़वा बाबा से ही भाग गया था तभी उसे लाने को मना कर देना चाहिए था. रह रह कर यह खयाल भी आता कि पता नहीं कहाँ होगा, किस हाल में होगा. कहाँ उसे खाना-पीना मिला होगा. कहीं भूखे ही पड़ा पटपटा रहा होगा. कहीं गलत हाथों में न पड़ गया हो. अनेक तरह की शंका-कुशंका मन में चल रही थी. दूसरी रात भी बीत गई लेकिन गोपाल का कहीं कोई पता नहीं चला. पुलिस को भी कोई सुराग न मिल सका. अब चाचा ने उम्मीद छोड़ दी. घर पर बताना तो जरूरी है.  भारी मन से चाचा गाँव चल दिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव में सवेरे जब करमकल्ली भरिन सिवान से घास काटकर लौटी तो माई से बोली, "माई, हमने गोपाल को सिवान में देखा...हमें देखते ही वे ऊँख के खेत में छिप गए थे."&lt;br /&gt;"तेरा दिमाग चल गया है..." माई ने गुस्से से कहा, "वो तो अपने चच्चा के साथ शहर पढ़ने गया है...तूने किसी और को देखा होगा"&lt;br /&gt;"नहीं माई हम सच कह रहे हैं वही थे...बरम बाबा की कसम...हमें पहिचानने में कोई गलती नहीं हुई है...." करमकली ने पूरे विश्वास से कहा. तभी चन्दू वहाँ आ गए थे. उसने आगे कहा, "आप चन्दू भईया को भेज कर दिखवा लीजिए." करमकली इतने विश्वास से कह रही थी तो शंका सभी के मन में उभर आई. चन्दू देखने चले गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा जब दोपहर तक गाँव पहुँचे, रास्ते में ही उन्हें खबर मिल गई कि गोपाल आज सुबह ईंख के खेत में मिला था. घर आए तो द्वार पर गोपाल मुँह लटकाए बैठा था. उसका मुँह सूजा हुआ था. बाबू और चन्दू  के अलावा गाँव के कुछ और लोग भी थे. यही बात चल रही थी कि गोपाल उतनी दूर से अकेले आया कैसे. यह बात कभी कोई नहीं जान सका कि वह कस्बे से भागकर गाँव कैसे पहुँचा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब चाचा की हिम्मत गोपाल को फिर से ले जाने की नहीं हुई. गोपाल की पढ़ाई का प्रयास खत्म हो चुका था. अब वह सारे दिन मटरगस्ती करने के लिए स्वतन्त्र हो गया था. महीने भर की पढ़ाई-लिखाई से इतना हो सका था कि गोपाल ने अपना नाम लिखना सीख लिया था. वह भी एक मात्रा के बिना - गोपल.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1495878999715631673-6167111122457267307?l=kahaniyan-pratap.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/feeds/6167111122457267307/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2010/09/blog-post_21.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/6167111122457267307'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/6167111122457267307'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2010/09/blog-post_21.html' title='गोपाल'/><author><name>प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08654132523168281005</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_FKlnHW05pkA/SUtrfDU6MYI/AAAAAAAAAA4/TP9ixHWw7DI/S220/DSC00425.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1495878999715631673.post-5888648119132154331</id><published>2010-09-18T02:23:00.000-07:00</published><updated>2012-01-10T03:21:10.217-08:00</updated><title type='text'>मुझे याद करोगे ?</title><content type='html'>"आनन्द, आओ दूध पी लो....." रुचि ने बाल्कनी मे खड़े होकर जोर से आवाज लगाई.&lt;br /&gt;शाम के लगभग सात बजने वाले थे. सूर्य डूब चुका था. पश्चिमी क्षितिज पर लालिमा बिखरी हुई थी. बाहर अभी उजाला था. चारो तरफ़ बने मकानो के बीच छोटे से पार्क में बच्चे खेल रहे थे. उनमें आनन्द भी था.&lt;br /&gt;"अभी आता हूँ..." आनन्द ने रुचि की ओर देखे बिना ही उत्तर दिया और फिर खेलने लगा.&lt;br /&gt;"जल्दी आ जाओ..." कहकर रुचि अन्दर चली गयी.&lt;br /&gt;आनन्द समझ चुका था कि उसके खेलने का समय समाप्त हो चुका है. अब उसे जाना पड़ेगा. जाकर दूध पीकर उसे पढ़ने बैठना पड़ेगा. रुचि ने उसके हर काम का समय निर्धारित कर रखा है. लौटते समय रास्ते मे सोचने लगा कि जल्दी से परीक्षाएँ समाप्त हो जाएँ तो वह गाँव चला जाएगा और फिर पूरे दिन खेल ही खेल. कोई भी पढ़ने को नहीं कहेगा. उसकी छ्ठी कक्षा की परीक्षाएँ चल रही थीं.&lt;br /&gt;आनन्द इस कस्बे में पिछले तीन सालों से रह रहा है. उसके पिताजी यहाँ एक बैंक में मैनेजर हैं. उसका गाँव यहाँ से मात्र चालीस किलोमीटर दूर है. तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई उसने वहीं की थी. गाँव में अच्छी पढ़ाई न होने के कारण पिताजी उसे और माँ को यहाँ साथ ले आए. यहाँ रहते हुए तीन साल बीत जाने के बाद भी उसका मन अपने गाँव में ही बसता है. चूँकि गाँव बहुत दूर नहीं है इसलिए स्कूल मे जब भी छुट्टियाँ होती हैं वह माँ के साथ गाँव चला जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पढ़ने बैठा तो उसे याद आया- आज तो मौसी की शादी है. बारात आने वाली होगी. लोग नए नए कपड़े पहन कर तैयार होंगे. मेरी परीक्षा नहीं होती तो मैं भी आज वहीं होता. कितना मजा आता. मन में खीझ हुई की शादी के समय ही परीक्षा क्यों शुरु हो गई. सोचते सोचते वह उदास हो गया. रुचि दरवाजे पर खड़ी होकर देख रही थी कि आनन्द की नज़र किताबों से हटकर शून्य में खो गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या सोच रहे हो आनन्द?" पास आकर पूछा.&lt;br /&gt;"कुछ नहीं" आनन्द ने सिर हिलाते हुए कहा. पढ़ने का उपक्रम करने लगा. नज़रें नीचे किताब पर गड़ा दी.&lt;br /&gt;रुचि ने उसके चेहरे की उदासी को देख लिया था. वह वहीं टेबल से टिक कर खड़ी हो गई और आनन्द के चेहरे को अपने हाथों से ऊपर उठाते हुये पूछा, "क्या बात है, बोलो न...मम्मी की याद आ रही है? " आनन्द को माख आ गया और उसकी आँखें भरभरा गयीं.&lt;br /&gt;"हे, ऐसा नहीं करते आनन्द" वह कुर्सी के पास उससे सटकर खड़ी हो गई. उसके सिर को अपने सीने से लगाती हुई,आँसुओं को हाथों से पोछती हुई बोली, "रोते नहीं...अरे दो-तीन दिन की तो बात है.  एग्जाम्स खत्म होते ही तुम्हारे पापा तुम्हें लिवा जाएँगे." &lt;br /&gt;थोड़ी देर में वह सामान्य हो गया. रुचि उससे कल की परीक्षा के बारे मे बातें करने लगी.&lt;br /&gt;आनन्द के सगी मौसी की शादी थी. माता-पिता का जाना आवश्यक था. परीक्षा के कारण आनन्द नहीं जा सका और उसे पिताजी के एक डाक्टर मित्र के यहाँ रुकना पड़ा. दोनो परिवारों के बीच बहुत ही मधुर सम्बन्ध था. &lt;br /&gt;़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुचि की जब बारहवीं की परीक्षाएँ समाप्त हुई तो दीदी के यहाँ चली आई. आने के पहले बहुत उत्साहित थी किन्तु इस छोटे से कस्बे में आकर सारा उत्साह जल्दी ही समाप्त हो गया. वह बड़े शहर में  पली बढ़ी थी. पिताजी अच्छे खासे रईस थे. वहाँ उनका काफी बड़ा बंगला था. यहाँ न तो कहीं घूमने फिरने लायक है और न ही उसकी सहेलियाँ हैं. कस्बे में कुल मिलाकर एक सिनेमाघर था जिसकी कुर्सियों पर तीन घन्टे बैठना भी अपने आप में एक कसरत थी. सारा दिन तीन कमरों के इस छोटे से प्लैट में बिताना उसे जल्द ही ऊबाऊ लगने लगा. जीजाजी सुबह दस बजे तक अपने क्लीनिक चले जाते और दीदी घर के काम में लग जाती. रुचि टेलीविजन देखती, दीदी से गप्पें मारती, मन होता तो दीदी के काम में हाथ बँटा देती. वैसे बहुत अधिक काम नहीं था. घर में तीन लोग ही थे . दीदी की शादी दो साल पहले ही हुई थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन जब गाँव जाने से पहले आनन्द के पिता उसे यहाँ छोड़ने आए थे तब पहली बार रुचि आनन्द से मिली थी. गोल-मटोल चेहरा, गोरा चिट्टा रंग. मोटा तो नहीं कहा जा सकता फिर भी भरा हुआ शरीर था. छोटी छोटी मासूम आँखों में थोड़ी सी उदासी थी. पहली बार माँ से अलग रहना था शायद इसी कारण. सभी लोग ड्राइंग रूम में बैठकर चाय पीते हुए बातें कर रहे थे. सामने सेन्ट्रल टेबल पर चाय के साथ का नाश्ता रखा हुआ था. आनन्द चुप चाप बैठा हुआ था. उससे सम्बन्धित कोई भी बात कही या पूछी जाती तो सिर हिलाकर या सिर्फ़ हाँ-ना में उत्तर दे देता. आन्टी जी के बार बार कहने पर उसने एक समोसा उठा लिया और धीरे धीरे खाने लगा. डाक्टर साहब की पत्नी को वह आन्टी जी कहकर बुलाता था. &lt;br /&gt;"आनन्द तो बहुत शर्मीला है"  रुचि ने कहा. वह उसे काफ़ी देर से गौर से देख रही थी.&lt;br /&gt;"अभी इसके पापा यहाँ हैं न इसलिए ऐसा दिख रहा है" आन्टी जी ने हँसते हुए कहा, "एक बार उन्हे जाने दो फिर देखना कि कितना शर्मीला है"&lt;br /&gt;सभी लोग हँसने लगे. आनन्द थोड़ा झेंप गया. फिर आन्टी जी ने बात को सम्भालते हुए उसकी झेंप मिटाने के लिये कहा, " नहीं नहीं, आनन्द बहुत ही अच्छा बच्चा है...पढ़ाई मे भी बहुत तेज है." &lt;br /&gt;वास्तव में आनन्द दूसरों से बहुत कम बातचीत करता था. लेकिन उसके अन्दर बाल-सुलभ चंचलता और शरारत काफी थी जिससे आन्टी जी अवगत थीं. दोनों लोगों के घरों मे बहुत दूरी न थी. एक दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता था. हाँ, वह अपने पापा के सामने वह बहुत शान्त रहता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनन्द का बिस्तर रुचि के कमरे में लगा दिया गया और यह तय हुआ कि वह डाक्टर साहब के स्टडी रूम में अपनी पढ़ाई करेगा. उसमें कुर्सी- मेज भी था जिससे पढ़ने में सुविधा होगी. वैसे भी डाक्टर साहब उस कमरे का उपयोग कभी कभार ही दोपहर के खाने के बाद घन्टे- दो घन्टे के लिए करते थे. रात में क्लीनिक लौटते लौटते १०-११ बज जाता था. &lt;br /&gt;शाम को आनन्द स्टडी-रूम में पढ़ रहा था. कल उसकी परीक्षा थी. रुचि उत्सुकता वश कमरे में आ गई. बस यह देखने की वह क्या कर रहा है.&lt;br /&gt;"कल किस सब्जेक्ट का पेपर है?" रुचि उसके पास आकर खड़ी हो गई थी.&lt;br /&gt;"साइंस का" &lt;br /&gt;"सब तैयार कर लिए हो ?"&lt;br /&gt;उसने मुस्करा दिया. उस मुस्कराहट का अर्थ हाँ और ना दोनो ही था. वास्तव में उसके समझ में नही आया कि क्या कहूँ. सब तैयार होने का अर्थ हुआ कि प्रत्येक प्रश्न बिल्कुल भर्राटे से याद होना. &lt;br /&gt;"अच्छा देखूँ कितना तैयार है" रुचि ने उसका नोट-बुक लेते हुए कहा, "मैं क्वेस्चन्स पूछूँ ?  &lt;br /&gt;आनन्द ने सहमति में सिर हिला दिया. रुचि उससे प्रश्न पूछने लगी. आनन्द को काफी कुछ याद था. फिर भी कई जगहों पर भूल जा रहा था. रुचि उसे एक बार अच्छे से सारा दुहराने को कहकर वहाँ से चली गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग नौ बजे जब रुचि और आनन्द खाना खा चुके तब रुचि ने आनन्द से पूछा, "अभी पढ़ोगे या नींद आ रही है". आनन्द ने कहा कि अभी वह थोड़ी देर और पढ़ेगा और स्टडी-रूम में चला गया. रुचि आधे-एक घन्टे दीदी के साथ टेलीविजन देखती रही फिर उसे नींद आने लगी और वह अपने कमरे में सोने चली गई. जाते हुए आनन्द से कहकर गई कि अब काफ़ी देर हो चुकी है और वह भी आकर सो जाए. सुबह उठना पड़ेगा.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात में रुचि की नीद अचानक खुल गई. देखा कि आनन्द अपने बिस्तर पर नहीं है. सामने दीवार घड़ी में दो बज रहे थे. कहाँ चला गया, सोचते हुए वह बिस्तर से उतरी. क्या अभी तक पढ़ रहा है? वह स्टडी रूम में गई. आनन्द कुर्सी पर बैठा हुआ था और उसका सिर मेज पर टिका था. कमरे की लाइट जल रही थी. हे भगवान, यह तो यहीं पर सो गया. वह उसे जगाने के लिए उसके पास आ गई. आनन्द का बायाँ हाथ मेज पर फैला हुआ था जिस पर उसने अपना बायाँ गाल टिका रहा था. दाहिना हाथ नीचे लटक रहा था. वह गहरी नींद में सो रहा था. उसके मासूम चेहरे को देखकर रुचि को एकदम से उसे जगाने की इच्छा नहीं हुई. जी चाहा कि ऐसे सोते ही वह बिस्तर पर पहुँच जाय. किन्तु वह इतना छोटा नहीं था कि वह उसे गोद में उठाकर ले जा पाती. और वहाँ इस तरह से सोते छोड़ना तो बिल्कुल भी ठीक नहीं था. उसने जगाने के लिए पहले आवाज दी. पर वह नहीं जागा. फिर उसका कन्धा पकड़कर झँझोड़ते हुए जगाने लगी, " आनन्द, आनन्द...". एक बार वह कुलबुलाकर जगा. अपना सिर उठाया. अपने दूसरे हाथ से रुचि का हाथ कन्धे से हटाकर दोनो हाथों के ऊपर मेज पर सिर टिकाकर सो गया. अभी भी नींद में था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओह, यह लड़का....हे उठो....आनन्द...उठो..." रुचि ने उसके कन्धों को पकड़कर ऊपर उठाया और पीठ को कुर्सी की पीठ पर टिका दिया. उसका सिर बायीं तरफ़ झुक गया. आँखें अभी भी बन्द थी. रुचि ने उसके चेहरे को हाथों में पकड़कर हिलाते हुए जगाने लगी. उसने अपनी आँखें थोड़ी सी खोली और अर्धनिद्रा में बड़बड़ाया,"क्या है". रुचि ने देखा कि वह थोड़ा जगा है तो उसके कन्धों को पकड़कर खड़ा करते हुए बोली, " आनन्द, उठो...चलो बिस्तर पर सोओ...चलो उठो.." वह कनमनाकर उठ खड़ा हुआ. रुचि उसे अर्धनिद्रा के हालत में ही सहारा देकर कमरे तक ले आई और उसके बिस्तर पर सुला दिया. बिस्तर पर पड़ते ही वह फिर से गहरी निद्रा में सो गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह आन्टी जी ने आनन्द को जल्दी जगाकर स्कूल के लिए तैयार किया. आठ बजे से उसकी परीक्षा थी. दोपहर में खाने के मेज पर रुचि रात की बात सबको बताकर खूब हँसी. पहले तो उसने आनन्द से पूछा, "रात में तुम कितने बजे सोने आए थे". आनन्द सोचने लगा. उसे कुछ याद ही नहीं आ रहा था. फिर रुचि ने बताया कि वह कुर्सी पर ही सो गया था. वह उसे किसी तरह से कमरे में ले आयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन शाम को जब वह पढ़ रहा था तब उसे याद आया कि जूते दिन में गन्दे हो गये थे. बिना पालिश किए जूते अगर पहन कर वह जाएगा तो मैम डाटेंगी. अब समस्या यह थी कि जूते कैसे पालिश होंगे? उसने पहले कभी पालिश नहीं किया था. किसी को कहने में झिझक आ रही थी. कुछ देर सोचता रहा. फिर सोचा कि खुद ही कर लेता हूँ. मम्मी को देखा है पालिश करते हुए. बरामदे में एक स्टैंड पर सभी के जूते चप्पल रखे जाते थे. उसने देखा था वहीं पर पालिश की डिबिया और ब्रश रखा था. वह उठकर बरामदे मे गया और वहीं बैठकर पालिश करने लगा. आन्टी जी रसोई में थीं और रुचि टेलीविजन देख रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर बाद रुचि किसी काम से बाहर बरामदे में आई. उसने देखा कि आनन्द जूते पालिश करने की कोशिश कर रहा है. उसके दोनों हाथों में पालिश लगी हुई है. चेहरे से पसीना चू रहा है. काफ़ी गर्मी थी. वहाँ कोई पंखा भी नहीं था. पसीने को पोछने में चेहरे पर भी पालिश लग गयी थी. &lt;br /&gt;"अरे, ये क्या कर रहे हो.... ?" रुचि की आवाज सुनकर उसने चौंक कर सिर उठाया. फिर बोला, " जूते गन्दे हो गये थे." &lt;br /&gt;"अच्छा उसे छोड़ो...चलो अन्दर...देखो क्या शकल बना ली है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी आन्टी जी भी आ गयीं. आनन्द का हाल देखकर उन्हें बुरा लगा. उन्होने रुचि से कहा," तुम जूते पालिश कर दो, मैं इसका हाथ-मुँह धुलवाती हूँ. हाथ मुँह धुलवाते समय उन्होनें आनन्द को प्यार से हिदायद दी- बेटा, तुम्हें जो भी जरुरत हो तो मुझसे कह दिया करो. बाद में उन्होने रुचि से कहा," रूचि, तुम देख लिया करो कि उसे किसी चीज की जरुरत तो नहीं है. वह कहते हुए झिझकता है" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक-दो दिन में रुचि ने आनन्द की पूरी जिम्मेदारी ले ली. वही उसे स्कूल के लिए तैयार करती. उसके बाल सँवारती, जूते पालिश करती, टाई बाँधती. शाम को उसके पाठ याद करवाती. उसके साथ ही खाना खाती. यह सब करना उसे अच्छा लगने लगा. उसने आनन्द के हर काम, पढ़ने, खेलने, खाने-पीने, सोने-जागने का समय निर्धारित कर दिया. अधिकतर समय उसके साथ ही रहती. &lt;br /&gt;पहले दिन जब शाम को आनन्द खाना खा रहा था रुचि ने देखा कि उसने तीन रोटियाँ खाईं. उसे तीन की संख्या ठीक नहीं लगी थी. दूसरे दिन जब फ़िर आनन्द ने तीन रोटियाँ ही खाई तो उसने पूछा, "तुम हमेशा तीन रोटियाँ ही खाते हो ?" उसने हाँ कहा. फिर रुचि ने कहा कि तीन की संख्या शुभ नहीं होती और उसे एक और रोटी खाने को कहा. लेकिन आनन्द का पेट भर गया था और उसने मना कर दिया. फिर रुचि ने एक तरकीब निकाली. जब वह तीन रोटियाँ खा लेता तो उसे अपने मे से एक कौर खिलाती. पहली बार आनन्द को उसके हाथ से खाते हुए हिचकिचाहट हुई थी. क्योंकि दूसरे के हाथ से उसे खाने की आदत नहीं थी. किन्तु जल्दी ही वह बात उसके लिए सामान्य हो गई. &lt;br /&gt;आनन्द की परीक्षाओं के बीच में एक-दो दिन का अवकाश होता था. छुट्टी के दिन प्रायः दोपहर में जब वह पढ़ाई से उबने लगता था तो रुचि उसके साथ लूडो या कैरम खेलती. जिससे उसका मन बहल जाय. कभी कभी झगड़ा भी हो जाता. अधिकतर झगडे़ का कारण आनन्द की बाल-सुलभ बेईमानी होती. &lt;br /&gt;उस दिन दोनों लूडो खेल रहे थे. एक बार जब वह हारने लगा तो रुचि की नज़र बचाकर उसने अपनी गोटियाँ आगे बढ़ा दी. रुचि को पता चल गया और उसने यह कहते हुए खेलना बन्द दिया," मैं तुम्हारे साथ नहीं खेलूँगी, तुम हमेशा चीटिंग करते हो". वह अपने बिस्तर पर लेट गई और अपनी एक बाँह मोड़कर माथे पर रख लिया. उसकी आँखें उसके हाथ से ढँक गईं. आनन्द ने उसे उकसाने के लिए कहा, "हारने लगीं तो भाग गईं ".&lt;br /&gt;"मुझे चीटर के साथ नहीं खेलना है" रुचि लेटे लेटे ही कहा.&lt;br /&gt;"मैनें कोई चीटिंग नहीं की...आपने ठीक से देखा ही नहीं, मेरी गोटियाँ पहले से ही वहीं थीं "  आनन्द का मन खेलने को कर रहा था. वह आगे बोला, "अच्छा चलिए फिर से खेलते हैं"&lt;br /&gt;रुचि चुप रही. कुछ भी नहीं बोली. आनन्द उठकर उसके पास आ गया. "चलिए, फिर से खेलते हैं" उसे लगा की रुचि सच में गुस्सा हो गई है. उसने अपनी गलती स्वीकार की,"अच्छा अब चीटिंग नहीं करूँगा." रुचि अब भी चुप ही रही. &lt;br /&gt;फिर आनन्द ने उसका हाथ माथे से हटाते हुए कहा,"चलिए न..." &lt;br /&gt; " मैं अब नहीं खेलूँगी, मुझे नींद आ रही है", रुचि ने आँखें बन्द किए हुए ही कहा.&lt;br /&gt;आनन्द उसके पास बैठकर उसे मनाने लगा, "नींद नहीं आ रही है...आप झूठ-मूठ की सो रही हैं" रुचि की पलकें अपनी उँगलियों से खोलने लगा. रुचि ने मुस्करा दिया. फिर हँसते हुए उठ बैठी और खेलने के लिए तैयार हो गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनन्द के आने के बाद रुचि का भी मन यहाँ लगने लगा था. आनन्द भी उससे खूब घुल-मिल गया था और हर छोटी बड़ी बात उसे बताता. जब वह स्कूल चला जाता तो रुचि को कुछ खाली खाली सा लगने लगता. वह स्कूल से लौटता तो बाल्कनी में खड़ी उसकी राह देख रही होती.  शाम को जब आनन्द पार्क में खेलता रहता तो वह बाल्कनी में खड़ी होकर देखती रहती. अँधेरा होने से पहले रोज वहीं से आवाज लगा कर बुलाती, " आनन्द, आओ दूध पी लो....."  और आनन्द समझ जाता कि अब खेलने का समय खत्म हो चुका है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन आनन्द की छुट्टी थी. लगभग दस बजे वह अपने एक दोस्त राजीव के घर चला गया यह कहकर कि एक-दो घंटे में वापस आ जाएगा. दोपहर हो गई लेकिन आनन्द वापस नहीं आया. रुचि को एक बेचैनी सी होने लगी. वह बार बार बाल्कनी तक जाकर देख आती. आन्टी जी ने कहा,"तुम क्यों इतना परेशान हो रही हो. वहीं रुक गया होगा. शाम तक आ जाएगा"&lt;br /&gt;"बोलकर तो गया था कि एक-दो घन्टे में आ जाएगा. कल उसका पेपर भी है."&lt;br /&gt;"कल से वह तैयारी कर तो रहा है. सुबह भी उसने पढ़ाई की थी. और फिर राजीव के यहाँ उसकी मम्मी भी हैं. तुम परेशान मत होओ, वह शाम तक लौट आयेगा."&lt;br /&gt;बात सिर्फ़ पढा़ई की नहीं थी, यह रुचि को पता था. अगले दिन उसकी गणित की परीक्षा थी जो उसका सबसे पसंदीदा विषय था और उसने पूरा तैयार कर लिया था, यह रुचि जानती थी. वास्तव में उसका इतने लम्बे समय तक न होना रुचि को खल रहा था.&lt;br /&gt;शाम को जब वह लौटा तो रुचि उस पर गुस्सा हो गई, "तुम सारे दिन घूमते रहे...कह कर गये थे कि एक-दो घन्टे में लौट आउँगा...कल पेपर है और तुम्हें पढ़ने-लिखने का कोई होश नहीं है" यह उसके अपने मन की खीझ थी.&lt;br /&gt;"कोई बात नहीं, अभी वह पढ़ लेगा. तुम उसे डाँटो मत" आन्टी जी को रुचि का डाँटना अच्छा नहीं लगा. फिर आनन्द से पूछा, "भूख लगी है? कुछ खाओगे?" आनन्द ने नहीं मे सिर हिला दिया. "क्यों, दोपहर को ही तो खाए होगे न...अच्छा बिस्किट खा लो और दूध पी लो  ". फिर उन्होनें रुचि को कहा कि वह आनन्द को दूध और बिस्किट दे दे.&lt;br /&gt;रुचि के डाँटने के कारण आनन्द का चेहरा उतर गया था. वह स्टडी रूम में चला गया और किताब खोलकर बैठ गया. रुचि दूध लेकर आई. उसने चुपचाप दूध पी लिया. वह उससे बात करने की कोशिश कर रही थी. किन्तु कुछ भी पूछने पर या तो वह चुप रहता या हाँ-ना मे सिर हिला देता. रुचि को पछतावा होने लगा कि बेकार मे ही उसने डाँट दिया था. वह उसे मनाने लगी. उसे लाकर चाकलेट दिया. उसके पेट मे गुदगुदी की. थोड़ी देर मे वह मान गया और सामान्य हो गया. &lt;br /&gt;़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखते देखते एक सप्ताह बीत गया. अब आनन्द के एक विषय की परीक्षा और बाकी है. कल उसकी परीक्षा खत्म हो जायेगी. दो-तीन दिन बाद उसके पिता जी उसे गाँव लिवा ले जाएँगे. इतने दिनो में आनन्द कभी भी अपने घर वालों को याद करके उदास नहीं हुआ था. लेकिन जब आज रुचि ने पूछा कि" मम्मी की याद आ रही है?" तो अनायस ही उसकी आँखें भर आई थीं. रात मे सोते समय रुचि सोचने लगी कि तीन दिन बाद आनन्द चला जायेगा. सब कुछ खाली खाली सा हो जाएगा. बहुत देर तक उसे नींद नहीं आई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन जब आनन्द स्कूल से लौटा तो रुचि अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी थी. उसके सिर मे दर्द हो रहा था. डाक्टर साहब की डिस्पेंसरी थोड़ी दूर थी. बाहर बहुत धूप थी. इतनी धूप में रिक्शे से रूचि को डिस्पेंसरी ले जाना आंटी जी को ठीक नहीं लगा. इसलिए घर पर पड़ी सिर दर्द की गोली दे दी थी. यह सोचकर कि डाक्टर साहब दोपहर में खाना खाने के लिए लगभग दो बजे घर आएँगे ही तब देख लेंगे. अभी कुछ आराम था. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आनन्द आज लौटते समय बहुत खुश था. आज अन्तिम परीक्षा थी. रुचि ने उससे कहा था," जब तुम्हारे एग्जाम्स खत्म हो जाएँगे तब हम खूब मस्ती करेंगे." उसे सिनेमा दिखाने का वादा भी किया था.  और सबसे बड़ी बात यह कि अब उसे पढ़ने लिए कोई नहीं कहेगा. खेलने से कोई नहीं मना करेगा. जब घर पहुँचा तो आन्टी जी ने दरवाजा खोला. प्राय: रुचि उसे बाल्कनी में खड़ी मिलती और जब वह ऊपर आता तो उसके कपड़े बदलवाती, उसकी परीक्षा के बारे में पूछती, फिर उसे खाना खिलाती. आन्टी जी उसके साथ ही कमरे में आ गईं. उन्होने आनन्द से कहा, " बेटा, कपड़े चेंज कर के चलो खाना खा लो" फिर उन्होने रुचि से पूछा,"कैसा लग रहा है अभी ?". रुचि ने कहा कि अभी ठीक है .&lt;br /&gt;"क्या हो गया ? " आनन्द ने पूछा&lt;br /&gt;"सिर में दर्द हो रहा है" आन्टी जी ने जवाब दिया. फिर बोलीं ,"मैं खाना लगाती हूँ, तुम दोनो लोग आ जाओ". वह चली गईं.&lt;br /&gt;आनन्द रुचि के पास आ गया और बोला,"बहुत तेज दर्द कर रहा है?" &lt;br /&gt;"नहीं अब तो ठीक लग रहा है..." रुचि ने उठकर बैठते हुए कहा, "तुम्हारा पेपर कैसा हुआ?"&lt;br /&gt;"अच्छा हुआ...आप डिस्पेंसरी गईं थीं?..दवाई लीं" उसने पूछा.&lt;br /&gt;"डिस्पेंसरी कैसे जाती, बाहर इतनी धूप है. और अधिक सिर-दर्द होने लगता....घर पर ही दवा ले ली थी." फिर मुस्कराते हुए आगे बोली, " अगर तुम बड़े होते तो मुझे बाइक पर बिठाकर डिस्पेंसरी ले जाते न"&lt;br /&gt;"हाँ..." आनन्द ने आँखें बड़ी बड़ी करते हुए कहा," मैं अभी भी आपको ले जा सकता था अगर मेरी साइकिल होती तो." &lt;br /&gt;"तो तुम मुझे साईकिल पर बिठा कर ले जाते ?...सो स्वीट ! " रुचि हँसने लगी. "अच्छा चलो, अब खाना खाते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले तीन दिनो में रुचि और आनन्द ने खूब मस्ती की. रुचि उसे सिनेमा भी ले गई. बाजार मे जादू का खेल लगा था. एक दिन उसे वह दिखाने ले गई. रुचि ने उसके लिए कई कामिक्स खरीदा. दोपहर भर लूडो और कैरम खेलते, टेलीविजन देखते. उसने रुचि को लट्टू नचाना सिखाया. रोज शाम को दोनो चाट खाने जाते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन दिन पलक झपकते ही निकल गए.आनंद के पापा आज उसे लिवाने आ गये हैं. &lt;br /&gt;रात के ग्यारह बज रहे होंगे. रूचि की आँखों में नीद नहीं थी. "कल वह चला जाएगा", रूचि बिस्तर पर लेती हुई सोच रही थी. पता नहीं क्यों एक व्यग्रता उसके मन को घेरे हुए थी. ऐसा लग रहा था कि कुछ छूट रहा हो. वह अपने बिस्तर से उठी और लाईट जलाया. आनंद गहरी नींद में सो रहा था. वह उसके बिस्तर के पास गई. कुछ देर तक खड़ी होकर उसके मासूम चेहरे को एक टक निहारती रही, फिर झुक कर उसके माथे को चूमा और उसके सिरहाने बैठ गई. देर तक अपने हाथों को उसके माथे, बालों और चेहरे पर फिराती रही जैसे कि वह उन्हें अपने अन्दर समेट लेना चाहती हो. उसके हाथ को अपने हाथों में लेकर उँगलियों पर न जाने क्या गिनने लगी. उसकी आँखों से आँसू बह निकले. कितनी देर तक यूँ ही बैठी रोती रही. कब नीद आ गई पता नहीं चला. बैठे बैठे ही दीवार से पीठ टिकाकर सो गई. जब आँख खुली तो सुबह के चार बज चुके थे. आनंद का हाथ उसकी गोद में था. वह उसके पैरों से लिपटकर सो रहा था. रूचि ने उसका हाथ हटाकर दूसरी करवट उसे सुलाया और अपने बिस्तर पर आकर लेट गई. &lt;br /&gt;                  &lt;br /&gt;सुबह जाते समय रुचि ने उसे ढ़ेर सारी चाकलेट दी. उसके माथे को चूमा और पूछा, "मुझे याद करोगे ?" कहते हुए उसकी आँखें डबडबा गईं और गला रूँध गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनन्द को समझ में नहीं आया कि क्या कहे. ऐसा प्रश्न उसके सामने पहली बार आया था. उसने हाँ में सिर हिला दिया.&lt;br /&gt; आनन्द की लगभग डेढ़ महीने की गर्मी की छुट्टियाँ थी. गाँव जाकर वह अपने दोस्तों के साथ मौज-मस्ती में लीन हो गया. उसे शायद ही कभी रुचि की याद आई होगी. छुट्टियाँ बिताकर जब वह लौटा तो एक दिन अपनी माँ के साथ आन्टी जी के घर गया. तब तक रुचि जा चुकी थी. जब आनन्द के परीक्षा के समय बातें होने लगी तो आन्टी जी ने हँसते हुए कहा, "आनन्द, तुम चले गए तो रुचि एकदम पागल हो गई थी. वह शाम को बाल्कनी में खड़ी होकर तुम्हें आवाज लगाती थी कि आनन्द आओ दूध पी लो"&lt;br /&gt;आनन्द के लिए यह समझना कठिन था कि वह ऐसा क्यों करती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1495878999715631673-5888648119132154331?l=kahaniyan-pratap.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/feeds/5888648119132154331/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2010/09/blog-post_18.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/5888648119132154331'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/5888648119132154331'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2010/09/blog-post_18.html' title='मुझे याद करोगे ?'/><author><name>प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08654132523168281005</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_FKlnHW05pkA/SUtrfDU6MYI/AAAAAAAAAA4/TP9ixHWw7DI/S220/DSC00425.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1495878999715631673.post-4298121302013929867</id><published>2010-09-04T03:21:00.000-07:00</published><updated>2010-09-04T03:51:01.145-07:00</updated><title type='text'>अपराजिता</title><content type='html'>दोपहर हो चुकी थी. ध्रुव को सुलाकर मैं आफिस के लिए तैयार होने लगी थी. शान्ति खाना बना रही थी. तभी कालबेल बजा. कौन आ गया इस समय...सोचते हुए मैने दरवाजा खोला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन साल बाद अचानक अनुराग को देखकर मेरे पैर वहीं जम से गये. आँखें खुली रह गयीं. पिछले तीन सालों से जो क्रोध, क्षोभ और पीड़ा  हिमखंडों सी मन में जमी हुई थी इन पलों की छुवन पाकर तरल हो गई और उसने आँखों की पुतलियों को ढँक लिया. सामने सब कुछ धुँधला हो गया. इससे पहले कि आँसू पलकों की सीमा लाँघ पाते, मैंने उन्हे वापस अन्दर धकेल दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग की नज़र मेरे चेहरे पर ठिठक गई.  "अन्दर आने को नहीं कहोगी?" उन्होने कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ गये. बिल्कुल चुपचाप. हमारे होंठ सिले हुए से लग रहे थे. आँखें एक दूसरे में कुछ ढूँढ रही थीं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कैसे हो?" कुछ देर बाद मैंने ही शुरुआत की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ठीक हूँ" बहुत धीरे से कहा. प्रतिपल उनके चेहरे पर भाव बदल रहे थे. बहुत कुछ अन्दर मथ रहा था. मुझसे दूर  चले जाने का क्षोभ और आज पुनः मुझे सामने पाने की ख़ुशी, दोनों ही एक दूसरे में घुले हुए से लग रहे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम दोनों फिर कुछ देर के लिये खामोश हो गये. कुछ कहने के लिये शब्द नहीं मिल रहे थे. शायद सारे शब्द जम गये थे या जो कुछ मन की सतह से उठकर बाहर आना चाहता था उसका भार वहन कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बाम्बे से कब वापस आए"  &lt;br /&gt;"कल ही आया"    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर वही खामोशी हमारे बीच पसर गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कैसी हो तुम...?" मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा. माथे की माँसपेशियाँ इस तरह  सिकुड़ गयीं कि दोनों भौहें जुड़ती सी प्रतीत होने लगी थीं...ऐसा प्रायः तब होता था जब वे मुझसे अपना प्रेम-प्रदर्शन करते थे. जब प्रेम की सघन भावनाएँ उनके हृदय तल से उठकर आँखों में तैरने लगती थी. उनके वाणी की कम्पन और शब्दों में भाव प्रवाह मुझे मंत्र मुग्ध कर देता था और मैं एकटक उन्हें निहारती थी...अनवरत सुनते रहना चाहती थी...तीन-चार साल पहले की बात है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                               xxxxxxxxxxxx&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वाणी, can you please do me a favour...? डान्स क्लास से बाहर निकलते हुए अनुराग ने मुझसे पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज पहली बार उन्होंने मुझसे व्यक्तिगत रुप से कुछ कहा था. पिछले तीन सप्ताह में हमारे बीच डांस स्टेप्स के अलावा और कोई बात नहीं हुई थी. क्लास के ख़त्म होते ही हम चुपचाप निकल जाते थे .  पहले दिन के सामूहिक परिचय में सबने अपना नाम और काम के बारे में बताया था. वे किसी कंसल्टिंग कम्पनी में इलेक्ट्रिकल इंजिनियर थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उनके चहरे पर एक प्रश्नवाचक नज़र डाली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुझे लग रहा है कि मैं सालसा के स्टेप्स ठीक से नहीं कर पा रहा हूँ. मुझे थोड़ी और प्रैक्टिस की जरुरत है" फिर थोड़ा रुक कर बोले, " if you can manage to come little early tomorrow..." उनकी आवाज़ में एक झिझक सी थी," it will be great help to me".  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"yeah sure, what time?" मैंने थोड़ा सोचते हुए कहा, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"at 4 ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"fine, I will come..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"thanks" उनकी आँखों में एक कृतज्ञता उभर आई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम इंस्टिट्यूट के कैम्पस से बाहर आ चुके थे. हाथ हिलाते हुए एक दूसरे को विदाई दी और वहाँ से निकल गये.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो मुझे बचपन से ही नृत्य करना पहुत पसंद था किन्तु कभी औपचारिक रुप से कोई शिक्षा नहीं ले पायी थी. मध्यम वर्गीय लोगों के लिये सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता जीविका होती है. मेरे लिए भी थी. अब तक कैरिअर के लिये ही जद्दोजहद करते हुए २६ साल गुजर चुके थे. सामाजिक पार्टियों में लोगों को नृत्य करते देखकर एक दिन मन में उठा कि क्यों न पाश्चात्य नृत्य की थोड़ी बहुत ट्रेनिंग ले ली जाय. और मैंने  इस इंस्टिट्यूट में बालरूम डांस सीखने के लिये दाखिला ले लिया था.  शनिवार और रविवार को शाम में ५ बजे से ७ बजे तक दो घंटे के क्लास होते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लास के पहले दिन जब मेरा कोई पार्टनर नहीं था...सिर्फ़ मेरा ही नहीं, बल्कि मेरी तरह कई अन्य लड़के और लडकियां भी थीं जिनका कोई पार्टनर नहीं था, डांस इंस्ट्रक्टर ने उन्हें आपस में पार्टनर बना दिया था. मेरे हिस्से में अनुराग आए थे. उन्हें देखकर मुझे अच्छा लगा था. ऊँचा कद, गेहुआं रंग, चेहरे पर एक शालीनता झलक रही थी. चौड़े सीने से चिपके हुए गहरे भूरे रंग के टी शर्ट पर सफेद रंग से अंग्रेजी का बड़ा सा ओ लिखा हुआ था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन रविवार था. हम पूर्वनिर्धारित समय पर ४ बजे पहुँच गये. दो - चार और लोग भी प्रैक्टिस कर रहे थे. आधे घंटे के प्रैक्टिस के बाद हम थोड़ा थक गये थे और क्लास के बाहर रखे बेंच पर बैठ कर सुस्ताने लगे. हमारे बीच औपचारिक बातें शुरू हो गयीं. क्या करते हो? कहाँ रहते हो? आदि. जब मैंने उन्हें अपना विजिटिंग कार्ड दिया तो पढ़कर एकदम से बोल उठे, "So, you are in IT !"    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"You didnt know? मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ. मैंने आगे कहा, "पहले दिन इंट्रो में मैंने बताया तो था"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" आई ऍम सॉरी, एक्चुअली मैंने ध्यान नहीं दिया था." थोड़ा झेंपते हुए हुए बोले. "तब मुझे नहीं पता था न कि आप मेरी पार्टनर बनने वाली हैं" कहते हुए मुस्करा दिए. एकदम निश्छल मुस्कराहट...किसी बच्चे की तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँच बजे क्लास शुरू हुआ. आज हम साथ में नृत्य करते हुए पहले से अधिक सुविधा महसूस कर रहे थे. शायद हमारे बीच से अजनबीपन का अहसास कुछ हद तक कम हो चुका था. नृत्य करते समय मेरे हाथों और पीठ को थामने में उन्हें जो पहले झिझक सी होती थी वह आज नहीं थी. आज नृत्य करने में बहुत ही आनंद आया.      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लास से बाहर हम साथ साथ निकले. पार्किंग में कार के पास आकर थोड़ा ठिठक गये. "thanks for your co-operation" उन्होंने कृतज्ञता जाहिर की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"mention not"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"I think, I was better today"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"much better...you did very well"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"well..we should leave now...."  वे  अपनी कार का दरवाजा खोलते हुए बोले.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"yeah, bye, take care " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"bye, see you on saturday" उन्होंने कार में बैठते हुए कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                               xxxxxxxxxx&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;तीसरे दिन, जब मैंने ऑफिस में अपना मेल बॉक्स खोला तो देखा अनुराग का एक मेल था. सब्जेक्ट में "गुड मोर्निंग" लिखा था-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;हेलो  वाणी!&lt;br /&gt;आप कैसी हैं? &lt;br /&gt;आशा करता हूँ कि आप घर पर डांस प्रैक्टिस करती होंगी.  आज मैंने इंटरनेट से सालसा और चा चा चा के कुछ म्यूजिक डाउनलोड किए. मुझे लगता है कि इससे हमें घर पर प्रैक्टिस करने में मदद होगी. आपको भी भेज रहा हूँ.  &lt;br /&gt;सच कहूँ, मैंने डांस क्लास ज्वाइन तो कर लिया था लेकिन आश्वस्त नहीं था कि कितने सप्ताह रुक पाउँगा. लेकिन अब अच्छा लगने लगा है. आपका सहयोग मुझे प्रोत्साहित करता है. अब तो मन करता है कि रोज क्लास हो. &lt;br /&gt;एक सुखद दिन की कामना के साथ....&lt;br /&gt;अनुराग &lt;/span&gt;    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़कर मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट उभर आई. पहले तो सोचा कि उन्हें मेरा मेल आई डी कहाँ से मिला. फिर याद आया कि मेरा कार्ड उनके पास है.  उनका लिखना मुझे अच्छा लगा. मैंने पत्रोत्तर लिखा-&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;br /&gt;हेलो अनुराग !&lt;br /&gt;सर्वप्रथम मुझे पत्र लिखने के लिये धन्यवाद. मैं बिल्कुल ठीक हूँ. &lt;br /&gt;प्रैक्टिस रोज तो नहीं हो पाती है फिर भी कोशिश रहती है कि जहां तक संभव हो कर लूँ.  निःसंदेह इस म्यूजिक के साथ प्रैक्टिस में सुविधा होगी. भेजने के लिये आभार.   &lt;br /&gt;आपका दिन बहुत ही सुखद हो.&lt;br /&gt;वाणी&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले शनिवार और रविवार की क्लासें बहुत अच्छी रहीं. दो घंटे कैसे बीत गये  पता ही नहीं चला. हमारे और अनुराग के बीच की औपचारिकता धीरे धीरे कम होने लगी थी. हम एक दूसरे के साथ अधिक सुविधा महसूस करने लगे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार की क्लास से निकलने के बाद जब हम पार्किंग में पहुँचे. तो अनुराग ने कहा, "क्या आपको नहीं लगता कि हमें कभी एक साथ कॉफी पीनी चाहिए?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"Not a bad idea." मैने हँसते हुए कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तो चलें ?" उन्होंने अपनी कार का दरवाजा खोलते हुए कहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अभी ??" मैं थोड़ी हिचकिचाई. वास्तव में मैं इसके लिये पहले से तैयार नहीं थी. अनुराग ड्राईविंग सीट पर बैठ चुके थे और मेरे बैठने के लिये दरवाजा खोल दिया.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ, अभी चलते हैं..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओके, लेकिन आप ऐसे ही जाएँगे" मैंने कार में बैठते हुए कहा. उनकी शर्ट पूरी तरह से भींग चुकी थी. उन्हें बहुत पसीना आता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं, चेंज कर लेता हूँ." उन्होंने पिछली सीट से एक शर्ट उठाकर सामने रख लिया और अपनी शर्ट का बटन खोलते हुए कहा. सीट को थोड़ा सा पीछे झुकाकर शर्ट निकाल दिया. उनके चौड़े कंधे और बलिष्ट बाहें लेम्प पोस्ट के प्रकाश से चमक उठीं. मुझे कुछ झिझक सी हुई और मैं सामने देखने लगी.  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;"मैं यहाँ से जाने से पहले रोज चेंज कर लेता हूँ. रास्ते में पसीने से ठण्ड सी लगने लगती है" उन्होंने दूसरी शर्ट पहनते हुए कहा, "इसलिए जब क्लास के लिये आता हूँ तो एक शर्ट रख लेता हूँ." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोग कॉफी हाउस चले गये. बातें करते हुए दो घंटे कब बीत गये पता ही नहीं चला. घर लौटते लौटते देर हो चुकी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते भर पिछले चार घंटों के बारे में सोचती रही. डांस करते समय एक बार जब अनुराग ने मुझे अपनी ओर खींचा था मैं अपना संतुलन खो दी थी और उनके सीने से जा लगी थी. हालाँकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. युगल नृत्य में प्रायः ऐसा होता है कि दोनों लोगों के शरीर एक दूसरे से छू जाते हैं. किन्तु इस बात का अहसास पहली बार हुआ था. &lt;br /&gt;मैं प्रायः ही अपने पुरुष मित्रों से हाथ मिलाती थी और गले भी मिलती थी किन्तु आज उनके सीने से लगने पर एक अलग ही अनुभूति हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग कम बोलते थे. स्वभाव से अंतर्मुखी थे. कॉफी हाउस में भी अधिकतर समय मैं ही बोलती रही और वे तन्मयता से सुनते रहे. उनके चेहरे पर उभरते भाव हर बात की प्रतिक्रया बड़ी आसानी से दे देते थे. उनका चेहरा एक आईने की तरह लगता था जिस पर मन का बिम्ब साफ़ उभर आता था. छोटी छोटी आँखों की चमक मन में अन्दर तक प्रकाश सी भर देती थी. मैं बात करते हुए इतना सहज महसूस कर रही थी कि जैसे वे मेरे कोई पुराने मित्र हों. उनकी बातों में और आँखों में जो मेरे लिये सम्मान दीखता था वह मन को छू लेता था.      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुँची तो मेरी रूम मेट पूर्वी मेरा इंतज़ार कर रही थी. घर में घुसते ही उलाहना दी "अरे तू कहाँ रुक गई थी? " यह प्रश्न बहुत ही  अपेक्षित था, “"मैंने इंस्टिट्यूट में भी फ़ोन किया था तो पता चला तुम वहां से सात बजे ही निकल गई थी" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों मोबाइल फ़ोन बहुत महँगा हुआ करता था. आम लोगों की पहुँच से दूर था. अपना सैंडल उतारते हुए मैं सोच रही थी कि क्या जवाब दूँ कि फिर उसने कहा , "मैडम, आप से ही बातें कर रही हूँ"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक मुझे कुछ शरारत सी सूझी. मैं सैंडल उतारकर बेड पर उसके बिल्कुल करीब आ गई और उसे अपनी बाहों में पकड़ कर मुस्कराते हुए बोली "डेट पर गई थी." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हें...रिअली?" वह उछल पड़ी.उसकी आँखे बड़ी बड़ी हो गई थीं. मैं मुस्करा रही थी. अगले ही पल उसका आश्चर्य विलुप्त हो गया और बोली, "गुड जोक...डेट पर...और वो भी तू ?....सही बता न कि कहाँ इतनी देर हो गई थी" &lt;br /&gt;"अरे कहीं नहीं, वो डांस क्लास में मेरा पार्टनर है न, उसके साथ कॉफी पीने चली गई थी." मैं बिस्तर से उतरकर कपड़े बदलने लगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वैसे मेरे डेट पर जाने में कोई बुराई है क्या" मेरा मूड बहुत अच्छा था. मैंने उसे छेड़ते हुए कहा,  "या तुझे शक है कि कोई लड़का मुझे डेट पर नहीं ले जाएगा" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बुराई तो नहीं है..." मेरी तरफ लगभग घूरते हुए बोल रही थी, "लेकिन किसी लड़के की किस्मत चमके तब न वो तुझे डेट पर ले जा पायेगा...." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जानती थी कि कभी यदि मैं गंभीरता से भी कहूँ तो भी उसे विश्वास नहीं होगा. वह जानती थी कि मेरे कई पुरुष मित्र थे. अधिकतर ऑफिस के और कुछ मेरे कालेज के. कुछ लोग जिनसे पेंटिंग के सिलसिले में जान पहचान हुई थी. मैं हमेशा ही उसके सामने ही लोगों से बात करती थी. इसलिए उसे पता था कि उन लोगों के साथ मेरे संबंधों की सीमाएँ तय थी. कभी कभी वह कहती थी," तेरे इतने फ्रेंड्स हैं, क्या इनमे से कभी किसी ने तुझे अट्रैक्ट नहीं किया?"     &lt;br /&gt;बहरहाल पूर्वी से अपनी तारीफ़ सुननी अच्छी लगी थी मुझे.              &lt;br /&gt;                     &lt;br /&gt;                                                                    xxxxxxxxxx&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लास में बताया गया था कि अगले हप्ते से वर्कशॉप शुरू होगा. डेढ़ महीने के वर्कशॉप के बाद सिरीफोर्ट आडिटोरियम में लाइव परफोर्मेंस होना था. अगले हप्ते से क्लास का समय एक घंटे बढा दिया गया था.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस एक दिन के बाद से अनुराग का कोई मेल नहीं आया था. फिर भी जब अपना मेल बॉक्स खोलती थी तो अचेतन मन में कहीं एक प्रतीक्षा सी रहती थी. आजकल ऑफिस में काफी वर्कलोड बढ़ गया था और मुझे रात के १२-१ बजे तक काम करना पड़ता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम के पाँच बजने वाले थे. मैं ऑफिस में ही थी. काम में व्यस्त थी कि मेरे फ़ोन की घंटी घनघना उठी. मैंने फ़ोन उठाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"hello...."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाय वाणी, how are you?  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"ओह अनुराग, is this you !" मैं पहली बार अनुराग को फ़ोन पर सुन रही थी. लेकिन उनकी भारी भरकम आवाज़ फ़ोन पर भी बिल्कुल वैसी ही थी जैसी कि सामने होती है. वैसे भी उनका मेरे नाम को उच्चारित करने का तरीका दूसरों से बिल्कुल अलग होता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे आपने पहचान लिया! मैंने तो सोचा था कि कुछ देर तक नहीं बताउँगा कि मैं कौन हूँ" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"you wanted to tease me...?" मैंने हँसते हुए कहा, "anyway, its good to hear from you, how are you?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"I am absolutely fine...but you are not sounding well...what happened?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कुछ ख़ास नहीं...थोड़ा सा कोल्ड हो गया है. "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओह, रात में आइस क्रीम  खा ली थी ?" अनुराग ऐसे बात कर रहे थे जैसे किसी छोटी बच्ची के साथ बात कर रहे हों. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं आइस क्रीम तो नहीं खाई थी. शायद मौसम के कारण हो गया होगा"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ मौसम तेजी से बदल रहा है... अपना ख़याल रखा करिए न" हालाँकि उन्होंने एक बहुत ही सामान्य और औपचारिक बात कही थी लेकिन उनका ध्यान देना अच्छा लगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम थोड़ी देर तक बातें करते रहे. फिर मैंने कहा कि मुझे कुछ जरूरी काम निपटाना है और फ़ोन रख दिया था.  अनुराग ने बताया कि उन्हें कल सुबह की फ्लाईट से तीन दिन के लिये मुंबई जाना है कंपनी के काम से. जानकार मुझे ख़ुशी नहीं हुई. हालाँकि हम साप्ताहांत में ही मिलते थे और वह भी २-३ घंटे के लिये ही, फिर भी उनका दिल्ली से जाना पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लग रहा था.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन ऑफिस में काम करते करते अचानक अनुराग की याद आ गई. मैंने कुछ सोचते हुए, एक स्केच जो काफी पहले बनाया था अनुराग को मेल कर दिया और साथ में यह भी लिखा- इस स्केच को देखकर बताईये आपके मन में बनाने वाले के बारे में क्या धारणा बनती है. उस दिन उनका कोई उत्तर नहीं आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन रात के ११ बजे मैं काम कर रही थी कि अनुराग का मेल आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;"आज ही आपका मेल देखा. कल पूरे दिन मीटिंग में व्यस्त रहा बिल्कुल भी अवकाश न मिल सका था.  आज भी दिन भर काफी व्यस्तता रही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपका स्केच बहुत ही सुन्दर लगा. बहुत ही कुशलता से आपने मनोभावों को व्यक्ति के चहरे पर उकेरा है. पहले कभी नहीं बताया कि आप पेंटिंग भी करती हैं. चलिए किसी दिन आपसे अपना पोर्ट्रेट बनवाऊंगा. बनाएँगी न आप.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी आपकी तबियत कैसी है. जल्दी से पूरी तरह से ठीक हो जाइए. इस हप्ते से डांस क्लास में अधिक मेहनत करना पड़ेगी "&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उत्तर लिखा –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आपका मेल पाकर प्रसन्नता हुई. आशा है कि वहाँ आपका काम अच्छा चल रहा होगा. &lt;br /&gt;मैं अब पूरी तरह से स्वस्थ हूँ. स्केच आपको अच्छी लगी. आभार. &lt;br /&gt;यदि आप मुझे समर्थ समझते हैं तो अवश्य बनाउँगी आपकी पोर्ट्रेट. किन्तु उसके लिये काफी समय निकालना पड़ेगा आपको. उतना समय निकाल पायेंगे आप? &lt;br /&gt;आपने मेरा एक प्रश्न अनुत्तरित ही छोड़ दिया."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुरंत ही उनका मेल आया-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;"शायद मैं उस प्रश्न से बचना चाहता था. वास्तव में पेंटिंग मुझे सबसे मुश्किल कला लगती है और पेंटिंग देखकर बनाने वाले के बारे में कुछ भी कह पाना मेरे लिये बिल्कुल भी संभव नहीं है. हाँ स्केच में जिस व्यक्ति का  भाव उकेरा गया है उससे लग रहा है कि वह एक निर्विकार अवस्था में हैं. जैसे सब कुछ  खो चुका है और अब आने वाले पलों को तटस्थता से देख रहा है.&lt;br /&gt;हो सकता है बनाते समय पेंटर की मनोस्थिति कुछ वैसी रही हो. शायद मन में कुछ अंतर्द्वंद चल रहा हो.&lt;br /&gt;समय की कोई समस्या नहीं है. आप जितना समय चाहेंगी मैं निकाल लूँगा.  आप तैयार रहिये. &lt;br /&gt;अभी तक काम कर रही हैं ?"  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ, आजकल थोड़ा वर्क लोड बढ़ गया है. कुछ देर तक और काम करूँगी. आप अभी तक सोये नहीं. सो जाइए आपको सुबह ऑफिस भी जाना होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;"नीद नहीं आ रही है"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" नीद भला क्यों नहीं आ रही है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;"पता नहीं क्यों नहीं आ रही है. यूँ लग रहा है जैसे कहीं कुछ गुम गया है"    &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या गुम गया है , बताइये. मैं ढूँढने में मदद करूँ ?     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;"अभी तो मुझे स्वयं ही नहीं पता चल पा रहा है. जैसे ही पता चलेगा आपको अवश्य बताउँगा."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अच्छा, आप अब सो जाइए. बहुत रात हो चुकी है. मुझे भी कुछ काम निपटाना है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;शुभरात्रि और सुखद नीद की कामना के साथ....."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"शुभ रात्रि"     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग से बात करना अच्छा लगा था.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                      xxxxxxxxx&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन अनुराग वापस दिल्ली आ गये. शाम को मुझे फ़ोन किया. अभी शनिवार आने में एक दिन बाकी था. मन हो रहा था कि बीच का एक दिन ख़त्म हो जाय. शनिवार और रविवार आकर कब चला गया, पता ही नहीं चला. रविवार को जब शाम में घर पहुँची तो लग रहा था जैसे पिछले दो दिन किसी स्वप्न की तरह उड़ गये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"एक बात बता..." खाना खाते हुए पूर्वी ने बहुत ही गंभीरता पूछा "क्या, तेरी वो डेट वाली बात सही थी?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"???....." मेरी प्रश्नवाचक नज़रें उसकी तरफ उठ गयीं, "ऐसा क्यों पूछ रही है ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इसलिए कि तू कुछ बदली बदली सी लग रही है आजकल. चेहरे पर एक अलग ढंग की चमक सी दिखाई देती है. पहले से कहीं अधिक खुश लगती है. किसी बात पर अब तू खीझती भी नहीं है......." कुछ देर रूक के बोली, "आज भी तू देर से आई"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे वो मैं तुझे बताना भूल गई थी. इस हप्ते से वर्कशॉप शुरू हो गया है और अब क्लास की टाइमिंग ५ से ८ हो गई है.." मैंने बात को सम्भाला, "और मैं डांस को काफी एन्जॉय कर रही हूँ. शायद वही ख़ुशी मेरे चेहरे पर तुझे दिखाई दे रही हो' मैंने थोड़ा मजाक के लहजे में कहा.  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जब बिस्तर पर लेटी तो पूर्वी की बात मन में घूमने लगी. मैं सोचने लगी, क्या वास्तव में मेरे अन्दर कोई परिवर्तन हो रहा है? यदि हो रहा है तो उसका कारण क्या है. अनुराग की तरह तो मेरे और भी फ्रेंड्स हैं जिनसे बात करना मुझे अच्छा लगता है. जिनके साथ मैं घंटों गप्पें मारती हूँ. फिर पूर्वी को आज ऐसा क्यों लग रहा है?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग के साथ हुए अपनी बातों के बारे में सोचने लगी. अभी तक तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है जिसे असहज और असामान्य कहा जा सके. उन्होंने कोई बात ऐसी नहीं कही है तो अस्वाभाविक हो और जिससे मेरे प्रति उनके मन में किसी अतिरिक्त आकर्षण का भान हो सके. एक मित्र की तरह ही तो हमने अपनी बातें एक दूसरे से कही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैं......? मुझे उनका मुंबई जाना अच्छा क्यों नहीं लगा था? शनिवार की प्रतीक्षा का कारण मात्र डांस ही रहता है? उनका होना क्यों मेरे आस पास को भर सा देता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं ऐसा कुछ नहीं है......" मैंने स्वयं को समझाया, "हमारे चारो तरफ जो भी वातावरण उत्पन्न होता है उसका प्रभाव हमारे मन पर पड़ता ही है. किसी भी नए रिश्ते में एक गर्माहट होती ही है. हमारे बीच अब तक जो भी रिश्ता बन पाया है वह बिल्कुल सहज है. मन में उभरी प्रतिक्रियाएँ सदैव एक सी नहीं हो सकती हैं क्योंकि वे परिस्थितिजन्य होती हैं...आस पास के व्यक्तियों के व्यवहारों से प्रभावित होती हैं. अनुराग से मिलना उस समय हुआ था जब मैं नृत्य को लेकर उत्साहित थी. उनके व्यक्तित्व की सरलता ने हमारे संबंधों को सहज बना दिया है..." सोचते सोचते न जाने कब नीद आ गई.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात भर सपने में डांस फ्लोर घूमता रहा. अनुराग की बाहों में मैं तकली की तरह नाच रही थी. डांस रूम से निकलकर कभी बगीचे के झुरमुटों के नीचे...कभी किसी बर्फ से ढँके पर्वत के शिखर पर...कभी हरे भरे घास के मैदानों में...कभी नदी के पानी पर पड़ती सूरज की झिलमिलाती चंचल किरणों पर. सुबह उठी तो मन एक अनजान मिठास से भरा हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                           xxxxxxxxxxxxx&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन बहुत तेजी से निकल रहे थे. दो सप्ताह कब बीत गये पता भी नहीं चला. इस बीच अनुराग से फोन पर और इ-मेल से बातचीत की आवृत्ति बढ़ गई थी. जिस भी रुप में वे मेरी जिन्दगी में थे, सुखद लग रहा था. शायद मुझे उनकी आदत सी पड़ने लगी थी.      &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;उस शनिवार को १५ अगस्त था. डांस क्लास बंद था. सुबह के काम निपटाते निपटाते १२ बज गये थे. हमलोग आज देर से भी उठे थे. छुट्टी के दिन प्रायः ऐसा होता था कि हम देर तक सोते रहते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्वी को जाना था. उसके कुछ दूर के रिश्तेदार मैदान गढ़ी में रहते थे. वहाँ किसी का एंगेजमेंट था. मुझे भी जाने को कह रही थी पर मेरा मन नहीं हुआ. मैं आराम करना चाहती थी. वैसे भी पिछले कई सप्ताह बहुत व्यस्त जा रहे थे. नाश्ता करके वह चली गई. कुछ खाली खाली सा लग रहा था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाश्ता करके मैं बालकनी में आ गई. आसमान पर बादल घिर रहे थे. धूप बिल्कुल भी नहीं थी. वहाँ खड़ा होना अच्छा लगा. हमारा फ़्लैट ग्यारहवीं मंज़िल पर था. आसमान दूर तक दिखाई दे रहा था . सफेद और काले बादलों के छोटे छोटे टुकड़े इधर से उधर भाग रहे थे . चिड़ियों  के कुछ छोटे छोटे झुण्ड हवा में अठखेलियाँ कर रहे थे.  मन किया कि अभी बरसात होने लगे और मैं उसमे भीगूँ . बारिश मुझे बेहद पसंद है. सामने  सड़क पर गाड़ियों की कतारें लगी हुई थीं. बायीं तरफ एक बड़ा सा पार्क था. उसके बीच में घास से ढका एक मैदान था जिसमे कुछ बच्चे खेल रहे थे. काफी देर तक मैं खड़ी होकर बाहर का दृश्य देखती रही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी नहीं बरसा और कुछ देर में बादल भी छँटने लगे. बादलों के बीच से सूर्य देव झाँकने लगे. मैं अन्दर आ गई. एक किताब उठाकर बिस्तर में घुस गई. पढ़ते पढ़ते नीद आ गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोन की घंटी सुनकर नीद खुली तो देखा सामने की दीवाल घडी में २.३० बज रहे थे. मैंने उठाया.&lt;br /&gt;"हेल्लो......" &lt;br /&gt;"सो रही थीं ?" &lt;br /&gt;"अनुराग, आप !.....हाँ सो रही थी"&lt;br /&gt;"ओह, मैंने आपको डिस्टर्ब कर दिया"&lt;br /&gt;"नहीं, मैं पहले ही काफी सो चुकी हूँ...लगभग डेढ़ -दो घंटे. "&lt;br /&gt;"ओके, फिर ठीक है."&lt;br /&gt;'आप क्या कर रहे हैं"&lt;br /&gt;"कुछ ख़ास नहीं, अभी अभी लंच किया... आपने लंच कर लिया ?"&lt;br /&gt;"नहीं, अभी कहाँ किया...ब्रेकफास्ट करके ही सो गई थी. अब करूँगी"    &lt;br /&gt;"वैसे अभी आपका कोई प्रोग्राम है? आई मीन, कहीं जाने का या कोई स्पेसिफिक वर्क?"&lt;br /&gt;"नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है...क्यों पूछ रहे हैं"    &lt;br /&gt;"क्या खयाल है अगर हम कोई प्ले देखने चलें...आपको प्ले देखना पसंद है? "&lt;br /&gt;"हाँ, प्ले देखना पसंद तो है मुझे...लेकिन कौन सा प्ले देखने जाएँगे...और कहाँ"&lt;br /&gt;"कामिनी थियेटर, मंडी हाउस. हास्य नाट्य महोत्सव चल रहा है."&lt;br /&gt;"कितने बजे का शो है ?"&lt;br /&gt;"४.३०"&lt;br /&gt;"ओके"&lt;br /&gt;"मैं ऐसा करता हूँ, आपके पास मैं ३.३० तक पहुंचता हूँ. हमें वहाँ से मंडी हाउस पहुँचने में आधे घंटे लगेंगे. &lt;br /&gt;"ठीक है, पर ....." मैंने कुछ सोचते हुए कहा, " आपको मेरे यहाँ तक आने में ढूँढना पड़ेगा. एक काम करते हैं, मैं नॉएडा मोड़ तक ऑटो से आ जाती हूँ. पाँच मिनट लगेगा मुझे. मोड़ के ठीक पहले वाले बस स्टैंड पर मिलते हैं."&lt;br /&gt;"हाँ यह बेहतर रहेगा....मैं ३.३० पर आपको वहीं मिलता हूँ." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग ने जब प्ले के लिये जाने को कहा तो पहले तो कुछ हिचक सी हुई पर उन्होंने कुछ सोचने का समय ही नहीं दिया था. अच्छा ही हुआ नहीं तो घर में भी बैठकर क्या करती. शायद कोई स्केच बनाती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंच करने का मन नहीं हुआ. मैं तैयार होने लगी. सुबह बाल धोया था. अभी भी पूरी तरह से सूखे नहीं थे. मैंने कंघी करके जूड़ा बना लिया. सफ़ेद रंग का वन-पीस ड्रेस पहना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब स्टैंड पर पहुँची तो देखा अनुराग वहाँ पहले से ही थे. शायद मुझे फोन करने के तुरंत बाद ही निकल लिये होंगे. अपनी कार स्टैंड से थोड़ा पहले खड़ी करके उससे टिककर खड़े  थे.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मुझपर नज़र पड़ी तो उनकी आँखों में विस्मय और ख़ुशी दोनों साफ़ झलक रहे थे. होठ कुछ देर तक खुले रह गये थे. आँखें मुझ पर जम गई थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डांस क्लास में मैं हमेशा बालों की एक छोटी बना  कर रखती थी. बालों को खुला रखने पर कमर तक चले जाते और उलझ जाने का डर रहता था. डांस करते समय असुविधा भी होती. और जूड़ा नहीं बनाती थी क्योंकि उसके खुल जाने का डर रहता था.  आज वे मुझे पहली बार बिना चोटी के देख रहे थे.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका इस तरह से देखना मुझे अच्छा लगा. &lt;br /&gt;"क्या हुआ ?" मैंने मुस्कराते हुए पूछा.  &lt;br /&gt;"how beautiful ! तुम कितनी सुन्दर लग रही हो ....." उनकी नज़रें मेरे चेहरे में खो गई थीं. आज पहली बार उन्होंने मुझे तुम कहकर संबोधित किया था.     &lt;br /&gt;'रिअली ? Thank you so much.....अब चलें?'  मैने हँसते हुए कहा.   &lt;br /&gt;'हाँ, श्योर..." जैसे अचानक नीद से जाग गये हों.&lt;br /&gt;हम कार में बैठ गये.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6.30 पर शो ख़त्म हुआ. कॉमेडी प्ले था. बहुत ही मनोरंजक रहा. इंडिया गेट के सर्किल से गुजरते हुए अनुराग ने  अचानक  कार पार्किंग की ओर मोड़ दी और बोले, "चलिए, आइस क्रीम खाते हैं, फिर चलेंगे. देर तो नहीं हो रही है आपको?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं देर नहीं हो रही है...चलिए."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार पार्क करके हम आइस क्रीम खरीदे और बेंचनुमा लगे पत्थरों पर बैठकर खाने लगे. अभी दिन थोड़ा बाकी था किन्तु आसमान में बादल छाये हुए थे इसलिए अन्धेरा होने लगा था.  हालाँकि लेम्प पोस्ट का प्रकाश हमारे आस पास के अँधेरे को छिन्न कर रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक फुहारें गिरने लगीं..छोटी छोटी बूँदें ओस की तरह चेहरे पर झरने लगी थीं. पिकनिक मनाते लोग अपनी चटाईयाँ और चादर समेटने लगे थे. इधर उधर बैठे और खड़े लोग जल्दी जल्दी अपने वाहनों की ओर जाने लगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"You know, I love rain...." मैं खड़ी हो गई. मेरा चेहरा आसमान की ओर था.  दोनों हाथ फैलाकर बारिश की बूँदों को उनमे समेटने की कोशिश करने लगी. मेरी आँखें बंद थीं. फुरारें मेरे चेहरे को भिगो रही थीं. मैंने अनुराग की ओर बिना देखे ही कहा, "कभी कभी लगता है कि मैंने अपनी जिन्दगी का कुछ हिस्सा इन बादलों को उधर दे रखा है. जब भी ये बरसते हैं तो लगता है जिन्दगी बूँद बूँद झर रही है और मुझमे समा कर मुझे पूरा कर रही है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"या फिर ये बूँदें तुम्हारे स्पर्श में अपना जीवन पाना चाहती हैं"  अनुराग कि बातें सुनकर मैंने आँखें खोल दी. वे अभी भी बैठे थे उनकी दृष्टि मेरे चेहरे पर जमी थी. अचानक बादल गरजने लगे और बारिश तेज हो गई. मोटी मोटी बूँदें गिरने लगी थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चलो अब चलते हैं...बारिश तेज हो गई है..."  वे उठ खड़े हुए और चलने को उद्यत हुए.&lt;br /&gt;वे अभी एक पैर बढाए होंगे कि मैंने उनका हाथ पकड़ लिया. वे रुक गये. मेरी तरफ मुड़े. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुझे भींगना है...' वे थोड़े विस्मित से खड़े रहे. होठों पर मुस्कराहट और आँखों में सहमति थी. बारिश की बूँदें तेजी से हमें भिगोने लगी थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर उन्होंने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिये और बोले, "हे, लेट्स डांस..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ग्रेट !!!" मैं उनके करीब आ गई. हमारे पैर हरी घास पर थिरकने लगे. बारिश पूरे जोरों से होने लगी थी. बूँदें मेरे शरीर को भिगोने के बाद मेरे मन में रिस कर उतरने लगी थी. एक आस की पौध जिस पर जाने कब से वक़्त की गर्द जमी हुई थी, उन बूँदों से धुलने लगी और उसकी हरी पत्तियाँ चमकने लगी थीं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम दस मिनट तक नाचते रहे होंगे. फिर अचानक वे रुक गये और बोले, "अब चलना चाहिए हमें". मैंने देखा इंडिया गेट के नीचे खड़े गार्ड और पुलिसमैन...पेड़ों के नीचे आश्रय लिये कुछ लोग, सबकी निगाहें हमारी तरफ थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम कार की तरफ बढ़े. मिट्टी गीली होने लगी थी और मेरे सैंडल का नुकीला हील उसमे धँसने लगा था. अनुराग ने देखा मुझे चलने में परेशानी हो रही है. उन्होंने मुझे अपनी बाहों में उठा लिया. ऐसा नहीं था कि यह पहली बार था जब उन्होंने मुझे अपनी बाहों में उठाया हो. डांस करते समय कितनी ही बार उन्हें मुझे लिफ्ट करना पड़ता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे..ये क्या कर रहे हो...मैन चल लूँगी..."&lt;br /&gt;"dont worry ... बस सड़क तक...." उन्होंने हँसते हुए कहा &lt;br /&gt;कार के पास लाकर उन्होंने मुझे उतार दिया.  &lt;br /&gt;"ओह, तुम्हारे कार की सीटें भीग जाएँगी"&lt;br /&gt;'नो प्रॉब्लम, कार हमारे लिये है हम कार के लिये नहीं" दरवाजा खोल कर वे अन्दर बैठते हुए दूसरी तरफ का दरवाजा खोल दिया. मैन अन्दर बैठ गई. हम चल पड़े. &lt;br /&gt;'i cant believe, but it was wonderful' मेरी तरफ देखकर कहा उन्होंने. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'सब तुम्हारे कारण ही हुआ, अच्छा हुआ जो तुमने प्रोग्राम बनाया" बारिश का पानी मेरे बालों से रिसकर अभी भी मेरे चेहरे और पीठ पर आ रहा था. उन्होंने डैश बोर्ड से निकाल कर एक तौलिया दिया. मैं उससे अपने बँधे बालों को और ऊपर से ही सुखाने का प्रयास करने लगी कि कम से कम पानी न टपके.     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधे घंटे में हमलोग मयूर विहार पहुँच गये. मेरे बिल्डिंग के नीचे सड़क पर कार खड़ी कर दी. बारिश अब हल्की हो चुकी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'चलो ऊपर, कॉफी पीकर जाना"&lt;br /&gt;"आज नहीं, देखो कितना भींग चुका हूँ. ठण्ड सी लग रही है. कॉफी फिर कभी पीने आऊँगा"&lt;br /&gt;"ओके, मैं चलूँ" मैंने भी जिद नहीं किया.  शायद पूर्वी आ चुकी होगी.   &lt;br /&gt;उन्होंने हाँ में सिर हिलाया. मैंने दरवाजा खोलकर एक पैर बाहर रखा था कि वे बोल पड़े, "सच कहूँ, it was amazing ..."&lt;br /&gt;"क्या...बारिश ?" मैंने उनकी तरफ देख कर कहा.  &lt;br /&gt;"आज की पूरी शाम... thanks for giving me such a beautiful evening."   &lt;br /&gt;मैंने मुस्करा भर दिया. उनकी आँखों में मैंने एक उगते हुए सूरज की लालिमा देखी. उतरकर दरवाजा बंद कर दिया और हाथ हिलाकर उन्हें विदाई दी. उनके जाने के बाद कुछ देर वहीं यूँ ही खड़ी रही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्वी वापस नहीं आई थी. उसका फोन आया कि वो आज रात में नहीं आ पायेगी. शावर लेने के लिये जब बाथरूम में घुसी तो बरबस ही आईने के सामने कुछ देर के लिये ठिठक गई और अपने चेहरे को देखने लगी. यूँ लगा कि अनुराग के आँखों की लालिमा ने मेरे चेहरे को लाल कर दिया है. क्या था यह सब जो इतना सुखद था ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शावर से गिरते पानी की फुहारें जब चहरे पर गिरीं तो लगा कि कुछ देर पहले जिए हुए पल वापस लौटकर आगये हैं... मूसलाधार बारिश...हरी हरी घास और मैं भींगते हुए नाच रही हूँ.     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                               XXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन रविवार को डांस क्लास से जब बाहर निकले तो लान से गुजरते हुए एक बेंच पर हम बैठ गये. कुछ देर तक डांस स्टेप्स के बारे में बातें करते रहे. जब हम चलने को तैयार हुए तो उन्होंने कहा, "अगर तुम्हारे नॉर्मल वोर्किंग आवर्स होते तो हम वीक डेज़ में भी कभी शाम को मिल सकते थे न" मैं उनकी तरफ देखने लगी थी. ऐसा लगा कि जैसे कोई बच्चा बड़ी मासूमियत से चोकलेट माँग रहा हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हम अब भी मिल सकते हैं... शाम में मैं कभी कभी जब वर्क लोड ज्यादा न हो तो एक आध घंटे निकाल सकती हूँ. लेकिन हम ऑफिस में ही मिल सकते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"thats great !" उनकी आँखों में चमक सी आ गई थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परफोर्मेंस में अभी तीन सप्ताह बाकी थे. हम पूरा मन लगाकर अभ्यास कर रहे थे. क्लास में भी हम सबसे अच्छे स्टुडेंट्स में से एक थे. पहली बार स्टेज पर हम नृत्य करने के विचार से मन उत्साह से भरा था. अनुराग कहते थे कि हमारा परफोर्मेंस सबसे अच्छा होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीतते दिनों के साथ साथ हम एक दूसरे को और अधिक जानने लगे थे. हमारा रिश्ता एक प्रगाढ़ता लेने लगा था. अनुराग कभी कभी शाम को ऑफिस आ जाते थे और हम कैंटीन में बैठकर बातें करते. उनकी सानिध्यता बहुत ही सुखद लग रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग में कई बातें मुझे बहुत पसंद थीं. उनकी आकर्षक देहयष्टि से लेकर उनका अदम्य आत्मविश्वास और विचारों की दृढ़ता सब मुझे आकर्षित करती थीं. पहली बार जब हम किसी बात पर सहमत नहीं हो पाए थे और बहस करते करते माहौल थोड़ा गर्म हो गया तो वे बोले- हम दो अलग अलग व्यक्ति हैं. हमारा व्यक्तित्व भिन्न है. इसलिए आवश्यक नहीं है कि हम सदा एक दूसरे से सहमत हो सकें, आवश्यक यह है कि हम एक दूसरे के विचारों का सम्मान कर सकें. और दूसरे पल हम दोनों ही अपने अपने वैचारिक उत्तेजना से बाहर आ गये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा व्यक्तित्व धीरे धीरे घुलकर एक दूसरे में मिलने लगा थ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रविवार को परफोर्मेंस होना था. शुक्रवार को हमने ऑफिस से छुट्टी लेकर प्रक्टिस की. मैं चाहती थी कि परफोर्मेंस में कोई भी त्रुटि न हो. शाम को जब घर पहुँची तो शरीर थोड़ा भारी भारी सा लगा. रात में बुखार आ गया. घर पर पड़ी दवा ली. लेकिन दूसरे दिन सुबह बुखार तेज हो गया तो डॉक्टर के पास गई. उस दिन डांस क्लास जाने की हिम्मत नहीं हुई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँच बजे डांस क्लास से अनुराग का फ़ोन आया. मैंने उन्हें बताया कि बुखार आ गया है. सुनकर वे पल भर के लिये बिल्कुल खामोश हो गये थे. फिर बोले , "अच्छा, मैं आता हूँ". &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग जब आए पूर्वी घर पर ही थी. मेरा मन डूब रहा था कि इतनी मेहनत करने के बाद ऐन वक़्त पर यह क्या हो गया. बहुत ही बुरा लग रहा था. अनुराग को भी बहुत बुरा लगेगा. वे भी कितने उत्साहित थे. मैं उन्हें उदास नहीं देखना चाहती थी. जब वे कमरे में घुसे तो पूर्वी भी साथ में थी. वे एक कुर्सी खींचकर मेरे सिरहाने के पास बैठ गये. मैं थोड़ी ऊपर खिसक कर बैठने की कोशिश करने लगी. पर उन्होंने बैठने से मुझे रोक दिया. पूर्वी मेरे बेड पर ही बैठ गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या हुआ...लगता है शो का ज्यादा टेंशन ले लिया..."  वे मुस्कराते बोले. फिर मेरा हाथ छूकर देखा "अभी भी बुखार है"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सुबह से बुखार एक बार भी पूरी तरह नहीं उतरा. कम हो रहा है फिर आ जा रहा है." पूर्वी ने कहा. फिर अफ़सोस से बोली , "अब तो लगता नहीं कि कल ये जा पायेगी"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कोई बात नहीं, पहले ये ठीक हो जाएँ. परफोर्मेंस तो सेकेंडरी चीज है."  ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कल के परफोर्मेंस के न हो पाने का कोई अफ़सोस हो रहा हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनुराग जी, आप बातें करिए. मैं आपके लिये कॉफी लाती हूँ " कहते हुए पूर्वी उठ खड़ी हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"how are you feeling now?" अनुराग की नज़रें मेरे चेहरे पर टिकी थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरे कारण तुम भी नहीं परफोर्म कर पाओगे...." कहते हुए अनायास मेरी आँखें भरभरा आयीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग ने मेरे माथे पर अपनी हथेली रख दी और बोले, " hey! Dont be silly. वो इतना इम्पोर्टेंट नहीं है. पहले तुम जल्दी से ठीक हो जाओ. उस बारे में बिल्कुल भी न सोचो." मैंने अपनी आँखें बंद कर ली थी. उनकी हथेलियों का स्पर्श मेरे अन्दर समा रहा था. यूँ लग रहा कि जैसे चन्दन का लेप मेरे माथे पर लगा हो और वह मेरे ताप को सोख रहा हो. एक अजीब सा सूकून मिल रहा था. जी कर रहा था कि वे ऐसे ही अपनी हथेली मेरे माथे पर रखे रहें. वे आगे बोले, "हमने किसी परफोर्मेंस या कॉम्पिटीशन के लिये तो क्लास नहीं ज्वाइन किया था. हम तो सिर्फ बेसिक सीखने के लिये गये थे और न ही हमें इस फिल्ड में अपना कैरियर बनाना है" मैंने आँखे खोल दी थी. अपलक उन्हें देखने लगी.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"so, pl dont think and dont worry about that. We enjoyed a lot. हम वहाँ जितना हासिल करने के लिये गये थे उससे कहीं बहुत अधिक हम पा चुके हैं." उन्होंने मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा, "है न ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हूँ..." मैंने सिर हिलाते हुए धीरे से कहा. मेरे होठों पर एक मुस्कराहट उभर उभर आई थी.&lt;br /&gt;तभी पूर्वी कॉफी लेकर आ गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम भी पियोगी ना? " एक स्टूल पर केतली और कप रखते हुए बोली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'why not...मैं पहली बार आया हूँ. गेस्ट का साथ तो देना पड़ेगा न" अनुराग ने हँसते हुए कहा, 'वैसे भी कॉफी नुक्सान करने वाली चीज नहीं है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग ने मुझे सहारा देकर तकिये के सहारे थोड़ा बिठा दिया. मैं लगभग अधलेटी थी. हम तीनो ही कॉफी पीते हुए बातें करने लगे. तभी डांस इंस्टिट्यूट से फोन आया. हमारे डांस टीचर पीयूष ने किया था. उसे मैंने बताया कि कल मेरा परफोर्म कर पाना संभव नहीं है. फोन रखने के बाद मैं अनुराग से बोली, "पीयूष ने तुम्हें पल्लवी के साथ परफोर्म करने का ऑफर दिया था ?" वास्तव में पल्लवी का पार्टनर अभी परफोर्म करने के लिये पूरी तरह तैयार नहीं था. इसलिए पीयूष ने उसे अगले महीने के वर्क शॉप के बाद परफोर्म करने को बोला था.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ कहा था उसने...लेकिन" &lt;br /&gt;"लेकिन क्या...तुमने मना क्यों कर दिया ? "&lt;br /&gt;"मैंने उसके साथ एक दिन भी डांस नहीं किया है. सिंक करने में दिक्कत होती'&lt;br /&gt;"you are too much... सिंक करने में क्या दिक्कत होती. सेम डांस करना है." मैं वास्तव में समझ नहीं पा रही थी कि उन्होंने क्यों मना कर दिया था. मैं आगे बोली "और अगर कोई दिक्कत थी भी तो आज का वक़्त था और कल भी सुबह तुम उसके साथ थोड़ा प्रक्टिस कर सकते थे."&lt;br /&gt;"चलो अब उस बात को छोड़ो...पीयूष ख़ुद उसके साथ परफोर्म करेगा" उन्होंने बात टालते हुए कहा.&lt;br /&gt;'तुम भी न..."      &lt;br /&gt;"देखिये पूर्वी जी, आज मैं पहली बार इनके घर आया हूँ और ये मुझे डांट रही हैं" पूर्वी की तरफ देखते हुए हँसकर बोले.&lt;br /&gt;"डाँटने में तो ये उस्ताद है. बुखार में भी अभी कोई झगड़ा करने को मिल जाय तो बुखार भाग जाएगा" पूर्वी ने हँसते हुए कहा, "गेट के दरबान से लेकर एस्टेट मेनेजर तक सभी कांपते हैं इससे"  हम तीनो ही हँसने लगे.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी डोरबेल बजी. "कौन आ गया इस वक़्त" पूर्वी ने उठते हुए कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आज तुम पहली बार आए और मैं इस हाल में हूँ..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कोई बात नहीं, ठीक हो जाओगी तो फिर आऊँगा और अगली बार कॉफी तुम्हारे हाथ का पियूँगा" अनुराग ने मुस्कराते हुए कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओह्हो तुम हो...आज बड़े दिनों बाद दर्शन दिए" ड्राईंग रूम से पूर्वी की आवाज़ आई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ भाई...खुद तो कभी बुलाते नहीं और आने पर ताना देते हैं. यह भी ठीक है" अंकित की आवाज़ आई, "अन्दर आने की इजाज़त है या वापस लौट जाऊं"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंकित मेरे सबसे अच्छे मित्रों में से एक थे. या यूँ कहें कि सबसे अच्छे मित्र थे. हमने पिछली कंपनी में डेढ़ साल तक एक साथ काम किया था.   बहुत ही जिंदादिल और मजाकिया इंसान थे. कैसा भी माहौल हो उनके आने से हँसी से भर जाती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब आ गये हैं तो कॉफी पीकर ही जाईयेगा. अन्दर आ जाईये" पूर्वी ने कहा. वह भी अंकित से बहुत घुली मिली थी.&lt;br /&gt;"कहाँ हैं मैडम साहिबा?"&lt;br /&gt;"बेडरूम में हैं. आइये...." पूर्वी उन्हें ले आई.&lt;br /&gt;"गुड एवेनिंग....." दरवाजे से घुसते ही बोले, "सुना है कि आजकल आपकी बुखार से दोस्ती हो गई है " मैंने मुस्करा भर दिया.&lt;br /&gt;अनुराग को देखकर थोड़ा ठिठके. पूर्वी ने परिचय करवाया.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वैसे शुक्र है इस बुखार का कि कम से कम आने के लिये मुझे निमंत्रण का इंतज़ार तो नहीं करना पड़ा" कुर्सी पर बैठते हुए बोले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोग काफी देर तक बातें करते रहे. मैं बहुत कम बोल रही थी. ज्यादातर समय मेरी नज़रें अनुराग के चेहरे पर थीं.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब अनुराग और अंकित चले गये तो थोड़ा खालीपन सा हो गया था. अनुराग का आना बहुत ही अच्छा रहा. मेरे मन पर जो एक बोझ सा था वो उतर गया था. आँखें बंद करके लेटी तो माथे पर उनका स्पर्श अभी भी महसूस हो रहा था और उनकी बात "हम वहाँ जितना हासिल करने के लिये गये थे उससे कहीं बहुत अधिक हम पा लिये हैं" मन में एक गुदगुदी सी कर रही थी.&lt;br /&gt;                                            &lt;br /&gt;दूसरे दिन अनुराग ने एक गुलदस्ता भेजा. पूर्वी जब मेरे पास लेकर आई मैं तुरंत जगी ही थी. रंग बिरंगे फूलों का गुलदस्ता था ऊपर से पारदर्शी पोलिथीन से ढंका हुआ. अन्दर एक कार्ड था. मैंने पोलिथीन हटाया और कार्ड निकाला. लिखा हुआ था -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Get Well Soon&lt;br /&gt;-----anurag&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्वी ने कार्ड मुझसे ले लिया और पढ़कर बोली, "ये जनाब तो शब्दों के बड़े कंजूस निकले. इतने बड़े कार्ड में सिर्फ तीन शब्द!" फिर मेरे पास बैठते हुए बोली, "वैसे कितनी इंटेंस आँखें हैं उनकी...शब्दों की उन्हें जरुरत ही नहीं पड़ती होगी." मेरी आँखों में झाँकते हुए कह रही थी. मैं चुप रही. मेरी आँखों में उनका चेहरा उभर आया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तेरा तो मुझे पता नहीं, but I can bet, he is in  love with you...?" वह मुझे छेड़ती हुई बोली. मेरे होठों पर एक मुस्कराहट उभर आई. उसकी बातें मुझे गुदगुदा रही थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी तरह ठीक होने में तीन चार दिन लग गये थे. दुबारा हमने डांस क्लास में एनरोल नहीं कराया. अनुराग ने कहा जितना हमें सीखना था सीख चुके हैं. आगे कुछ नया तो सीखना नहीं है. प्रक्टिस के लिये बेहतर रहेगा कि हम कोई अच्छा सा क्लब ज्वाइन कर लेते हैं. कभी कभार वहाँ जाकर डांस कर लेंगे. समय की भी कोई बाध्यता नहीं होगी. मुझे उनकी बात सही लगी थी और हमने एक क्लब ज्वाइन कर लिया.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                   xxxxxxxxx &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;अक्टूबर आधा बीत चुका था. रात में हवाएँ शीतल होने लगी थीं. बरसात की उमस पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थी. अनुराग से मिले लगभग साढ़े तीन महीने हो चुके थे. इस बीच हम एक दूसरे को पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक समझने लगे थे. एक दूसरे की कही को मानने लगे थे और अनकही को जानने लगे थे. जब वे साथ होते तो मन खिल उठता था. मन में एक अतिरिक्त उर्जा का संचार होने लगता था. कभी कभी मैं उनसे किसी बात के लिये जिद कर बैठती थी. कभी उन्हें छेड़ने लगती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन हम क्लब से लगभग दस बजे निकले थे. बाहर ठंडी ठंडी हवा चल रही थी. पार्किंग से सटा हुआ एक बड़ा सा लान था. और उसके किनारे किनारे गुलमोहर के पेड़ लगे हुए थे. दो पेड़ों के बीच पत्थर के छोटे छूते चबूतरे से बने थे. हम कार के पास पहुँचे तभी अनुराग ने लान की तरफ इशारा करते हुए कहा, "देखो, कितना खूबसूरत लग रहा है".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; "wow !" मेरे मुँह से बरबस निकल गया. सामने लान की हरी हरी घास पर सफेद चाँदनी बिखरी हुई थी. गुलमोहर के पत्तों से छनकर चाँदनी ज़मीन पर एक स्याह-सफ़ेद चादर सी बुन रही थी. गुलमोहर के ढ़ेर सारे फूल नीचे जमीन पर बिखरे हुए थे. सब कुछ इतना मोहक लग रहा था कि मन हुआ बाहें फैलाकर एक पल में सब कुछ अपने अन्दर समेट लूँ. मैंने अनुराग से कहा, "चलो उस गुलमोहर के नीचे चलते हैं..." वे अभी भी खड़े थे. "चलो न...थोड़ी देर के लिये." मैंने उनका हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए कहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लान में आ गये.  मैं अपनी बाहें फैलाकर गोल गोल घूमने लगी, "ओह, कितना सुन्दर है...कितना सुखद है"&lt;br /&gt;अनुराग गुलमोहर के नीचे खड़े चबूतरे पर एक पैर टिकाकर मुझे देख रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं घूमते हुए एक बार थोड़ा सा लड़खड़ा गई. अनुराग बोले , "संभल कर...कहीं मोटू की तरह तुम भी न गिर पड़ना "&lt;br /&gt;सुनते ही मैं खड़ी हो गई और मेरे होठों से हँसी का फव्वारा निकल पड़ा. आज क्लब में लगभग अधेड़ उम्र का एक जोड़ा था. आदमी काफी मोटा था और औरत दुबली पतली. बहुत ही मद्धिम संगीत पर हम लोग टैंगो डांस कर रहे थे कि अचानक थप्पड़ की एक जोर की आवाज़ आई. सब लोग अचानक रूक गये और सबकी नज़र आवाज़ की दिशा में चली गई. देखते हैं कि वह औरत खड़ी थी, उसका टॉप फट गया था. ब्रा झलक रही थी और मोटा आदमी ज़मीन पर घुटनों के बल था. हुआ यह था कि डांस करते समय वो फिसल गया था और गिरने से बचने के औरत के टॉप को पकड़ लिया था. टॉप फटी और औरत ने एक जोरदार थप्पड़ उसे रसीद दिया. वह गिरकर अपने घुटनों के बल आ गया था. दो लोगों ने दौड़ कर उसे उठाया. औरत में अपने हाथों से फटे हुए टॉप के सिरों को जोड़कर पकड़ लिया और उसे गालियाँ देती हुई बाहर चली गई...पीछे पीछे वो भी भागा. उसके जाते ही हाल में हँसी के ठहाके गूँजने लगे. कुछ देर तक सारे लोग हँसते रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हँसते हँसते पेट पकड़ लिया और अनुराग के पास आकर चबूतरे पर बैठ गई. अनुराग खड़े थे. थोड़ा मेरे ऊपर झुक गये. और बोले, "जानती हो, हँसते हुए तुम बहुत खूबसूरत लगती हो..." . उनकी आँखों में एक अजीब सी अधीरता दिखाई दे रही थी. मेरी हँसी रूक गई. मैं अपलक उन्हें देखने लगी. उनके चेहरे पर कुछ ऐसे भाव थे कि जैसे कोई तूफान उमड़ना चाह रहा हो और उसे वे दबाने की कोशिश कर रहे हों. जैसे कि नील सागर उलट कर बरसने को उद्यत हो और उसे वे रोकने की कोशिश कर रहे हों. मेरी धड़कने थोड़ी तेज हो गई थीं. मेरे आँखों में झाँकते हुए बोले, "सुनो, मैंने एक सपना देखा है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या???" मेरे होठों से फुसफुसाहट निकल गई.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैंने देखा...सफ़ेद हिम खण्डों के जुड़े हुए टुकड़ों की तरह दूर दूर तक फैले हुए बादलों की धरती...उस पर मेरे चाहत के रंग बिरंगे से पुष्पों से बना एक घर...घर के बाहर एक झूला जिसपर तुम बैठी हो...तुम्हारे चेहरे की आभा चारो ओर बिखर रही है सूरज के किरणों की तरह...तुम्हारी खिलखिलाहट होठों से निकलकर धरती पर फूल बनकर उग रही है...मैं तुम्हें झुला रहा हूँ...अनवरत...अनंत काल तक" उनकी आवाज़ भावात्मक तीव्रता से काँपने सी लगी थी. मेरी आँखें बंद हो गई थीं. मैं उन शब्दों में डूबने उतराने लगी थी. उन्होंने आगे कहा,"बोलो वाणी, क्या मेरे सपने को तुम सच करोगी " ओह, उनके शब्दों में कितना कातर आग्रह था. कितना नेह था. मैं चुप थी. बिल्कुल किन्कर्त्व्यविमूध. एकदम सम्मोहित.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कुछ बोलो वाणी..." वे मेरे पास बैठ गये थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या कहूँ...तुम्हारे सपने के सम्मोहन में खो गई हूँ...यकीन नहीं हो रहा है कि यह सुख मेरा है...यकीन नहीं हो पा रहा है कि तुम्हारे सपने में जो है वह मैं ही हूँ...बोलो अनुराग क्या सच में वह मैं ही हूँ जिसके लिये तुमने यह सब कहा."         &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ वाणी...तुम्ही हो मेरे सपने का मूर्त रुप..." उनकी बायीं हथेली मेरे गालों पर टिक गई थी. उंगलियाँ मेरे कानो को सहला रही थीं. उनके शब्द फुहार की तरह झर रहे थे, "तुम्ही हो जिसे देखा था मैंने बचपन की परी-कथाओं में...जिसे सुना था गाते हुए अमराइयों में... जिसे पाया था मुस्कराते हुए फूलों में...जिसे छुआ था गंगा की लहरों में..." उनके शब्द अमृत धार की तरह मेरे प्राणों में उतरने लगे थे, "तुम्ही हो जिसे महसूस किया था किशोरावस्था की उन्नीदी आंखों में..." मेरा कण कण सिक्त होने लगा था, "तुम्ही हो जिसे ढूँढता रहा उम्र भर...जिसे सोचता रहा हर पल...सुनो ! तुम मेरी ही आत्मा का एक टुकडा हो"  मैं आकंठ भर गई थी. यूँ लग रहा था जैसे मैं हवा में उड़ रही हूँ. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"ओह, इतना नेह !!!"  मैंने अपना माथा उनके कंधे पर टिका दिया, "एक दबी सी लालसा सिर उठाने लगी है ...कैसे दबाऊं उसे ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मत दबाओ"&lt;br /&gt;"बहुत चंचल है... मेरा कहा नहीं मानती..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरे पास आने दो"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"फिर वापस आना नही चाहेगी... बड़ी हठी है! "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरे पास रह जाएगी “&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कहीं टूट कर बिखर गई तो..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं बिखरने दूंगा...मैं रोप लूँगा उसे अपनी पलकों में"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओह अनुराग !!!...." मैं उनके गले से लिपट गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आई लव यू वाणी" मेरे कानो में वे फुसफुसाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आई लव यू टू अनुराग"     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी ही देर तक हम वैसे ही बैठे रहे...निःशब्द...बिना कुछ कहे. हमारी धड़कने एक दूसरे को छू रही थीं. हमारे साँसे एक दूसरे को सहला रही थीं. हमारे अहसास एक दूसरे से संवाद कर रहे थे. हम चुप थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे तेज बारिश के बाद सूर्य की पीली किरणों की मद्धिम चमक में धुला धुला वातावरण मोहक लगता है. वैसे ही सब कुछ बहुत ही रमणीय लग रहा था.  बाहर भी और अन्दर भी.  &lt;br /&gt;                                                               &lt;br /&gt;अनुराग ने मेरे चारों तरफ सपनो की एक दुनिया बना दी थी.  मैं हर वक़्त उसी में रहना चाहती थी . लग रहा था कि मैंने अब तक उन्ही की प्रतीक्षा की थी. हर पल उनके प्रेम से आनंदित रहने लगा. हर साँस उनके अहसास से सुवासित रहने लगी. उनकी आँखों में जब स्वयं की तस्वीर देखती तो वह दुनिया का सबसे सुन्दर दृश्य होता था. मैं चाहती थी कि समय वहीं ठहर जाए. शाम के धुंधलके में पार्क के किसी पेड़ के तने से टिककर जब वे मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भर लेते और कहते "आई लव यू", उनका चेहरा भाव की सघनता से भर जाता और भौहें जुड़ सी जाती थीं, मैं उनके शब्दों से अंदर तक भींग जाती थी. जब कभी वे मुझे बाहों में अपने सीने तक उठाते और मेरे चेहरा उनके चेहरे पर झुक जाता था. मुझे लगता था मैं सात आसमानों के ऊपर हूँ. जब कभी मैं उनके कंधे पर सिर टिकाकर बैठी होती और वे मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर मेरे प्रति अपनी भावनाएँ प्रकट करते तो यूँ लगता कि जैसे मैं किसी अनजान नदी में बही चली जा रही हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी पहले की दुनिया मुझसे छूट रही थी. कहीं भी रहती हर पल अनुराग की प्रतिच्छाया मुझे घेरे रहती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;XXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन मैं अनुराग का पोर्ट्रेट बना रही थी. तय हुआ था कि वे शनिवार और रविवार दो दिन ३-३ घंटे निकालेंगे. उस दिन रविवार था. हमारा फ्लैट दो बेडरूम का था. एक कमरे में बेड था जिसमे मैं और पूर्वी सोते थे. दूसरे कमरे में मेरी पेंटिंग्स के सामान रखे थे. उसी में अनुराग का पोर्ट्रेट बना रही थी. एक कुर्सी पर वे बैठे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग तीन बज रहा होगा.  पूर्वी खाना खाकर बेडरूम में लेटी थी. तभी डोरबेल बजा. मैंने दरवाजा खोला तो सामने गौरव, ऋषभ, विनोद, और प्रीति खड़े थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओह्हो...आज तो पूरी फ़ौज एक साथ..." सभी अन्दर आ गये. मेरे हाथ में अभी भी ब्रश था.&lt;br /&gt;"पेंटिंग कर रही थी ?" गौरव ने पूछा.&lt;br /&gt;"हाँ, किसी का पोर्ट्रेट बना रही हूँ."&lt;br /&gt;"अरे तुमने प्रोफेसनली पेंटिंग कब शुरू कर दी.." ऋषभ ने मजाक किया.&lt;br /&gt;'किसका पोर्ट्रेट बना रही हो..देखें तो" प्रीति बोली. सारे के सारे पेंटिंग रूम में आ गये. अनुराग से सभी का परिचय कराया. फिर हमलोग वापस ड्राइंग रूम में आकर बैठ गये. पूर्वी भी आ गई थी.&lt;br /&gt;"आज हम लोग तुम्हें पार्टी के लिये इनवाईट करने आए हैं" गौरव ने कहा.&lt;br /&gt;"किस ख़ुशी में पार्टी दे रहे हो ?" मैंने पूछा &lt;br /&gt;"पार्टी मैं नहीं बल्कि अंकित दे रहा है" गौरव ने कहा, "बल्कि यूँ कहो कि हम जबरदस्ती ले रहे हैं"&lt;br /&gt;"प्रमोशन हुए चार दिन हो गये और महाशय बात को दबाकर बैठे थे" विनोद बोले, " वो तो आज अचानक सुमीत मिल गया तो पता चला"   &lt;br /&gt;'दैट्स ग्रेट! काफी समय से वो इसका वेट कर रहा था. रुको मैं उसे कोंग्रचुलेट कर दूँ." मैं अंकित को फ़ोन मिलाया.&lt;br /&gt;एक डेढ़ घंटे के बाद सारे वहाँ से चले गये. अनुराग को भी आने के लिये कह गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छी खासी मंडली बना रखी है" उनके जाने के बाद अनुराग ने कहा.&lt;br /&gt;"हाँ, ये है हमारी पूरी मंडली. सारे के सारे बहुत अच्छे हैं"  मैंने कहा, " अब आज तो पोर्ट्रेट पूरा हो नहीं पायेगा."&lt;br /&gt;"ठीक है. आज तुम पार्टी एन्जॉय करो...मैं चलता हूँ अब. तुम लोगों को तैयार भी होना पड़ेगा न."    &lt;br /&gt;' क्यों...तुम नहीं आ रहे हो पार्टी में ?"&lt;br /&gt;"वाणी, मैं कैसे आ सकता हूँ. जो पार्टी दे रहा है उसे मैं ठीक से जानता भी नहीं और न ही उसने इनवाईट किया है"&lt;br /&gt;"अब इतने भी फ़ॉर्मल न बनो...अंकित से मिल तो चुके हो तुम एक बार और रही बात इनविटेशन की तो सारे ही तुम्हें इनवाईट कर गये हैं और यदि उतना काफी नहीं है तो मैं तुम्हें इनवाईट करती हूँ" मैंने उनकी आँखों में शरारत से झाँकते हुए कहा.&lt;br /&gt;"वेल...अब मैं चलता हूँ"&lt;br /&gt;"सीधे वहीं अंकित के फ्लैट पर आ जाना"  मैंने उन्हें अंकित का पता दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;पार्टी पूरे जोरों पर थी. सारे के सारे नाच रहे थे. कुछ देर बाद मैंने अचानक प्लयेर बंद कर दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या हुआ ?" सबकी निगाहें मेरी तरफ उठ गयीं.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब आज का स्पेशल परफोर्मेंस" और मैंने सालसा कि म्यूजिक चला दी और अनुराग के पास आ गई. उनके साथ डांस करने लगी. हमारा डांस ख़त्म होते ही. गौरव मेरे पास आ गये और बोले " एक बार मेरे साथ" मैं उनके साथ डांस करने लगी. गौरव भी अच्छा नाचते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग हाल के किनारे पर लगी कुर्सी पर बैठ गये. जब हमारा डांस ख़त्म हुआ तो ऋषभ ने फिर से फ़िल्म म्यूजिक चला दी और सारे डांस करने लगे. अनुराग कुर्सी पर ही बैठे रहे. मैंने अनुराग को उठने के लिये उनका हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोली -"आओ न, लेट्स डांस"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं मन कर रहा है..feeling tired" उनकी आवाज़ सर्द थी. चेहरे पर कुछ उद्विग्नता सी दिखी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या हुआ... तबियत तो ठीक है न ?" मैं उनके माथे पर हाथ रखती हुई बोली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ ठीक है...बस कुछ मन अच्छा नहीं है  " वे खड़े हो गये , "मुझे जाना चाहिए अब..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यूँ अचानक...अभी तो खाना पीना भी नहीं हुआ है...क्या बात है, "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कहा न कोई बात नहीं है...बस मन ठीक नहीं है" उनकी आवाज़ थोड़ी सी ऊँची हो गई थी. बाकी लोग भी पास में आ गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने अंकित से हाथ मिलाते हुए कहा, "I am leaving now...once again congratulations for the promotion and thanks for the party" फिर सबकी ओर हाथ हिलाते हुए बोले , "ok guys, bye...enjoy the party"   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"खाना तो खाकर जाते' अंकित ने कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सॉरी यार ..खाने का मन नहीं हो रहा है...not feeling well" और हाथ हिलाते हुए फ्लैट से बाहर निकल गये. उनके जाने के बाद थोड़ी देर तक खामोशी हो गई. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो गया था. अब लोग एक दूसरे की आँखों में यही तलाश रहे हे कि क्या हुआ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"I think It happened because of me" गौरव ने खामोशी को तोड़ते हुए कहा, "मुझे लगता है कि उन्हें वाणी के साथ मेरा डांस करना अच्छा नहीं लगा. दूसरा कोई और कारण तो समझ में नहीं आ रहा है"&lt;br /&gt;पार्टी लगभग वहाँ पर रुक गई थी. मुझे बहुत बुरा लग रहा था. &lt;br /&gt;                                                       &lt;br /&gt;दूसरे दिन ऑफिस में अनुराग का फोन आया. कल की घटना के कारण मन खिन्न था. जो कुछ भी वे कह रहे थे मैं सिर्फ हाँ या ना में जवाब दे रही थी. "शाम को आ रहा हूँ" कह कर उन्होंने फ़ोन रख दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को हम कैंटीन में बैठे थे. कुछ देर दोनों खामोश रहे. मेरी समझ में नहीं आ रहा  था कि क्या कहूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नाराज़ हो ?" उन्होंने पूछा. मैं चुप रही...."I am sorry. मुझे पार्टी छोड़कर उस तरह नहीं आना चाहिए था" वे बोल रहे थे और मैं शून्य में देख रही थी.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"you are so possessive? "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"Yah...I am...I am very possessive...मैं ये भी जानता हूँ कि यह गलत है, मुझे ऐसा नहीं होना चाहिए...." कुछ रुक कर बोले, "लेकिन पता नहीं क्या हो गया था तुम्हें गौरव के साथ डांस करते देखकर."  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या चाहते हो कि मैं अपने सारे दोस्तों से सम्बन्ध तोड़ लूँ ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं, ऐसा तो मैं बिल्कुल नहीं चाहता..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनुराग, वे सारे मेरे दोस्त हैं जो मेरे साथ इतने सालों से हैं. मेरे हर सुख-दुःख में मेरा साथ दिया है उन्होंने....तुम ऐसा करोगे तो कैसे चलेगा....."     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी तक मेरा और अनुराग का सम्बन्ध बिल्कुल एकाकी रहा था. हमारे बीच किसी और की उपस्थिति नहीं होती थी. कल पहली बार अन्य लोगों की उपस्थिति में हम मिले थे. उनका पोसेसिव होना मुझे अच्छा नहीं लगा था. उस पर से पार्टी में इस ढंग से व्यवहार की अपेक्षा मैंने नहीं की थी. हालाँकि आज उन्होंने अपने व्यवहार पर अफ़सोस प्रकट किया था. फिर बहुत देर तक मन अशांत रहा.  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मैंने स्वयं को समझाया- शायद यह एक  क्षणिक बात थी. अनुराग ने मुझे अब तक किसी के भी साथ इस तरह नहीं देखा था. एकदम से ही ऐसी स्थिति उनके सामने आ गई थी इस कारण ही वह एक तात्कालिक प्रतिक्रया रही होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                   XXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फरवरी शुरु हो गया था. ठण्ड काफ़ी कम हो चुकी थी. फिर भी शाम में ६.३० बजे तक धुंधलका छाने लगता था. उस दिन अनुराग आए तो आते ही बोले - आज तुम्हारे लिए एक सरप्राईज़ है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या... ?" मेरी प्रश्नवाचक नजरें उनके चेहरे की तरफ उठीं.&lt;br /&gt;"उसके लिए तुम्हें मेरे साथ चलना होगा...तुम्हारे पास एक-दो घंटे हैं?&lt;br /&gt;"अधिक टाइम तो नहीं लगेगा...? ८.३० पर मेरी एक मीटिंग है"&lt;br /&gt;"तब तक हम वापस आ जाएँगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग ने अपनी कार एक नए बने हुए हाऊसिंग काम्प्लेक्स के अन्दर रोकी तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ और उत्सुकता भी. "किसी से मिलना है ?"&lt;br /&gt;"आओ तो..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने चारो तरफ निगाह दौडाई. बिल्कुल नयी कालोनी थी. कुछ फ्लैट से रोशनी आ रही थी. लेकिन अधिकतर फ्लैट अभी खाली लग रहे थे. मैं समझ नहीं पा रही थी कि वे मुझे क्या  सरप्राईज़  देने वाले हैं. लिफ्ट से एक बिल्डिंग के  ११वें फ्लोर पर हम आ गये. अनुराग ने जेब से चाभी निकाल कर एक फ्लैट का दरवाजा खोला. हम दोनों अन्दर आ गये. अनुराग ने बिजली का स्विच ऑन किया. पूरा कमरा खाली था. सिर्फ फर्श और दीवारें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"This is our house !" अनुराग की आवाज़ खाली कमरे में गूँज उठी. बहुत ख़ुशी थी उनकी आवाज़ में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"what...!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ वाणी, यह हमारा घर है....", उन्होंने मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भरते हुए कहा, " हमारा घर..मेरा और तुम्हारा घर" उनकी आँखों में ख़ुशी तैर रही थी. "मैंने यह घर खरीदा है...अपने लिए...मेरे और तुम्हारे लिए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'oh my god, I cant believe this"   मैं आश्चर्य चकित  थी. "तुमने कभी बताया नहीं ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“बता देता तो तुम्हारी आँखों में मुझे यह ख़ुशी देखने को कैसे मिलती" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर अचानक अनुराग अपने घुटनों पर बैठ गये और मेरा दायाँ हाथ अपने हाथ में लेकर बोले- will you marry me? मेरी आँखें ख़ुशी से छलक उठीं. मैंने लगभग रुँधते गले से कहा "yes, I will"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग उछलकर खड़े हो गये और मुझे अपने आलिंगन में ले लिया. मेरे गालों को चूमा और कहा- "I love you, Love you so much my darling"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओह, कितना खूबसूरत था वह पल. किसी सपने की तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर अनुराग मुझे घर दिखाने लगे. हम ड्राइंग रूम में थे "इस दीवार पर तुम्हारी पेंटिंग्स लगायेंगे और सामने वाली दीवार पर हमारी फोटो रहेंगी...." फिर हम एक रूम में आ गये. "इस रूम में तुम्हारा कैनवास रहेगा...यहाँ तुम पेंटिंग्स बनाना. देखो इसकी विंडो कितनी बड़ी है. कितना खूबसूरत दिखेगा बाहर". फिर हम दूसरे कमरे में आ गये. "यह कमरा हमारे बच्चों का रहेगा...." अनुराग की बात सुनकर मेरे गाल शर्म से सुर्ख़ हो गये. मैंने उनके सीने में मुँह छिपा लिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग मुझे एक दूसरे कमरे में ले आए जो दोनों कमरों से बड़ा था. "और यह हमारा बेडरूम होगा" &lt;br /&gt;हम खिड़की के पास खड़े हो गये. "यहाँ बस हम और तुम होंगे....हमारा प्यार होगा" अनुराग में पीछे से मुझे अपनी बाहों में भर लिया था. उन्होंने अपनी ठुड्डी मेरे कंधे पर टिका दी थी. बाहर कुहरा झरने लगा था. सड़क के लेम्प पोस्टों की रोशनी धुंधली लग रही थी. गाड़ियों की हेड लाईट्स दीयों की तरह टिमटिमा रही थी. अनुराग की गर्म साँसें मेरे कर्ण पट को छू रही थीं. उन्होंने मेरे गालों को चूमा और मेरे कानो में फुसफुसाए " आई लव यू".  मेरी आँखें बंद हो गयीं. ऐसा लगा कि मैं उड़ रही हूँ.   अनुराग ने हाथ बढ़ाकर खिड़की खोल दी. कुहरे का एक झोंका सा अन्दर आ गया. एकदम से मेरे चेहरे को ठंडा कर दिया. मैं  उनकी तरफ मुड़ी और  उनके सीने पर अपना चेहरा रख दिया. अनुराग ने मुझे अपने आलिंगन में ले लिया. उनकी स्नेहमय उंगलियाँ मेरे पीठ पर और बालों में घूमने लगी थी. उनका स्पर्श मेरे प्राणों को छू रहा था. उन्होंने अपनी उंगली मेरी ठुड्डी पर रखकर मेरा चेहरा ऊपर उठाया. उनकी आँखों में प्रेम और लालसा की अग्नि प्रज्वलित थी. उस अग्नि की लपटें मेरे मेरी आँखों को छूने लगीं, मेरे चेहरे को छूने लगी, मेरे अंतह में उतरने लगी. मेरे होठ सूखने लगे. उन्होंने अपने होठ मेरे होठो पर रख दिए. ओह, एक विद्युत् दौड़ गई मेरे शिख से नख़ तक...मेरी धमनियों का रक्त ज्वार सा उफन उठा. मेरी बाहें उनके गले में लिपट गयीं. हमारी तप्त साँसे एक दूसरे में घुलने लगी. आलिंगन की प्रगाढ़ता बढ़ने लगी, स्पर्श सघन होने लगा. हम बढ़ रहे थे बरसाती नदियों की तरह, हम बढ़ रहे थे किसी टूटे बाँध के निर्बाध जल प्रवाह की तरह, हम उफन रहे थे पूनम की रात में समुद्र की लहरों की तरह. उस प्रवाह में हमारे वस्त्र  गात से अलग होते गये . हवन कुण्ड से धधकते मेरे अंग प्रत्यंगों पर अनुराग के अधरों का स्पर्श घृत की तरह मेरी लपटों को और बढ़ा रहा था. कमरे की ठंडी हवा उष्ण होने लगी थी. फर्श के पत्थरों की ठंडक विलुप्त हो गई थी. पल पल आतुरता बढ़ रही थी, एक दूसरे में समाहित हो जाने की, एक दूसरे में विलीन हो जाने की. अनुराग का स्पर्श मेरे गात पर प्रेम की गाथा लिखा रहा था. वे घने मेघों की तरह मुझ पर आच्छादित होकर प्रेम रस की वर्षा कर रहे थे. हम एक दूसरे से जुड़ रहे थे. वे मुझमे समाहित हो रहे थे, मुझमे धड़क रहे थे. मैं पल पल टूट रही थी, पल पल जुड़ रही थी, पल पल खिल रही थी.  कामना के अश्व पर सवार हम तृप्ति के शिखर पर पहुँच गये. प्रवाह रुक गया. चेतना लौट आई. हमने अपने वस्त्र पहने. अनुराग ने मेरे माथे और गालों को चूमा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी देर हो चुकी थी. हम जल्दी से वहाँ से निकले. अनुराग मुझे ऑफिस में छोड़कर चले गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                    XXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन मेरा जन्म दिन था. अनुराग ऑफिस के काम से कहीं बाहर गये थे. जन्म दिन की बधाई देने के लिए सुबह से मेरे मित्रों के फोन आने लगे थे. हर बार जब फोन की घंटी बजती तो मैं सोचती कि अनुराग का फोन होगा. लेकिन दोपहर तक उनका फोन नहीं आया. मैं जानती थी कि वे बाहर आते थे तो बहुत व्यस्त होते थे. दोपहर के बाद उनका फोन आया. मैं सोच रही थी कि वे मुझे जन्मदिन की बधाई देंगे, लेकिन दस मिनट तक बात करने के बाद उन्होंने फोन रख दिया. जन्म दिन के बारे में कुछ नहीं बोले. मन थोड़ा उदास हो गया. मुझे लगा कि वे भूल गये हैं. फिर मैंने सोचा कि हो सकता है शाम तक उन्हें याद आ जाय. हल पल यही सोचती थी कि कब वे मुझे फोन करें और कहें- हैप्पी बिर्थ डे स्वीटहार्ट. रात में उन्होंने फोन किया और हम देर तक बातें करते रहे. कई बार मन में आया कि उन्हें बता दूँ कि वे भूल गये हैं. लेकिन पहले तो मन में थोड़ा क्षोभ था कि वे कैसे भूल सकते हैं. मेरे जन्म दिन का उनके लिए कोई महत्त्व ही नहीं है.  और यदि भूल गये हैं तो फिर मैं क्यों बताऊँ. फिर यह सोचकर भी नहीं बताया  कि उनका इस तरह मेरा जन्म दिन भूल जाना हमेशा के लिए मुझे विनोद का एक कारण मिल जाएगा और मैं उन्हें इस बात के लिए छेड़ती रहूँगी.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन वे वापस आए और शाम में मुझसे मिलने आए. कल बर्थ डे पर पूर्वी ने जो ड्रेस दिया था वह मैंने आज पहना था.  बातों के दौरान वे पूछ बैठे " नयी ड्रेस है ?" मैंने बताया कि कल पूर्वी ने जन्म दिन के उपलक्ष्य पर दिया  थी. &lt;br /&gt;उनका चेहरा एकदम फक्क हो गया. "ओह, मैं तुम्हारा जन्म दिन कैसे भूल गया" उनके चेहरे पर ग्लानि थी. फिर धीरे से बोले, "आई ऍम सो सोरी"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इट्स ओके. मुझे पता था कि तुम भूल गये थे" मैने बिल्कुल शान्त स्वर मे कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे कुछ सोचते हुए बोले- लेकिन ये बताओ तुमने मुझे याद क्यों नहीं दिलाया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैं क्यों याद दिलाती. वैसे भी मेरा जन्मदिन कोई बहुत महत्वपूर्ण नहीं है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरे लिए महत्वपूर्ण है. तुम मुझे उस सुख से कैसे वंचित कर सकती थी. अगर मैं भूल भी गया था तो तुम मुझे बता सकती थी."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे मन में पहले से ही क्षोभ था और ऊपर से उनका मुझे दोषी ठहराना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा. मैं तिलमिला उठी,"तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण रहता तो तुम इस तरह से भूल न जाते. गलती तुमने की और दोषी मुझे ठहरा रहे हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिस इस लिमिट.....हमेशा डिफेंड क्यों करने लगते हो...अपनी गलतियों को स्वीकार क्यों नहीं कर पाते." कहते कहते मेरी आँखों मे बरबस ही आँसू  छलक आए.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात मे उन्होने फोन किया. जब मैं किसी बात से दुखी हो जाती थी तब वे बार बार फोन करते और प्यार जताते. जब उन्होने कहा, "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ", मैँ बोल पडी- ये कैसा तुम्हारा प्यार है अनुराग ओ मुझे बार बार इतना कष्ट देते हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई दिनो तक मैँ अन्मनयस्क रही. पार्टी वाली घटना के बाद भी कुछ एक बार ऐसा हुआ कि हमारे बीच किसी बात को लेकर तकरार हुई थी. धीरे धीरे उनके कुछ दोष उभर कर आए थे. जैसे कि वे बहुत जिद्दी थे और अपनी आलोचना कभी स्वीकार नहीं कर पाते थे.  किसी भी बात में अपनी गलती कभी भी नहीं मानते थे. उनका यह स्वभाव मुझे कष्ट देता था.  जब वे अपने विचार मुझ पर थोपते तो मेरा आत्मसम्मान बुरी तरह आहत हो जाता और मैं सोचने पर विवश हो जाती कि यह सब किसलिए? लगता कि मेरा व्यक्तित्व कहीं गुम सा होता जा रहा है. यह सोच मेरे लिये बहुत कष्टकारी  हो जाती. घन्टों यूँ ही बैठकर सोचती रहती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी कुछ दिन पहले वे घर आए थे. हम बातें कर रहे थे. इस बीच मेरे एक मित्र सुबोध का फोन आ गया. सुबोध इधर कई दिनों से परेशान था. उसका ब्रेक ऑफ हो गया था. बहुत व्यथित था. जब मैंने फोन रखा तो अनुराग के होठों पर एक उपेक्षा पूर्ण मुस्कराहट थी और वे बोल पड़े - "poor stupid fellow "  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"dont be judgmental" अनुराग की प्रतिक्रया पर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ और मैं खीझ उठी, " तुम उसके बारे में बिना कुछ जाने ही कैसे इस तरह का कमेन्ट कर सकते हो"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इसमे जजमेंटल होने जैसा कुछ नहीं है...जितनी तुम्हारी बात फोन पर सुना उतना ही समझने के लिए पर्याप्त था " उन्होंने दृढ़ता से कहा," और इसमे जानने जैसा भी क्या है. एक लडकी, एक लड़के को छोड़ रही है और वह लड़का सहानुभूति के लिए अपने आँसुओं का विज्ञापन करता फिर रहा है... Thats it " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"प्लीज स्टॉप ईट, अगर तुम दूसरों की भावनाओं को समझ नहीं सकते तो कम से कम उनके बारे में इतने रूड कमेन्ट न पास करो.  और वो भी मेरे किसी दोस्त के बारे में."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हुंह, भावनाओं को नहीं समझ सकते, " उन्होंने व्यंगात्मक लहजे में कहा. "i hate cheap emotions"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"प्लीज, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है इस बारे में"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सीधी सी बात है- If you are left by someone, it means you deserve to be left" वे बोले जा रहे थे, 'अरे यार अगर तुम्हारी गलती के कारण कोई तुम्हें छोड़कर जा रहा है तो उसे स्वीकार करो और यदि अपनी गलती से कोई जा रहा है तो वह तुम्हारे साथ रहने के काबिल नहीं था. इसमें लोगों के सामने टेसुयें बहाने से क्या फायदा है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कह चुके जो कहना था या कुछ और बाकी है ?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग चुप हो गये. हमारे बीच एक ख़ामोशी फैल गई. मन बहुत खिन्न हो गया था उनकी बातें सुनकर. कहीं यह लग रहा था कि उनके मन में मेरे और मेरे आसपास के लोगों के विचारों का कोई सम्मान नहीं था. मैं आहत थी. कुछ देर बाद वे चले गये. मैं वहीँ बैठी सोचती रही.    &lt;br /&gt;         &lt;br /&gt;मैं जानती थी कि वे मेरे पुरुष मित्रों के प्रति सहृदय नहीं थे. उनकी बातों से जब मन आहत होता तो संयत होने में एक-दो दिन लग जाते.  वैसे तो वह एक छोटी सी घटना थी किन्तु जो बात खल रही थी वह यह कि दूसरे की बात कभी भी वे न तो सुनना चाहते थे और न ही समझना. किसी भी विषय में उनका अपना एक दृढ मत होता था. जिसे सिद्ध करने में वे दूसरे की भावनाओं को भी भूल जाते थे. यहाँ तक की मेरी भावनाओं कि भी परवाह न करते. एक अजीब सी जिद थी उनके अन्दर. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा भी नहीं था कि वे संवेदनशील नहीं थे. उनकी संवेदनाओं ने मेरे हृदय को छुआ था. उन्होंने मुझे वे पल दिए थे जिनकी मैंने कल्पना की थी. शुरूआती दिनों में जब हम निकट आ रहे थे तब हर बात पर उनकी प्रतिक्रया वैसी ही होती थी जैसा मैं अपने मन में सोचती थी. किन्तु कुछ विषयों में, या बहुत से विषयों में हमारी सोच बहुत भिन्न होने लगी थी जो एक टकराव की स्थिति उत्पन्न कर देती थी. &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;अनुराग को मेरी चुप्पी खलती थी. इस बात से मैं अनभिज्ञ  न थी. लेकिन जब भी कोई इस तरह की बात होती तो मन में अजीब सी खामोशी घिर आती. एक अजीब सा अन्धकार छा जाता अन्तह में. अनुराग कोशिश करते कि मैं जल्दी से सामान्य हो जाऊँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उन्होने कहा - चलो कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चलते हैं.&lt;br /&gt;"कहाँ ?"&lt;br /&gt;"शिमला जा सकते हैं." &lt;br /&gt;अगले वीकेंड पर हम शिमला चले गये. वे तीन दिन जीवन के सबसे खूबसूरत दिन थे. अनुराग हर पल मुझे खुश रखने का प्रयास कर रहे थे. उनके सानिध्य, उनके  स्पर्श और उनके प्यार से मन पर पड़ी काली छाया पूरी तरह मिट गई थी. जब बर्फ की बारिश में उनके आलिंगन में खड़ी हुई थी, लगभग अपना चेहरा उनके ओवरकोट में छुपाकर और उनकी बाहों ने मुझे ढँक लिया था, गिरते बर्फ की श्वेत आभा मेरे मन को बिल्कुल उजला कर दी थी. कितनी देर तक हम यूँ ही खड़े रहे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ी की चोटी पर बने मंदिर के पार्क में खड़े होकर दूर तक फैले पहाड़ियों और उनपर उगे घने पेड़ों के सौन्दर्य को देखते हुए अनुराग बोले- वाणी, जी चाहता है यहीं पर रह जाएँ. वापस लौट कर न जाएँ. &lt;br /&gt;"सच्ची...यहाँ से वापस जाने का मन नहीं करेगा"  &lt;br /&gt;"चलो उस पहाड़ी की चोटी पर अपना एक घर बना लेते हैं और वहीं रहते हैं. सिर्फ मैं और तुम. हमारे बीच में कोई न होगा. न काम, न ऑफिस, न ही और कुछ. हम सारी उम्र एक दूसरे में खोये हुए प्यार करते रहेंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओह, कितना सुखद होगा, सच में ." मैं उनसे लिपट गई थी.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भरते हुए कहा- सुनो, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ... तुम ही मेरा सर्व सुख हो.&lt;br /&gt;"और तुम मेरे सर्वस्व हो" मैंने कहा, " मेरी समस्त कामनाओं का साकार तुम्ही हो".  असीम सुख था उन पलों में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात में होटल के कमरे में मेरे चेहरे पर झुकते हुए उन्होंने कहा था- जाने क्या बिखरा हुआ है तुम्हारे चेहरे पर, जिसे मैं हर पल अपने होठों से चुनते रहना चाहता हूँ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सिर्फ चेहरे पर....?" मैंने मुस्कराते हुए कहा. एक शरारत सी मन में उभर आई थी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन फ्लैट पर हमारा मिलन आवेग जनित था. लेकिन आज हम  एक दूसरे को जी रहे थे. उस दिन हम पहाड़ी नदी की तरह अति वेग से प्रवाहित हुए थे. आज हम मैदानी नदी की तरह धीरे धीरे बह रहे थे.  एक दूसरे में डूबते उतराते, एक अनिर्वचनीय सुखद यात्रा पर अग्रसर थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन तीन दिनों का सुबह, शाम, हर पल वैसा ही था जैसे पलों की मैंने कल्पना की थी. पूरी तरह भर गई थी मैं. वहाँ से वापस लौटकर आने का मन नहीं कर रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौटने के कई दिनो बाद तक हमारे बीच सब कुछ बहुत अच्छा चलता रहा. हम प्राय: रोज ही मिलते. अपने भविष्य के सपने बुनते. शनिवार और रविवार को पूरा दिन हम साथ ही बिताते.  दस - ग्यारह बजे घर से निकल जाते. कभी किसी चित्र प्रदर्शनी मे चले जाते. कभी प्ले देखते. कभी दिल्ली हाट जाकर कुछ शोपिन्ग करते. कभी प्रगति मैन्दान की सीढ़ियों पर यूँ ही हाथ मे हाथ डालकर देर तक बैठे रहते. शाम को क्लब  चले जाते और देर तक डांस करते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार मेरी डेट्स नही हुई. जब डाक्टर ने बताया कि मैं प्रेग्नेन्ट थी, मेरी आँखें खुशी से चमक उठीं. मातृत्व की अनुभूति से रोम रोम रोमान्चित हो उठा. मैं तुरन्त अनुराग को फोन करके बताना चाहती थी. वे कितने खुश होंगे. अब हमे जल्दी ही शादी करनी पडेगी. मैं अनुराग को फोन करने जा रही थी कि तभी याद आया कि अगले महीने उनका जन्म दिन है. मैने सोचा कि इससे अच्छा जन्म दिन का तोहफा उनके लिये दूसरा कुछ न होगा. मैं रुक गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात मे सोते समय कितने ही सपनों ने आकर घेर लिया था. हमारा घर, हमारी शादी, हर पल अनुराग का साथ और सबसे अधिक सुखद माँ बनने का यहसास. हमारा प्यार अन्कुरित हो रहा था मेरे गर्भ में.  रह रह कर मन पुलकित हो उठता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                              XXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अनुराग को लेकर अब थोड़ी सतर्क हो गई थी.  चाहती थी कि ऐसी स्थितयां न उत्पन्न हों जिनसे हम दोनों को किसी तरह का भी मानसिक कष्ट हो. सामान्य स्थितियों में वे बहुत सदय होते थे. मेरा  बहुत ख़याल रखते थे. मुझे बहुत प्यार करते थे. किन्तु नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन हम एक मूवी देखने गये थे. टिकेट के लिए लम्बी कतार थी. हमारे पास पाले से ही टिकेट था. अभी मूवी शरू होने में थोड़ा समय बाकी था. टिकेट खिड़की से थोड़ी दूर हटकर एक चबूतरा सा था. हम उसपर बैठ कर बातें कर रहे थे. तभी देखा कि एक सुन्दर युवती के आग्रह पर एक युवक ने उसे टिकेट लाकर दिया. वह बहुत ही विनम्रता से व्यवहार कर रहा था.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचनाक वे बोल पड़े -&lt;br /&gt;"beauty deserve it" उनके होठों पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान थी.&lt;br /&gt;"क्या कहना चाहते हो ?"&lt;br /&gt;"कुछ नहीं, बस यही कि सुन्दर लड़की को देखते ही लड़कों के मन में कितनी उदारता और विनम्रता आ जाती है" हँसते हुए बोले.&lt;br /&gt;"इसमे गलत क्या है ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"गलत कुछ नहीं हैं, बशर्ते इस उदारता और विनम्रता में रुप-लोलुपता न शामिल हो"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब ये क्या बात हुई. कोई किसी की मदद कर रहा है उसमे भी तुम्हें बुराई दिख रही है. एक अन्जान लड़की से कोई किस प्राप्ति की अपेक्षा रख सकता है. क्या वह उसकी सहज विनम्रता नहीं हो सकती है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बिल्कुल हो सकती है. किन्तु अधिकतर मामले में विनम्रता, लालसा से प्रेरित होती है. सहजता से परे होती हो." फिर कुछ रुक कर बोले, " अच्छा ये बताओ तुम्हारे अधिकतर मित्र पुरुष ही क्यों हैं ?" मैं इस प्रश्न के लिए बिल्कुल भी तैयार न थी और न ही कभी इस बारे में सोचा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या मतलब है तुम्हारा" जो बात चल रही थी उसकी दिशा इस तरफ से मेरी तरफ मोड़ देने से मन में थोड़ा रोष उत्पन्न हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैंने एक सीधा सा प्रश्न पूछा है कि तुम्हारे अधिकतर मित्र पुरुष ही क्यों हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्योंकि मैं जहाँ काम करती हूँ वहाँ अधिकतर पुरुष ही हैं, पुरुषों के ही संपर्क में ज्यादा आती हूँ. दूसरे, मैं पुरुष मित्रों के साथ अधिक कम्फर्टेबल महसूस करती हूँ. मेरे जो भी मित्र हैं वे मेरे कार्य क्षेत्र के हैं या फिर मेरे लास्ट एडुकेशन के समय के हैं. लेकिन इसका सम्बन्ध मेरे मित्रों से कैसे है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"दूसरी बात अधिक महत्त्वपूर्ण है कि तुम पुरुष मित्रों के साथ अधिक कम्फर्टेबल महसूस करती हो...क्यों?...क्या इसलिए नहीं कि वे तुम्हारे प्रति अधिक सदय रहते हैं. तुम्हारी इच्छा के अनुरूप काम करते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात ने मुझे बुरी तरह से आहत किया था. मैं बिफर उठी "क्या कहना चाहते हो, कि मेरे मित्र रूप-लोलुपता के कारण मेरे प्रति सदय रहते हैं? क्या मेरा व्यक्तित्व इसके लिए कोई कारण नहीं है? और जो लडकियाँ मेरी मित्र हैं वे किस कारण से हैं. उनका क्या स्वार्थ है. तुम्हारे अपने मित्रों का क्या स्वार्थ है तुमसे जो तुमसे जुड़े हैं, " मैं लगातार बोले जा रही थी, "क्या तुम कभी भी पोजिटिव नहीं सोच सकते. हर बात में इतनी नकारात्मकता क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"देखो मैंने अपना विचार रखा है. इसमे इतना गुस्सा होने कि कोई बात नहीं है."  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" तुम मेरे व्यक्तित्व पर सवालिया निशान लगा रहे हो और कह रहे हो कि गुस्सा होने कि कोई बात नहीं हैं. अपना विचार रखने का क्या मतलब है कि तुम किसी को भी आहत करने के लिए स्वतंत्र हो."&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हम मूवी देखे बिना ही लौट आए. उनके शब्द बार बार मेरे अंतह को पीड़ित कर रहे थे. ऐसा लग रहा था कि उनकी नज़र में मैं एक सुन्दर युवती से अधिक कुछ नहीं थी. कई प्रश्न उठ रहे थे. क्या उनका मेरी तरफ आकर्षित होना, मुझसे प्रेम करना, मात्र दैहिक लालसा से प्रेरित है? क्या मेरी बौद्धिकता, मेरा व्यक्तित्व कुछ भी नहीं है उनके लिए?  &lt;br /&gt;इस बार मन बहुत ज्यादा दुखी था. किसी से कुछ भी बात करने का  मन नहीं कर था. एक उदासीनता ने घेर लिया था. हम पूर्ववत ही मिलते और बात करते लेकिन हमारे बीच एक रिक्तता सी बनी रहती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग का जन्म दिन भी आने वाला था. मैं चाहती थी कि उससे पहले सब कुछ सामान्य और पूर्ववत हो जाय.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                          XXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शनिवार का दिन था. अनुराग ने फोन किया कि शाम को कहीं घूमने चलते हैं. मैने कहा- आज कहीं नही जा पाऊँगी, मुझे डाक्टर के पास जाना है. वास्तव में मुझे रुटीन चेकअप के लिये जाना था. वे बोले- क्या हुआ, तबियत नही ठीक है? मैं आ जाऊँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तबियत ठीक है, बस पेट मे कुछ प्राब्लम है. सीरिअस नही है. मैं दिखा लूँगी, तुम चिन्ता न करो. वैसे भी घर का काफी काम पड़ा है. आज रहने दो प्लीज. कल चलेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ठीक है फिर तुम आराम करो. डाक्टर के यहाँ से लौटकर मुझे फोन करना"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डाक्टर के यहाँ से लौटी तो घर पर अन्कित और विनोद आये थे. अन्कित कहीं से सरोद वादक अमज़द अली के लाइव कन्सर्ट का ४-५ पास लेकर आये थे. चलने के लिए जिद करने लगे. मैने अनुराग को फोन किया तो वे घर पर नही थे. मैं चाहती थी कि वे भी चलते. पूर्वी को एक प्रोजेक्ट पूरा करना था इसलिए वह भी न जा सकी. हम लोग चले गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्सर्ट से लौटते लौटते साढ़े ग्यारह बज गए थे. अन्कित और विनोद भी मेरे साथ मुझे छोड़ने आये थे. अभी हम आटो से उतरे ही थे कि पास मे खड़ी कार का दरवाजा खुला. अनुराग निकल कर बाहर आए. उन्हे देखकर मैं अवाक रह गयी थी. "अनुराग, तुम इस समय यहाँ?" मैने विस्मय से पूछा. अन्कित और विनोद भी अचम्भित थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ, मैं यहाँ...क्यों आश्चर्य हो रहा है मुझे देखकर ...? " उनके प्रश्न में व्यंग का पुट था. शराब पी रखी थी. मुँह से गन्ध आ रही थी. मैने इस स्थिति की कभी कल्पना नहीं की थी. कभी नहीं सोचा था कि जिसे मैं प्यार करती हूँ वह इस तरह आधी रात को शराब के नशे में मेरे फ्लैट के बाहर बैठकर मेरा इन्तजार करेगा. मेरे दोस्तों और जानने वालों के सामने इस तरह से ड्रामा करेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने गुस्से से कहा - "आश्चर्य भी हो रहा है और तुम्हारे हालत पर दुख भी"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुझे भी दुख हुआ जब तुमने मुझसे झूठ बोला...बहुत दुख हुआ" वे मेरे काफ़ी पास आ गये थे. उनकी जबान भी थोड़ी लड़खड़ा रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनुराग प्लीज, यहाँ सड़क पर कोई सीन मत क्रिएट करो. चलो ऊपर चलकर बात करते हैं."  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आइए, ऊपर चलकर बातें करते हैं " अन्कित ने उन्हे सहारा देने के लिए उनकी बाहों को पकड़ते हुये कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"डोन्ट टच मी, प्लीज’ अनुराग ने उनका हाथ झटक दिया, "मुझे ऊपर नहीं जाना है." फिर मुझसे बोले, "शर्म आ रही है न तुम्हे मेरी इस हालत पर...तुम्हें तो मेरी हर बात पर शर्म आने लगी  है...मेरे हर व्यवहार पर शर्म आने लगी है...मेरी हर सोच पर शर्म आने लगी है...मैं तो तुम्हें देखने आया था. तुम्हारी तबियत खराब थी न...." अनुराग बोले जा रहे थे. मैं चुपचाप खड़ी थी. लग रहा था जैसे मेरी चेतना लुप्त हो गयी थी. मैं जड़ हो गयी थी. समझ मे नहीं आ रहा था कि क्या करूँ. जब अनुराग की कार वहाँ से गयी तब भी मैं खड़ी होकर शून्य मे देख रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विनोद और अन्कित मुझे ऊपर तक ले आये. " तुम ठीक तो हो न? " विनोद ने पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ, मैं ठीक हूँ. तुम लोग अब जाओ, काफ़ी देर हो चुकी है." मैने अपने आँसुओं को रोकते हुये कहा. वे दोनो चले गये. पूर्वी ने बताया कि अनुराग शाम मे आए थे. उसे पता नहीं था कि यहाँ से निकलकर वे घर नहीं गये थे बल्कि शराब पीकर नीचे मेरे आने का इन्तजार कर रहे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं रूम मे आकर बिस्तर पर औंधे मुँह लेट गयी. मेरी आँखों से आँसुओं की धार बह निकली. पूर्वी हैरान थी. देर तक मैं रोती रही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन अनुराग ने फोन किया. पूर्वी से बात हुयी. मै फोन पर नहीं आयी.  मैं पूर दिन बिस्तर पर ही पड़ी रही. कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था. शाम को वे घर आ गये. मुझसे बात करना चाह रहे थे. मैं बिल्कुल खामोश थी. सिर्फ़ मेरी आँखों के कोरों से आँसू के कुछ कतरे धलक गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग एक सप्ताह बीत गया, हमारे बीच कोई बात न हुई. इस बीच अनुराग का एक मेल आया था जिसमे उन्होने उस रात की घटना के लिए माफ़ी माँगी थी. मैने कोई उत्तर नहीं दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन अनुराग का जन्मदिन था. मैं स्वयं को समझा रही थी कि जो भी हुआ उसे भूल जाना चाहिए. विगत दिनो के सुखद पलों को याद करते करते आँखें नम हो गयीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर को जब अपना मेल बाक्स खोला तो अनुराग का मेल था-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;वाणी,&lt;br /&gt;हमारे प्रेम की यह परणति होगी ऐसा कभी भी सोचा न था. तुम्हें, मुझसे दुख और अपमान के सिवाय और कुछ भी न हासिल हो सका. शायद मैं तुम्हारा अभीष्ट नहीं हूँ. हमारे बीच भावनात्मक स्तर पर तो कुछ हद तक सामन्जस्य बन भी जाता है किन्तु वैचारिक स्तर पर हम बिल्कुल भिन्न हैं. यही कारण है कि हम प्राय: एक दूसरे से सहमत नहीं हो पाते हैं और हमारे बीच का टकराव हमारे दुखों का कारण बनता है. मैने बहुत कोशिश की स्वयं को तुम्हारे अनुरूप बदलने की किन्तु सफल न हो सका. मुझसे हमेशा कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जो तुम्हें कष्ट देता है. मैं जानता हूँ तुम मेरे बार बार के आघातों से उकता चुकी हो.  इससे पहले कि मैं तुम्हारे लिए और दु:खों का कारण बनूँ, हमारा अलग हो जाना ही श्रेयष्कर होगा.&lt;br /&gt;कंपनी के द्वारा बाम्बे ओफिस ज्वाइन करने का प्रस्ताव, जिसे मैं बहुत दिनों से टाल रहा था, स्वीकार कर लिया है. अगले २-३ दिनों मे मैं वहाँ चला जाऊँगा.&lt;br /&gt;यह सच है कि मैने तुमसे बहुत प्यार किया है और उस प्यार को भूल पाना सम्भव नहीं है. उन सुखद पलों की याद सदैव मेरे मानस मे विद्यमान रहेगी.&lt;br /&gt;अनुराग&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगा कि मेरी नसों का सारा खून निचुड़ गया है. वेदना की एक लहर शिख से नख तक दौड़ गयी. किन्तु शीघ्र ही वह वेदना क्रोध में परिवर्तित हो गयी. अनुराग ने सच ही लिखा है कि वैचारिक रूप से हम बिल्कुल भिन्न हैं. उनके इस अविवेकपूर्ण फैसले ने मेरे दबे हुए क्रोध को भड़का दिया. जाना चाहते हैं तो चले जाएँ, मैं नहीं रोकूँगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग चले गये. मैंने उन्हे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया. उनके साथ ही मेरे अन्दर से बहुत कुछ चला गया था. पीड़ा के आधिक्य ने मुझे जड़ सा कर दिया. सब कुछ ऐसा लग रहा था जैसे कोई भयानक स्वप्न चल रहा हो. मैं अपने आस-पास की गतिविधियों और अपनी अनुभूतियों से भी तटस्थ सी हो गयी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले ८-१० महीने मेरे लिये बहुत कठिन थे. मन के अंतर्द्वंद के अतिरिक्त सामाजिक रण को भी पार करना था . उन कठिन दिनो ने मुझे और अधिक सख्त बना दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पहली बार ध्रुव को अपनी गोद मे लिया तो लम्बे समय बाद मन ने कुछ महसूस किया. किसी अनुभूति को मैंने फिर से जिया. धीरे धीरे मैं ध्रुव में खुद को जीने लगी.  मैने स्वयं को ध्रुव और नौकरी तक समेट लिया था. कहीं भी आना-जाना बन्द कर दिया था. बिना शादी के माँ बनना, खून के रिश्तों को भी लगभग खत्म कर चुका था. सामाजिक रिश्ते तो सबसे पहले खंडित हुए थे. पूर्वी और मेरे दोस्तों ने मेरा बहुत साथ दिया. ध्रुव के पैदा होने के लगभग एक साल बाद पूर्वी की शादी हो गयी और वो चली गयी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                             XXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय तो अपनी गति से चलता रहता है. अनुराग के गये हुये तीन साल बीत  गये. अब ध्रुव लगभग ढ़ाई साल का हो गया है. एलबम में अनुराग की फोटो देखकर उन्हें पहचानने लगा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो तीन साल बहुत लम्बा समय नहीं होता है किन्तु मेरे लिये पिछले तीन साल तीन युग के बराबर थे. अनुराग के प्रति मन मे क्रोध तो था. लेकिन शायद मेरा प्रेम इतना सबल था कि इतने कष्टों के बाद भी मैं कभीं उनसे घृणा नहीं कर पाई. अचेतन मन मे एक प्रतीक्षा सी बनी रहती थी. लगता था कि कभी वे लौट आएँगे. उनका एक बार लौट कर आना ही मेरे आहत आत्माभिमान का एक मात्र उपचार हो सकता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज तीन साल बाद अचानक अनुराग को देखकर समझ मे नहीं आ रहा था कि मैं किस तरह व्यवहार करूँ. काफी देर तक हम खामोश बैठे रहे. इस बीच शान्ति पानी और चाय ले आयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पूर्वी अब यहाँ नहीं रहती...?" उन्होने पूछा. उनकी निगाह घर की दीवारों और पर्दों पर घूम रही थी. शायद कुछ जानने की कोशिश कर रहे थे. यह जगह अनुराग के लिए नई नहीं थी. बहुत से सुखद पल हमने यहाँ साथ मे बिताए थे. हाँ पूर्वी के जाने के बाद कमरे का विन्यास बदल गया था. बहुत से अनाश्यक फर्नीचर मैने हटा दिया था. ध्रुव को खेलने के लिए अधिक से अधिक खाली जगह बनाना चाहती थी. सिर्फ़ एक सोफ़ा और सेन्ट्रल टेबल पड़ा हुआ था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं, उसकी शादी हो गयी है." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी हमारी बात खत्म होने का नाम नहीं लेती थी. लेकिन आज हर एक दो वाक्य के बाद एक रिक्तता सी भर जा रही थी. इतने दिनों से खंडित संवाद को जोड़ने के लिए हम उसके सिरे तलाश रहे थे . बार बार उनकी नज़रें मुझसे टकराकर शून्य मे विलीन हो जा रहीं थीं. वे पहले से कुछ दुबले लग रहे थे. चेहरे के भाव अस्थिर थे. एक उद्विग्नता सी दिखाई दे रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम्हारी पेन्टिंग कैसी चल रही है ?" उन्होने खामोशी को तोड़ा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब मैं पेन्टिंग नहीं करती"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्यों...?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"समय नहीं मिल पाता है...और फिर ऐसा कुछ है भी नहीं जिसे मैं कागज पर सहेज कर रखूँ."  मेरे स्वर मे उदासीनता था. जो उनके चेहरे पर फैल गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बाल छोटे करा ली...?" एक फीकी सी मुस्कराहट के साथ उन्होने कहा, "वैसे यह लुक भी अच्छा लग रहा है" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने मुस्करा भर दिया. मेरे घने लम्बे बाल उन्हे बहुत पसन्द थे. जब कभी मेरी गोद में सिर रखकर लेटते तो मेरे जूड़े को खोल देते. मेरे बाल उनके चेहरे पर बिखर जाते. वे उनमें अपनी उँगलियाँ फिराते, उससे खेलते रहते. पहली बार जब पार्क की बेंच पर बैठकर उन्होंने शरारत वश मेरा जूडा खोल दिया था और मेरे बाल खुलकर बिखर गये थे, मेरी आँखों में झाँकते हुए उन्होने कहा था," कितनी सुन्दर लगती हो तुम खुले बालों में. इन्हे कैद न किया करो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्रुव के पैदा होने के बाद मैने बाल कन्धे तक कटवा लिया था. लम्बे बालों को धोने और सहेजने मे बहुत समय लगता था और परेशानी भी होती थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी अन्दर कमरे मे ध्रुव जाग कर रोने लगा. शान्ति उसे उठाकर मेरे पास ले आई. मैने शान्ति को दूध लाने को कहा. जब भी सोकर उठता है सबसे पहले उसे दूध पीना होता है. शान्ति दूध का बाटल  ले आई. मेरी गोद में लेटकर दूध पीने लगा. बीच बीच में अनुराग की ओर देख लेता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम्हारा...बेटा है...?" अनुराग के स्वर मे कुछ अविश्वास था. आशंका से उनकी आवाज़ लड़खड़ा गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ..." मैने एक गहरी साँस लेते हुए कहा. आँखों के सामने वह शाम उभर आयी जब फ्लैट में उन्होंने कहा था- यह कमरा हमारे बच्चों का होगा. कैसी विडम्बना है कि पिता को पुत्र का परिचय देना पड़ रहा है. जी चाहा कि उनके कन्धों को पकड़कर झकझोरते हुए जोर जोर से चीखूँ कि ये क्या हो गया...तुमने ऐसा क्यों किया  अनुराग...क्यों ऐसी विषम स्थिति उत्पन्न कर दी. क्यों इस तरह से चले गये थे. लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा. अन्दर के उबाल को थामे रखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग का चेहरा एकदम सफेद हो गया. उनकी आँखों में गहरी निराशा और पीड़ा उतर आयी. उस पीड़ा को मैं पहचानती थी.  मैने उसे सहा था. मैने उसे जिया था. खो देने का यहसास उनके मन को कचोट रहा था. छोड़ दिये जाने का दुख बहुत बड़ा होता है. लग रहा था जैसे उनका सब कुछ लुट चुका हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी देर मे स्वयं को संयत करते हुए पूछे "क्या नाम है?" उनकी आवाज़ में और चेहरे पर एक बेचारगी थी. वे और भी बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन शब्द उनके होठों तक आकर रुक जा रहे थे. वास्तव में वे पूछना चाहते थे कि मैंने शादी कब की, किससे की. लेकिन शब्द नहीं ढ़ूँढ़ पा रहे थे. शायद इसकी कल्पना नहीं की थी उन्होने. शायद मुझे किसी और के साथ देखना उन्हे अब भी स्वीकार न था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ध्रुव..." मैने कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी ध्रुव अपने मुँह से दूध का बाटल निकाल कर मेरी गोद में बैठ गया और उनकी तरफ़ देखकर मुस्करा दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"come... आ जाइए मेरे पास " अनुराग ने उसे  मुस्कराते देखकर अपना हाथ फैलाते हुये बुलाया. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ध्रुव मेरी गोद से उतरकर उनके पास चला गया. उनके सामने जाकर खड़ा हो गया. अनुराग ने उसकी नन्ही उँगलियाँ अपनी उँगलियों में थाम ली. ध्रुव मेरी ओर देखकर एक बार मुस्कराया और फिर अनुराग की ओर देखकर बोल पड़ा, "पा..पा..." उन्हे पहचान लिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग की आँखें विस्मय से खुली रह गयी थीं. उन्होने मेरी ओर देखा. मै खामोश थी. ध्रुव को उन्होने गोद मे उठा लिया और उससे पूछा," क्या बोला आपने...?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पापा..." ध्रुव ने दुहरा दिया. फिर मेरी ओर देखकर बोला, "मम्मा, पापा..." शायद मेरी सहमति चाहता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग ने ध्रुव को सीने से लगा लिया. मेरी ओर उलाहना भरे नज़रों से देख रहे थे. थोड़ी देर ध्रुव उनकी गोद में रहा फिर उतर कर अपने खिलौने उठा लाया. अनुराग की आँखों में खुशी की एक चमक उभर आई. जैसे डूबते-डूबते बचे हों. ध्रुव खिलौनो से खेलने लगा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग काफी देर तक मुझे चुपचाप देखते रहे. उनका मन शान्त हो चुका था. उनके चेहरे से उद्विग्नता की रेखाएँ मिट चुकी थीं. उनकी आँखों मे मेरे प्रति प्रेम और गर्व उमड़ आया था. भींगे हुए स्वर मे उन्होंने कहा "तुमने मुझे बताया नहीं...?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या बताती...तुम तो जाने का फैसला कर चुके थे...क्या कहती कि मुझे छोड़कर मत जाओ, मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ… गिड़गिड़ाती तुम्हारे सामने ? " मेरी आवाज़ ऊँची होने लगी थी. इतने दिनों की पीड़ा और क्षोभ शब्द बनकर मेरी जिह्वा से झरने लगा था, "तुमने एक पल मे सब कुछ खत्म करने का निर्णय ले लिया था. एक बार भी मुझसे पूछा कि मैं क्या चाहती थी? तुम्हारे लिए मेरी चाह का कोई अर्थ ही नहीं था." मैं बोले जा रही थी. इतने दिनों से मन मे रुका हुआ बाँध टूट कर बहने को उद्यत था, " बस अपने आप निर्णय कर लिया....एक बार भी मुड़कर नहीं देखा...कभी भी नहीं जानना चाहा कि मैं कैसी हूँ." मेरी आँखों मे आँसू उतर आए., " आज तीन साल बाद लौटकर आये हो और पूछ रहे हो कि मैने तुम्हे बताया क्यों नहीं...इन तीन सालों में मैंने क्या क्या सहा है इसका अन्दाजा है तुम्हे?......" मेरा गला रुँधने लगा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुराग चुपचाप सुन रहे थे. वे मेरे पास आकर बैठ गये और मेरे हाथों को अपने हाथों में ले लिया. मुझे अपलक देखते रहे. ध्रुव मुझे जोर जोर से बोलते देखकर सहम गया था. खेलना बन्द करके मेरे पास आ गया. मैने उसे गोद में उठा लिया. आँसुओं को पोछ लिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर खामोश रही. फिर स्वयं को संयत करते हुए बोली, "तुम तो चले गये थे, अब इतने सालों बाद लौटकर क्यों आये हो ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैं तुम्हारे पास वापस आना चाहता हूँ" उन्होने काँपती हुई आवाज़ मे कहा.  उनकी पलकों के कोरों से आँसू ढ़लक आए थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"किसलिए वापस आना चाहते हो....ताकि तुम मुझे फिर से छोड़कर जा सको...?" मेरा स्वर बिल्कुल सपाट था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके चेहरे पर पश्चाताप की लकीरें उभर आईं थी.&lt;br /&gt;                                                      xxxxxxxxxxxxxxxxxx&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1495878999715631673-4298121302013929867?l=kahaniyan-pratap.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/feeds/4298121302013929867/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/4298121302013929867'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/4298121302013929867'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='अपराजिता'/><author><name>प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08654132523168281005</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_FKlnHW05pkA/SUtrfDU6MYI/AAAAAAAAAA4/TP9ixHWw7DI/S220/DSC00425.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1495878999715631673.post-7761417359869185321</id><published>2009-06-29T03:12:00.000-07:00</published><updated>2009-06-29T03:42:16.223-07:00</updated><title type='text'>राम रचि राखा</title><content type='html'>"तुम हियाँ बैठ के लील रहे हो ! उधर बछरू पगहा तोड़ाकर गाय का सारा दूध गटक गया..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँगन का दरवाजा भड़ाक से खुला और भईया की कर्कश आवाज़ पिघले सीसे की तरह मुन्नर के कानों में उतर गयी.  हाथ का कौर थाली में ही ठिठक गया. खेत से लौटे थे भईया, फरसा अभी भी हाथ में ही था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खड़ी दोपहर थी. सूर्यदेव अंगार बरसा रहे थे. आँगन के पूर्वी तरफ थोडी सी छाया, जो बुढ़वा नीम की डालियों के आँगन में झुक जाने के कारण थी, वहीं बैठ कर मुन्नर भोजन कर रहे थे. अचानक भईया की लाउड स्पीकर सी गड़गड़ाती आवाज सुनकर मुँडेर पर जूठन की लालच में बैठे कौवे  फरफराकर उड़ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तो मई महीने की चिलचिलाती धूप, ऊपर से परशुराम का क्रोध ....चेहरा तवे की तरह लाल हो गया था. ठुड्डी से पसीना ऐसे चू रहा था जैसे कम दबाव वाले जगहों पर नल से पानी टपकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम कौनो काम के नहीं हो.....घोड़ा के तरह हो गए हो लेकिन अकल एक पैसा का भी नहीं है. बस कलेवा डेढ़ सेर  चाहिए चारो टाइम.... दस साल तक  स्कूल का रास्ता नापे, उहाँ तो  कुछ  हुआ नहीं....खेती का काम तो छोड़ो घर का भी कुछ काम नहीं होता तुमसे" फरसा को आँगन के एक कोने में रखकर गमछा से पसीना पोछते हुए बिफर पड़े.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोर सुनकर दालान में चरखा छोड़कर माई आँगन में आ गयीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"का हुआ भईया ?" सर पे आँचल ठीक करते हुए पूछीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रसोईं में रोटियाँ सेंकती भौजी के हाथ ठिठक गए और वे रोटियाँ छोड़कर जल्दी से छोटी बाल्टी में घड़े से पानी उड़ेलीं और उसमे लोटा डालकर आँगन में ले आयीं. भईया को हाथ मुंह धोने के लिए . डर था कि  कहीं देर हो गयी तो गुस्से की गाज उन पर भी न गिर पड़े. उधर छ: महीने का बाबू  कुलबुलाकर जाग गया और रोने लगा. भौजी पानी की बाल्टी आँगन में रखकर उसे चुप कराने अन्दर चली गयीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या हुआ !...और कौन सी नयी बात है...पता नही कौन सी दुनिया मे रहते हैं...कौनो जिम्मेवारी नही, बस या तो उन लुहेडों के साथ पत्ता खेलेंगे या फिर रामायन बाचेंगे...बीस बरिस के हो गये हैं पता नही भगवान बुद्धि कब देगें."  भईया दाँत पीस कर बोले…"अब शाम को बंधी वालों को दूध की जगह अपना कपार देंगे ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर खाना छोड़कर हाथ धोने लगे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"का बचवा, पगहा ठीक से नही बाँधे थे क्या?" माई के स्वर में प्रश्न का पुट कम और अफसोस ज्यादा थी. उन्नीस साल पूरे होने मे कुछ ही महीने रह गये थे लेकिन मुन्नर माई के लिये हमेशा बच्चे ही रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हम कह रहे हैं कि जिंदगी भर क्या ये ऐसे ही रहेंगे... एकदम बेअकल... कब तक चलेगा ऐसा ..." भईया बोले जा रहे थे. माई चुप हो गयीं और मुन्नर को कातर नज़रों से देखने लगीं. गलती तो थी मुन्नर की.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इहाँ दिन रात खटते खटते एडियाँ घिसी जा रही हैं ...किसी को कोई परवाह नही." अब भईया का स्वर थोड़ा नीचा हो चुका था.  हाथ मुँह धोते हुए  बुदबुदा रहे थे. मुन्नर हाथ धोकर आँगन से बाहर निकल गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी के जाने  बाद जिम्मेदारियों का बोझ और पढ़ाई में मुन्नर की असफलता ने भईया को चिड़चिड़ा बना दिया था.  दिन पर दिन खर्च बढ़ता जा रहा है. दो दो बेटियाँ भी पैदा हो गयीं हैं. आमदनी बढ़ने का कोई रास्ता दीख नहीं रहा है. मुन्नर से आस थी कि पढ़ लिख कर कमाने लग जायेंगे तो घर में एक आमदनी का जरिया हो जाएगा. लेकिन मुन्नर के लिए दसवीं की परीक्षा उतनी ही कठिन साबित हुयी  जितना कि अभिमन्यु के लिए  चक्रव्यूह का अंतिम द्वार.        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामबदन चौबे कर्मकांडी ब्राह्मण थे. पुरखों की थोड़ी खेती बाड़ी थी. गुजारे के लिए पर्याप्त थी. जब पहला  पुत्र पैदा हुआ तो उसका नाम "परशुराम" रखे. शायद सोचा होगा कि नाम का कुछ असर  तो पुत्र में आएगा ही  और जो भयवद्दी के लोग उनसे रार रखते थे वे परशुराम की क्रोधाग्नि में जल कर भस्म हो जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता तो है कि नाम का कुछ असर आया है. जब गुस्से में चीखते हैं तो गाँव के दूसरे  सिरे तक पता चल जाता है.  वैसे माई कहती हैं कि भईया का गुस्सा उनके पिता से ही मिला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाठी की ताकत बढाने के लिए चाहते थे कि चार-पाँच पुत्र हों और हुए भी,  किन्तु उनकी किस्मत कि परशुराम के बाद के तीनो बेटे बाल्यावस्था में ही स्वर्ग सिधार गए. केवल एक पुत्री जीवित रह सकी थी. पुत्रों में पाँचवे नंबर पर जयराम उर्फ मुन्नर थे जो बड़े भाई से चौदह-पंद्रह  साल छोटे थे. तीन बेटों की मृत्यु के बाद जब फिर  बेटा पैदा हुआ तो टोटके के रूप में उसका नाम बुलाने के लिए "मुन्नर" रखा गया. वैसे असली नाम "जयराम" था. मुन्नर बचपन से ही बड़े भाई से उलट बहुत ही शांत और संवेदनशील थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर द्वार पर आ गए थे. दूर से ही एक नज़र गाय पर डाली. थन सूख चुका था. बछड़ा सारा दूध पी गया था. भईया ने बछड़े को अलग करके खूँटे से बाँध दिया था कसकर गाँठ लगाकर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"का हो मुन्नर! भाई साहब बहुत तड़क रहे थे, क्या बात हो गयी ? अपने ओसार में लेटे लेटे ही लल्लन ने मजा लेने के लिए पूछा. वैसे लल्लन को पता था कि क्या हुआ है . मुन्नर ने एक उड़ती निगाह लल्लन पर डाली लेकिन कुछ बोले नहीं और नीम के पेड़ के साथ बनी अपनी मड़ई में घुस गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन बहुत ही खिन्न हो चुका था. आजकल भईया का गुस्सा दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है. पहले तो भौजी ही कचकच करती थीं, अब तो ये भी हर छोटी बड़ी बात पर बिफर उठते हैं. "रोज रोज की खिटपिट से तो अच्छा है कि घर छोड़कर कहीं चला जाऊँ..." मुन्नर के मन में अनेकों विचार उठने लगे- लेकिन कहाँ जाऊँ ? बम्बई जाकर किसी मिल-फैक्ट्री में काम कर लूँगा. लेकिन सुलेमान बता रहा था कि मिलों में जून की दोपहरी से भी अधिक ताप रहता है...... चमड़ी तक झुलस जाती है. उससे अच्छा तो यहीं खेत में काम करुँ. लेकिन यहाँ भईया और भौजी चैन से रहने दें तब न.  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चारपाई पर लेटकर उन्होंने तुलसी-रामायण का गुटका हाथ में ले लिया. बाबूजी जब तक जिन्दा थे तब तक भईया उन्हें कभी  कुछ नहीं कहते थे. बाबूजी बहुत मानते थे मुन्नर को. दोपहर का खाना खाने से पहले रामायण का पाठ करते थे और मुन्नर को  पास बिठाकर उनसे भी साथ में पाठ करवाते थे. उन्हें  सुन्दर काण्ड की ढ़ेर सारी चौपाईयाँ कंठस्थ हो चुकी थीं .  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी की याद आते ही आँखें सजल हो उठीं. . .आँखें बंद करके रामायण के गुटके को सीने पर रख लिया. लेटे लेटे कब नींद ने आ दबोचा पता ही नहीं चला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आँख खुली तो देखा माई पानी ले आई थीं. उनकी आवाज़ सुनकर ही नींद टूटी थी. तीसरा पहर हो चुका था लेकिन सूरज का ताप कम होने का नाम नहीं ले रहा था. हालाँकि किरणें थोडी मद्धिम पड़ने लगी थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बचवा, पानी पी लो, और देखो गोरून को चारा डालने का समय हो गया है. उठ जाओ. गईया कब से खूँटे पर मथ रही है." माई चारपाई पर मुन्नर के पैरों के पास बैठती हुयी  बोलीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर उठ कर बैठ गए थे. थोडा सा गुड़ मुँह में डालकर पानी पीने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम तो जानते ही हो आजकल वो भी कितना परेशान रहते हैं. जब देखो तब कोई न कोई आफत आकर खड़ी ही हो जाती है. कर्जा लेकर भैंस खरीदे कि चार पैसे की आमद होगी, पता नहीं किसकी नज़र लग गयी, आमद तो दूर,  कर्जा और कपारे चढ़ गया. दो दो बिटिया हैं, घास फूस की तरह रोज बढती ही जा रही हैं. दिन भर खून जराते हैं फिर भी एक पल को चैन नहीं." माईं दोपहर की बात को लेकर  सांत्वना दे रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर पानी पी कर मड़ई से बाहर चले गए पशुओं को चारा डालने.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                        XXXXXXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन जब मुन्नर दिशा फराकत से लौटे, भईया कुएँ पर नहा रहे  थे। जल्दी जाना था. एक रिश्तेदारी में किसी का देहांत हो चुका था. सोच रहे थे जल्दी निकल लूँ. बीस कोस साईकिल चलाकर जाना है. दोपहर होने से पहले पहुँच जाऊँ. आजकल दोपहर में चल पाना मुश्किल हो रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हम जा रहे हैं नेवादा…हीरा से बात कर लिए हैं…चले जाना थ्रेसर पे . दुपहरिया से पहले वो हमारा गेहूँ लगा देंगे..." भईया देह पोछते  हुए  मुन्नर से कह रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर, भईया के किसी भी बात का जवाब नहीं देते हैं. न हाँ न ना.  बस सुन लेते हैं. यह बात भईया भी जानते हैं. ड्योढ़ी पर रखी  बाल्टी उठाकर गाय दुहने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"और देख लेना दँवायी आज जरूर हो जाय. कल से ही बादर उतरा रहे हैं. कौनो भरोसा नहीं है कि दउ कब बरस जायँ...."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"और बंशी से बात कर लेना कि तरी वाला खेत कब पलटना है. वो भी रोज आज कल कर रहा है." भईया धोती का कछाना पीछे खोंसते हुए बोले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माई ओसार में झाडू लगा रही थीं. वहीँ से बोलीं - " भईया, अब उधर जा ही रहे हो तो थोड़ा रमला के यहाँ भी हो लेना. बहुत दिनों से कोई खोज खबर नहीं मिली. पाहुन का गोड़ टूटा था तब भी नहीं जा पाए थे".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमला, माई की  एक मात्र पुत्री थी जो भईया  से दो साल छोटी थी. रास्ते में ही उसका गाँव पड़ता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वहाँ जाने का मतलब कि आज तो नहीं लौट पाउँगा....इतना काम पड़ा है...." फिर कुछ सोचकर बोले " देखूँगा अगर समय से निकल लिया तो चला  जाऊँगा...शाम तक लौटने की सोच रहा था... अब भिन्सहरे ही निकलना पड़ेगा वहाँ से " भईया जानते थे कि रमला के यहाँ गए तो रात रुकना ही पड़ेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाश्ता करके भईया सायकिल उठाकर चल दिए और जाते जाते मुन्नर को हिदायत दे गए -- हम नहीं हैं, जिम्मेवारी से सब काम निबटा लेना, टाइम से बैलों को अलगा देना, अगर दँवायी होने में देर सवेर लग जाए तो गेहूँ को बोरे में भरवा कर वहीँ हीरा के ओसर में रखवा देना. कल सुबह घर ले आयेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर दूध की बाल्टी मुन्नी (भईया कि बड़ी बेटी) को पकडा दिए , जो घर में अपनी माँ के पास ले गयी और खुद नीम के पेड़ से दातुन तोड़कर कुएँ पर बैठ गए.      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घंटे भर बाद, दातुन करके, बछड़े को वापस उसके खूँटे से बाँध कर,  गाय को छाये में अलग करके ,  बैलों को चारा डालकर, गोबर उठाकर और साफ सफाई करके जब मुन्नर घर में नाश्ता करने के लिए घुसे तो भौजी आँगन लीप रही थीं. मुन्नर ने ध्यान नहीं दिया और उनका पैर लिपे हुए जगह पर पड़ गया. अभी सूखा नहीं था और पैरों से लगकर उखड गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"दीदा फूट गया है तुम्हारा..…...दिखाई नहीं देता.......सब सत्यानास कर दिए....." भौजी की त्योरियाँ चढ़ गयीं. वैसे भी मुन्नर उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते थे और रोज किसी न किसी बात पर एक-आध बार झड़प हो ही जाती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर घूरकर भौजी की तरफ देखे पर बोले कुछ नहीं. झगडा नहीं करना चाहते थे. आँगन के एक कोने में पड़ी बसँहटी पर बैठ गए .  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आँख का दिखा रहे हो, जराकर भसम कर दोगे.....आँख जाकर किसी और को दिखाना यहाँ कोई तुम्हारा गुलाम नहीं है....... कौन सी कमाई पर रोआब दिखाते हो ..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर स्वयं को शांत रखते हुए बोले - "थोड़ा सा गोड़ पड़ गया तो कौन सी आफत आ गयी जो इतना बिख उगलने लगीं, दोबारा लीप दो"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ हाँ.. मैं तो तुम्हारी दर-खरीद लौंडी हूँ न जो दिन भर घिसती रहूँ ......... खरीद के लाये था न मुझे........इहाँ घर में मैं दिन रात पिसती रहूँ और वहाँ खेतों में वे खून जलाते रहें और आप लाट साहब बनकर मौज करते रहो......." भौजी एकदम से भड़क उठीं, "अपने पास तो एक धेला का भी जाँगर नहीं है और चाहते हैं कि बाकी सारे लोग दिन भर खटते रहें"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच मुन्नी नाश्ता लाकर चारपाई पर ही रख दी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब चुप हो जाओ, नहीं तो हम बता रहे हैं कि ठीक न होगा....." मुन्नर को थोड़ा गुस्सा आ गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“क्या ठीक नहीं होगा ???......क्या करोगे???.....”अब भौजी आपे से बाहर हो गयीं थीं और जोर जोर से चीख कर बोलने लगी थीं,  " मारोगे मुझे, क्या कर लोगे तुम ....तुम क्या समझते हो कि तुम्हारी घुड़की सहेंगे हम .....चारों बेला  बैठे बैठे  कलेवा मिल जा रहा है तो बहुत चर्बी चढ़ गयी है जो चले हो हमें धमकाने......."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मुन्नर से न रहा गया. "साला, हर बखत खिचखिच, जब देखो तब पहड़क, खाना पीना दुसवार कर दिया है..."  गुस्से में नास्ते की थाली उठाकर जमीन पर पटक दिए और उठकर खड़े हो गए. " इस घर में एक मिनट भी रहने लायक नहीं है " गुस्से में उठकर बाहर चले गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ तो चले क्यों नहीं जाते कहीं ....हम भी देखें कि कहाँ तुम्हे बैठे बैठे रोटियाँ तोड़ने को मिलती हैं .....और कौन तुम्हारे इस करतब पर बाँदी की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहती है ............" भौजी की आवाज ओसार तक मुन्नर का पीछा करती रही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर आकर कुछ देर कुएँ के चबूतरे पर बैठ गए. धूप धीरे धीरे बढ़ रही थी. हालाँकि, जहाँ वे  बैठे थे वहाँ नीम की छाँव आ रही थी. गिलहरियाँ नीम के पेड़ पर ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर दौड़ लगा रही थीं. उपरी डाली पर गौरैया का एक छोटा सा झुंड गायन में तल्लीन था. गिलहरियों और गौरैयों को देखकर उनके मन में कुछ ईर्ष्या उभर आयी और अपने उपर तरस आने लगा- ये इतने तुच्छ जीव कितने मजे से रह रहे हैं और एक मैं ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह की भईया की बात याद आयी और सोचे की चल कर एक बार देख आता हूँ .पहले बंशी के यहाँ गए तो पता चला कि वह तो सिवान चला गया है . वहाँ से हीरा के थ्रेशर पर चले  गए . अभी थ्रेशर चालू करने की तैयारी चल रही थी .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हीरा ने कहा- अभी तो तुम्हारा नंबर आने में दो तीन घंटे लग ही जायेंगे........अभी थोड़े अपने गाँठ पड़े हैं काटने को.... दोपहर तक तुम्हारी कटाई जरूर शुरू कर दूँगा. तब तक अपनी गाँठें उठवा कर थ्रेशर के पास रखवा दो. अभी तो तुम्हारी गाँठें खलिहान के उस कोने में पड़ी है. घंटा दो घंटा तो उन्हें लाने में लग जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव के एक सिरे पर मजदूरों की एक छोटी सी बसावट थी, जो दिहाड़ी पर काम करते थे. मुन्नर सोचे वहाँ से चार मजदूर बुला लाता हूँ . घंटे भर में सारी गाँठें इकट्ठी हो जायेंगी. अभी जाना पड़ेगा नहीं तो एक बार मजदूर काम पर निकल गए तो मिलना मुश्किल  होगा.....सोचते हुए बस्ती की ओर चल दिए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रभु काका ताश खेलने के पक्के नशेड़ी हैं. सुबह से शाम तक उनके ओसार में ताश की बाजी जमी रहती है. गाँव भर के निठल्ले  लड़के इकठ्ठा होकर ताश खेलते रहते हैं. मुन्नर भी खाली समय में जाया करते हैं. अच्छा खेलते हैं मुन्नर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब उनके ओसार के सामने से निकले तो प्रभु काका ने आवाज़ दी. "इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हो मुन्नर ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आवाज सुनकर मुन्नर ठिठक गए ...देखा ओसार में प्रभु काका के अलावा तीन लोग और थे ..ताश की बाजी चल रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कक्का, मजूर लेने जा रहा हूँ , गेहूँ की गाँठें इकट्ठी करानी है, आज दँवायी है " कहकर मुन्नर आगे बढ़ना चाहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे, सुनो तो, एक मिनट यहाँ तो आओ' जो चौकड़ी जमी थी उसमे एक खिलाड़ी कमजोर पड़ रहा था. प्रभु काका मुन्नर को रोकना चाहते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर ओसार में आ गए . अभी खड़े ही थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बैठो तो सही, ऐ  बिल्लू , थोड़ा और पीछे होओ , मुन्नर को बैठने दो"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं कक्का मैं मजूर लगाकर आता हूँ, फिर बैठूँगा '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे बैठो, काहे चिंता कर रहे हो, मजूर मैं यहीं बुलवा देता हूँ " काका थोड़ा जोर देकर बोले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर हिचकिचाते हुए बैठ गए. सोचे, अच्छा है अगर यहीं बुलवा देते हैं तो बस्ती तक जाना बच जाएगा. वैसे भी अभी दो तीन घंटे से पहले कटाई का नंबर तो आना नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सुनो, लँगड़ा अभी तम्बाकू लेकर आ रहा है. मैं उसे भेजता हूँ वो बुला लाएगा , बिलकुल भी चिंता न करो. ऐ रामजी, पत्ते बाँटो”  काका ने तसल्ली से कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लँगड़ा काका का नौकर है. एक पैर से थोडा सा लँगड़ाकर चलता है. इसलिए उसका नाम ही लँगड़ा पड़ गया है. रामजी पत्ते फेटने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडी देर में लँगड़ा तम्बाकू लेकर आया और काका का चिलम चढ़ा दिया।  काका ने उसे हिदायत देकर भेज दिया – “ बस्ती जाकर सल्टू, जगेसर या कोई और भी मिले तो दो आदमी को बुलाकर ले आ. और लौटते हुए  बरइया  के यहाँ से  चार पान भी  लगवाते आना."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लँगड़ा चला गया तो मुन्नर को संतुष्टि हो गयी. और वे पत्ते खेलने में तल्लीन हो गए . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डेढ़ दो घंटे बीत गए तब मुन्नर को होश आया कि न तो लँगड़ा ही वापस आया और न ही मजदूर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कक्का बड़ी देर हो गयी, लँगड़ा तो वापस आया ही नहीं" मुन्नर के माथे पर चिंता उभर आई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ यार, ये कहाँ जाकर मर गया...." काका को भी आश्चर्य हुआ. वे सोचने लगे कि आखिर क्या हो गया. कहाँ अटक गया वह. तभी वहाँ से मुबारक अली  गुजरे.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे मुबारक, उधर कहीं लँगड़ा दिखा था क्या " काका ने  मुबारक को आवाज लगाकर पूछा.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"हाँ कक्का, बरइया के यहाँ पान तो लगवा रहा था" मुबारक कहते हुए आगे बढ़ गए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अभी तक क्या कर रहा था साला ..." काका बुदबुदाए. "तुम चिंता न करो अभी आ रहा होगा" मुन्नर से बोले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेल फिर आगे शुरू हुआ लेकिन अब मुन्नर का मन नहीं लग रहा था. सोच रहे थे अगर मजूर नहीं मिले तो बहुत ही मुश्किल हो जायेगी. अगर आज गेहूँ की दँवायी न हुयी तो कल भईया बहुत ही गुस्सा होंगे. अनमने मन से पत्ते फेंकते हुए  हुए सोचने लगे. थोडी सी आशा थी कि शायद लँगड़ा मजदूर लेकर आ जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस पंद्रह मिनट बाद लँगड़ा वापस आया. देखते ही काका आग बबूला हो उठे- "साला, तू कहाँ जाकर मर गया था ????"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"विजय भईया का ट्रक्टर ख़राब हो गया था तो वो रोक लिए थे, मैं क्या करता" लँगड़ा ने अपनी सफाई दी. विजय, काका के बड़े बेटे हैं . काका नरम पड़ गए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"और मजूरों का क्या हुआ ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैं जब तक पहुँचा, सब काम पर चले गए थे. घर पे कोई नहीं है. बस बिरजू का परिवार है ...वे सब अपना मड़ई छा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगीं. पत्ते फेक कर खड़े हो गए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यह तो बहुत गड़बड़ हो गयी  कक्का.... मैं देखता हूँ " मुन्नर चलने को उद्यत हुए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे घबराओ मत मुन्नर, अभी सब दोपहर में खाना खाने आयेंगे तो उन्हें पकड़ लेंगे" काका ने रोकने की गरज से कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परन्तु मुन्नर रुके नहीं और बस्ती की ओर चल दिए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि लँगड़ा ने बताया था वास्तव में बस्ती में कोई मजदूर घर पर नहीं था. मुन्नर ने किसी तरह से बिरजू को उसके भाई के साथ आने के लिए  राजी किया. वह अपनी झोपड़ी  बना रहा था. उसने घंटे दो घंटे में आने का आश्वासन दिया. उन्हें थोडी तसल्ली हुयी कि चलो थोड़ी बहुत देर हो जायेगी लेकिन काम तो आज हो जायेगा.  लौटते हुए दोपहर घिर आई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते मे पड़ोस का एक लड़का मिला जिसने बताया कि उनकी माई उन्हें ढ़ूँढ़ रही थीं. मुन्नर सीधे घर आ गए.&lt;br /&gt;सुबह माई जब पड़ोस से लौटी थीं तो मुन्नी ने सारी बात बता दी थी कि "माँ और चच्चा के बीच फिर झगडा हुआ और वे बिना कलेवा किये ही चले गए ". इसलिए माई परेशान हो रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर आकर मुन्नर ने स्नान किया . माई खाना लेकर आयीं और वे दालान में ही बैठकर खाना खाये. अन्दर नहीं गए.. माई को बता दिया था कि मजूर ठीक करने गए थे और दोपहर के बाद कटाई शुरू हो जायेगी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाना खाकर मुन्नर मड़ई में बिरजू का इंतजार करने लगे। चारपाई पर लेटे लेटे नीद आ गयी. जब नीद खुली तो हड़बड़ाकर उठे. देखे तीसरा पहर घिरने लगा था, तीन चार बज रहे होंगे. बिरजू भी नहीं आया था. भाग कर फिर बस्ती गए . वहाँ से बिरजू और उसके भाई को लेकर खलिहान की तरफ चल दिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब खलिहान के थोड़ी पास पहुंचे तो देखते हैं कि एक सिरे से आग की लपट और धुआँ सा उठ रहा है और भगदड़ मची हुयी है. दौड़कर खलिहान में पहुँचे . गेहूँ की गाँठों में आग लग गयी थी. देखा उनकी गाँठे धू धू कर जल रही थीं. उनके साथ पास में रखी कुछ और लोगों की गाँठें भी. अफरा तफरी मची हुयी थी. पास के कुएँ से लोग बाल्टियों में पानी लाकर आग पर डाल रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों के साथ मुन्नर, बिरजू और उसका भाई भी आग बुझाने में जुट गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किन्तु जब तक आग बुझाई जा पाती तब तक बहुत कुछ स्वाहा हो चुका था.  मुन्नर की गाँठें तो लगभग पूरी तरह जल चुकी थीं. उन्हें  काटो तो खून नहीं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                             XXXXXXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हम तो तुम्हे दोपहर में ही बुलाए थे. समय से आ गए होते तो अब तक गेहूँ कट भी गया होता. यह नौबत ही नहीं आती..." हीरा ने अपने ऊपर आने वाली किसी भी किस्म के लांछन  को परे धकेलते हुए कहा.  फिर सांत्वना देते हुए बोले - "लेकिन जो होना होता है, हो ही जाता है.... होनी को कौन टाल सकता है."&lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;मुन्नर एकटक जली हुयी गाँठों को देख रहे थे. उसके राख की कालिमा उनके अन्दर उतरने लगी थी... जैसे साँझ का अँधेरा सूरज की कमजोर पड़ रही किरणों को निगलते हुए हुए धरती पर उतर आता है और धीरे धीरे सब कुछ अपनी गिरफ्त में ले लेता है. बाहर अभी साँझ घिरने में थोडा वक़्त था पर मुन्नर को सूर्य की पीली किरणे काली दिखने लगी थीं. वहीँ जमीन पर बैठ गए. यूँ लग रहा था कि किसी बिना किनारे वाली स्याह नदी में धीरे धीरे डूब रहे हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुन्नर, अब घर जाओ, जो होना था वो तो हो चुका. अब यहाँ बैठे रहने से तो कुछ न होगा."  साँझ घिरने लगी थी. किसी ने मुन्नर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा. "ओह! एक दाना भी न बच सका" अपना दुःख व्यक्त किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर ने एक गहरी साँस ली और सर हिलाया जैसे कह रहे हों "जो नहीं होना चाहिए था वो हो गया". फिर उठकर खड़े हो गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. पैर नहीं उठ रहे थे ... लग रहा था जैसे पैरों में एक एक मन वजन का पत्थर  बाँध दिया गया हो. किसी तरह स्वयं को घसीटते हुए घर की ओर चल दिए. &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;गाँव में बात जंगल की आग की तरह फैल गयी कि मुन्नर ताश  खेलने में लगे रहे और उनका सारा गेहूँ जल कर राख हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुएँ के चबूतरे पर माई बैठी थीं. पास पड़ोस की औरतें उन्हें सांत्वना दे रही थीं. माई को दोहरी चिंता खाए जा रही थी. एक तो फसल के जल जाने का और दूसरे भईया के क्रोध का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्यों ही मुन्नर द्वार पर पहुंचे, भौजी, जो अभी अभी विलाप करके रुकी थीं और सिसकियाँ ले रही थीं, अचानक शेरनी की तरह मुन्नर की ओर झपटीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब यहाँ क्या लेने आया है रे दुसाध !!! ख़त्म हो गयी तेरी मंडली......" मुन्नर के कुर्ते का कालर पकड़ कर झकझोरते हुए चीख चीख कर बोलने लगीं. औरतों ने आकर मुन्नर का कालर छुडाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे, इ पातकी सब कुछ स्वाहा कर दिया रे !!!.... बच्चों के मुँह का कौर छीन लिया हत्यारा........." भौजी बेतहाशा मुन्नर को कोसती हुयी, श्राप देती हुयी चीखे जा रही थीं, "तुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी पापी ....जा कहीं जाकर चिरुआ भर पानी में डूब मर ......" औरतें उन्हें शांत कराने का प्रयत्न कर रही थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर मड़ई में  घुस गए और धम्म से चारपाई पर बैठ गए . न तो उन्हें कुछ सुनाई दे रहा था और न ही कुछ सोच पा रहे थे. जैसे जड़ हो गए थे. काफी देर तक भौजी हिस्टीरिया के रोगी की तरह चीखती रहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को खाना नहीं बना. भौजी और माई दोनों ही बिना खाए ही सो गयीं. मुन्नी ने दिन का बचा खाना स्वयं  खाया  और छोटी बहन को भी खिला दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात गहराने लगी थी. पर  मुन्नर की आँखों में नीद नहीं थी. चेतना धीरे धीरे लौटने लगी थी- यह क्या हो गया मुझसे? भईया ठीक कहते हैं कि मुझसे कोई भी काम ठीक से नहीं हो पाता है. अब क्या होगा? घर में अनाज का एक दाना  भी न आ सका. सब लोग क्या खाएँगे? एक तो पहले से ही तंगी थी ऊपर से भैंस के मरने से कर्ज भी चढ़ गया है और अब तो बिलकुल ही मौत आ गयी. मुन्नी और छुटकी के भूख से बेहाल चेहरे आँखों के सामने घूमने लगे. कितना बड़ा अनर्थ हो गया मुझसे.. कितना बड़ा कलंक लग गया!.. मेरे कारण सभी लोग कितनी बड़ी मुसीबत में आ गए हैं ! कल गाँव में हर आदमी मुझे थू थू करेगा. और भईया ! भईया के सामने कैसे जा सकूँगा. ओह!  भौजी ठीक कह रहीं थीं कि मैंने बच्चों  के मुँह से कौर छीन लिया है. मैं ही सबकी खुशियों का हत्यारा हूँ .मुझे अब रहने का कोई हक़ नहीं है . मुझे जीने का कोई हक़ नहीं है. मुझे मर जाना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर जितना अधिक सोचते गए उतना ही अधिक स्वयं को दोषी पाते गये और उनके मन में आत्महत्या की भावना उतनी गहरी होती गयी. यही एक मात्र उपाय नज़र आ रहा था उन्हें सारी परेशानियों से बच निकलने का. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः मुन्नर इस फैसले पर पहुँचे कि तिनसुकिया मेल, जो  भोर में पास वाले स्टेशन से गुजरती है, उसके नीचे लेट जाऊँगा. एक सेकेण्ड में सब कुछ ख़त्म हो जाएगा. न मैं रहूँगा और न ही कोई परेशानी बचेगी. अंतिम फैसला करके मुन्नर उठे. लालटेन जलाए और उसकी रोशनी में अपनी आत्महत्या का नोट लिखकर रामायण के अन्दर इस तरह रख दिए कि कुछ भाग बाहर झाँकता रहे. फिर लालटेन बुझाकर चारपाई पर लेट गए. सोचने लगे कि माई को बहुत तकलीफ होगी , बहुत विलाप करेगी. चलो कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाएगा.....सोचते सोचते आँख लग गयी .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुत्तों के भौकने की आवाज से मुन्नर हड़बड़ाकर उठे, डर था कि कहीं सुबह न हो गयी हो. लेकिन आज की नींद  रोज की तरह नहीं थी. क्लेश में लिपटी हुयी थी. दुश्चिंता, भय और दुःख के साए से घिरी हुयी थी. मुश्किल से घंटा भर ही आँख लगी रही होगी. मड़ई के बाहर निकल कर आये तो देखा कि चाँद आसमान में सर के ऊपर था. सोचा बारह-एक तो बज ही रहा होगा. एक घंटा तो स्टेशन पहुँचने में लगेगा. चार कोस दूर है. तिनसुकिया तीन बजे के करीब जाती है शायद.. अब चलना चाहिए.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार रामायण में रखे पत्र को देखा और मड़ई से बाहर निकल आये. चलते चलते  एक निगाह घर पर डाले. पश्चिम तरफ का छप्पर पिछले बरसात में चू रहा था . इस बार बारिश से पहले ठीक करना होगा नहीं तो दीवारें गल कर खदरने लगेंगी . सामने कुएँ का चबूतरा सुनसान पड़ा था. उनके कितने ही एकाकी पलों का साथी रहा था. कितनी रातों में देर तक इस पर बैठ कर उन्होंने स्वयं से बातें की थी. नीम के पत्तों से छन रही चाँदनी जो हमेशा ही मुन्नर को बहुत मोहक लगती थी, आज उसमे कोई रमणीयता नहीं देख पा रहे थे. सब कुछ निस्सार सा लग रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टेशन की ओर चल दिए . सारे मोह माया के बन्धनों को तोड़कर ...आत्मघात करने ....इस दुनिया से अंतिम विदा लेने. अब तक के जीवन की सारी बातें मन में चलचित्र की तरह उभरने लगीं थीं . भूत की यादों में डूबते उतराते स्टेशन के पास पहुँच गए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सिग्नल से पहले ही लेटना चाहिए मुझे, क्योंकि सिग्नल के बाद गाड़ी धीमी हो जाती है और मुझे देखकर ड्राईवर गाड़ी रोक भी सकता है " सोचते हुए मुन्नर सिग्नल से चार पाँच सौ मीटर पहले आ पहुँचे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लगता है गाड़ी आने में अभी समय है. अभी से लेटने का कोई फायदा नहीं है . जब गाड़ी की आवाज़ आएगी तभी लेटूँगा." बैठकर प्रतीक्षा करने लगे.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर की आँखों के सामने आने वाली सुबह का दृश्य उभर आया- उनकी क्षत-विक्षत लाश द्वार पर कुएँ के पास पड़ी है. माई दहाड़ मार मार कर रो रही है. गाँव के लोग जमा हो गए हैं. कोई कह रहा है - "अकारथ ही जिंदगी चली गयी.....".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जीते जी तो किसी को सुख दे न पाए, मरकर उससे भी बड़ा संताप दे गए .... इनकी भी क्या किस्मत है , बुढापे में  इतना बड़ा दुःख मिल रहा है......"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पल को मुन्नर सिहर उठे. पहली बार मन में प्रश्न उठा-"क्या मैं ठीक कर रहा हूँ ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है. लोग कुछ न कुछ तो कहेंगे ही. माई भी दो-एक दिन रो-धो कर चुप हो जायेगी.." स्वयं ही जवाब दिया मुन्नर ने.        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग एक घंटा बीत गया होगा परन्तु गाड़ी नहीं आई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या बात हुयी, मैं बहुत जल्दी आ गया क्या ! या फिर गाड़ी लेट हो गयी है " मुन्नर सोचने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चलकर स्टेशन पर पता करता हूँ ". उठकर स्टेशन की ओर चल दिए .&lt;br /&gt; "आत्महत्या महापाप है. मरने के बाद आत्मा जन्म जन्मान्तर तक भटकती रहती है. मुक्ति पाने के लिए छटपटाती रहती है...” पहले की पढ़ी- सुनी बातें याद आने लगीं थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या मैं मरने के बाद भी चैन न पा सकूँगा ??? फिर मरने का क्या फायदा होगा ???" मुन्नर के मन में एक नयी सोच ने जन्म ले लिया और वे इसी उधेड़बुन में स्टेशन पहुँच गए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टेशन पर बिलकुल सन्नाटा था. कोई भी नहीं था वहाँ. स्टेशन मास्टर अन्दर कुर्सी पर बैठा बैठा ऊँघ रहा था. सिग्नल खींचने वाला आदमी, सिग्नल खींची जाने वाली मशीन के टिन के छप्पर से लगे एक बेंच पर अर्धनिद्रा में लेटा हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्यों भाई तीनसुकिया अभी आई नहीं क्या ?" मुन्नर ने थोडा ऊँची आवाज़ में उसे जगाने के लिए  पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तीनसुकिया तो यहाँ रूकती नहीं, क्या करोगे  जानकार..... साढ़े तीन बजे आएगी....." आँखे बंद किये ही वह  बोला और फिर सो गया. रेल विभाग की दस साल से नौकरी करते हुए वह सोते हुए जागने का और जागते हुए सोने का अभ्यस्त हो चुका था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर ने देखा स्टेशन का घड़ियाल अभी दो बजा रहा था. वे प्लेटफोर्म  के एक सिरे पर रखे बेंच पर जाकर बैठ गए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आत्महत्या करना कितना जायज होगा ! और फिर मरने के बाद तो कुछ भी नहीं बचेगा..आत्मा भटकती रहेगी सो आलग......" - मन मे उठा नया विचार जोर पकड़ने लगा था. 'कहते हैं कि भुतहा बगीचे में रत्तन डोम की आत्मा अभी तक भटकती है, जिसने जमींदार के जुल्म से तंग आकर फाँसी लगा लिया था. सारी रात वह उसी बगीचे में कलपता रहता है . कभी कभी उसके रोने की आवाज भी लोगों को सुनाई भी देती है. तीसिया चमारिन, जिसने सास के जुलुम से तंग आकर एक दिन  खुद पर ही मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली थी ,  रात भर हाथ में लुत्ती लेकर सिवान के  इस माथे से उस माथे तक दर्द से बिलबिलाती हुयी चौकड़ी भरती है ......"  इन्ही सब सोचों में डेढ़ घंटे बीत गए . इस बीच तीनसुकिया धड़धड़ाती हुयी निकल गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लेकिन घर भी तो वापस नहीं जा सकता. कौन सा मुँह लेकर जाऊँगा.....नहीं घर तो बिलकुल भी नहीं जाना है ....."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बनारस चला जाता हूँ. वहीँ गंगा के घाट पर बैठ कर रामायण बाचूँगा....किसी तरह खाने को तो मिल ही जाएगा....".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लेकिन पास में एक भी पैसा नहीं है, टिकट कैसे लूँगा ?......"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"टिकट की क्या जरुरत है ...इतने भोर में कौन जाँच करने आ रहा है ." अंतिम फैसला लेते लेते भोर होने लगी थी. पाँच बजने वाला था. मुन्नर उठकर स्टेशन की ओर चल दिए गाड़ी का पता करने .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता चला कि बनारस जाने वाली पैसेंजर गाड़ी साढ़े पाँच बजे आयेगी. अब मुन्नर के लिए प्रतीक्षा का एक एक पल भारी लग रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः गाड़ी आयी और मुन्नर बिना टिकट ही गाड़ी में सवार हो गए, बनारस जाने के लिए .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मुन्नर कि किस्मत.....बनारस पहुँचने से तीन चार स्टेशन पहले ही मजिस्ट्रेट की जाँच हो गयी. मुन्नर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और पन्द्रह दिनों के लिये जेल में डाल दिया. पुलिस को उन्होंने अपना नाम पता गलत बताया और कहा कि घर में कोई नहीं है. अकेला हूँ . नहीं चाहते थे कि बात गाँव में पहुँचे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                    XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवेरे जब मुन्नर द्वार पर नहीं दिखे तो पहले माई ने सोचा कि दिशा-फराकत के लिए गए होंगे. परन्तु जब सूरज ऊपर चढ़ने लगा फिर भी मुन्नर लौट कर नहीं आये तो माई को चिंता होने लगी. वे मैदान की तरफ से आने वाले लोगों से पूछने लगीं कि किसी ने मुन्नर को देखा है. किन्तु सभी ने अनभिज्ञता प्रकट की. अब माई का मन डूबने लगा. मन में शंका- कुशंका का ज्वार उठने  लगा - कहीं घर छोड़कर चले तो नहीं गए ? लेकिन जायेंगे कहाँ?? कहीं कुछ कर तो नहीं लिया ?? माई का मुँह कलेजे को आ गया.  नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता ...स्वयं को सांत्वना दीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस बजने को आ गए थे लेकिन मुन्नर का कहीं कोई पता न चल सका. अब माई की चिंता ने जोर पकड़ लिया और उन्होंने आस पास सबको बता दिया कि मुन्नर सुबह से ही गायब हैं.  मुन्नर की जोर शोर से खोजाई शुरू हो गयी. पल भर में पूरे गाँव में बात फैल गयी- मुन्नर लापता हैं. गाँव का हर कोना ढूँढा जाने लगा, जहाँ भी आत्महत्या की संभावना हो सकती थी. सारे कुएँ तलाशे जाने लगे. बगीचों में ढूँढा जाने लगा कि कहीं फाँसी न लगा लिए हों या धतूरा खा कर कहीं पड़ गए हों. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;माई ओसर में बैठी रो रही थीं. पड़ोस की औरतें ढ़ाँढ़स बँधा रही थीं - अरे जायेंगे कहाँ, कहीं किसी यार-दोस्त के यहाँ चले गए होंगे पड़ोस के गाँव में . या फिर बहिनियाँ  के यहाँ चले गए होंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ पुरुष भी कुएँ के चबूतरे पर बैठे हुए थे. इस बीच मुन्नी के हाथ रामायण में रखी चिट्ठी लग गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चच्चा की चिट्टी ..." मुन्नी भागती हुयी मड़ई से बाहर निकली ओर माई के पास ओसर में आ गयी. कुएँ पर बैठे लोग भी ओसर में आ गए .&lt;br /&gt;लल्लन  ने चिट्टी मुन्नी के हाथ से लेकर सस्वर पढना शुरू किया -- "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भईया,&lt;br /&gt;जब तक आपको  मेरा पत्र मिलेगा, मैं इस दुनिया से दूर चला जा चुका होऊँगा.&lt;br /&gt;मेरा होना हमेशा आप सबके लिए दुःख का कारण ही रहा है. मुझमे अब जीने की इच्छा ख़त्म हो चुकी है. नहीं चाहता कि मेरे कारण सब लोग और अधिक मुसीबत में आयें. मैं जा रहा हूँ. कल सुबह जाने वाली गाड़ी के साथ ही मेरी जीवन लीला समाप्त हो जायेगी.&lt;br /&gt;माई,&lt;br /&gt;शोक मत करना. समझ लेना तुम्हारा एक ही बेटा था.  &lt;br /&gt;जयराम "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माई को चक्कर आ गया वहीँ बेहोश होकर धरती पर लुढ़क गयीं. लोग दौड़कर पानी ले आये और उनके मुँह पर पानी के छींटे मारने लगे और हाथ के पंखे से हवा करने लगे. थोडी देर में होश आया तो छाती छाती पीट पीट कर रोने लगीं. भौजी को भी कोसने लगीं कि उनकी कल की बातों के कारण ही ऐसा हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक भईया भी आ गए . गाँव में घुसते ही उन्हें खबर मिल गयी थी कि मुन्नर लापता हैं. घर आये तो देखा मातम मचा हुआ है. पत्र पढ़ा और साईकिल उठाकर स्टेशन की ओर भागे, साथ में दो तीन और लोग भी हो लिए अपनी अपनी साईकिलों से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टेशन से एक- दो किलोमीटर आगे पीछे की सारी पटरी छान मारी  किन्तु मुन्नर की लाश कहीं न मिली. थक हार कर तीसरे पहर तक सारे लोग घर वापस आ गए. दूसरे दिन भईया जाकर पुलिस स्टेशन में मुन्नर के गुमसुदी की रिपोर्ट लिखा दिए . माई को इतनी सांत्वना देने में सफल रहे कि मुन्नर जिन्दा हैं और कहीं चले गए हैं . कभी न कभी तो लौट ही आयेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओसर में चारपाई पर लेटे लेटे भईया शून्य में घूर रहे थे- शायद मेरे गुस्से के डर से ही मुन्नर गया होगा. जैसा भी था , जरुरत पड़ने पर मेरे साथ वही तो खड़ा होता. अपना खून था. पता नहीं कहाँ चला गया.... जिन्दा भी है या नहीं. सारा गेहूँ भी जल गया...खाने पीने का इंतजाम कैसे होगा......" सोचते सोचते भईया कि आँखों में आँसू छलछला गए .        &lt;br /&gt;                &lt;br /&gt;                                           XXXXXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंद्रह दिनों बाद जब मुन्नर जेल से छूटे तो उनकी हालत किसी मानसिक रोगी जैसी थी. मन में अनिश्चितता ने घर कर लिया था. कुछ भी निर्णय कर पाने की शक्ति खो चुके थे. कहाँ जाऊँ ? क्या करुँ ? कुछ भी नहीं तय कर पा रहे थे. दल चलकर स्टेशन तक पहुँचे और प्लेटफोर्म की एक बेंच पर बैठ गए. आने जाने वाली गाड़ियों को निर्विकार रूप से देखने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदन पर वही पंद्रह दिन पुरानी लुंगी और कुरता था, जो बहुत ही मैला हो चुका था. गाड़ियों के आवागमन की उद्घोषणा और लोगों का शोर उन्हें थोडी देर में ही खलने लगा. तभी प्लेटफोर्म पर आकर एक गाड़ी खड़ी हुयी. उठकर अनायास ही उसमे चढ़ गए. कुछ देर बाद गाड़ी चल दी. उन्हे स्वयं नही पता था कि वे कहँ जा रहे थे. बस गाड़ी मे बैठे चले जा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज डूब रहा था. पश्चिम का आसमान लाल रंग से पुता हुआ लगा रहा था. गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी. मुन्नर खिड़की से बाहर देख रहे थे. कोई छोटा सा स्टेशन था. स्टेशन के दूसरी तरफ कुछ झोपडियाँ बनी हुयी थी. एक सरकारी कुँआ था जहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे. थोडी दूर पर कोई नदी बह रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाड़ी बहुत देर तक रुकी रही। मुन्नर उबने से लगे. बिना किसी उद्देश्य के गाडी से उतर गए और पटरी पार कर के कुएँ के चबूतरे पर जा बैठे. वहीँ से टकटकी लगाकर गाड़ी को देखते रहे. वास्तव में वे गाड़ी को नहीं अपितु शून्य में घूर रहे थे. थोडी देर बाद गाड़ी चल दी परन्तु वे वहीँ बैठे रहे. उठकर गाड़ी में सवार होने का कोई उपक्रम नहीं किये. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडी ही देर में धुँधलका सा होने लगा. उन्हें कुछ प्यास लग आई. सामने नदी का किनारा दीख रहा था. वे विक्षिप्तों की तरह नदी की ओर चल दिए . नदी पर पहुँच कर हाथ मुँह धोया, पानी पिया. नदी के किनारे से ऊपर आये तो देखा थोडी दूर पर कोई गाँव सा दिख रहा था. जो नदी के किनारे पर ही बसा था. सामने से जो पगडंडी थी वह गाँव की ओर जा रही थी. कुछ सोचकर वे गाँव की ओर चल दिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात घिरने लगी थी. गाँव जीतनी दूर दिख रहा था, उससे अधिक दूरी पर था. चलते चलते थकान होने लगी थी. गाँव से थोड़ा पहले ही कनेर के पेड़ों का एक झुरमुट था. चालीस पचास पेड़ बेतरतीब उगे हुए थे. उनके बीच में एक छोटा सा मंदिर दिखा. वे मंदिर की ओर बढ़ गए. मंदिर में मूर्ति किसकी थी, यह न पहचान सके. परन्तु मंदिर की दशा से यह प्रर्दशित हो रहा था कि उनकी तरह ही मन्दिर भी उपेक्षित है. बाहर, मंदिर से लगा हुआ एक छोटा सा चबूतरा था. वे  चबूतरे पर बैठ गए . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव के घरों में लालटेन और दीये की बहुत ही मद्धिम सी रोशनी दिखाई दे रही थी. रात का खाना पकाने का समय था.  घरों से चूल्हे का धुआँ उठ कर थोडा ऊपर अँधेरे में विलीन हो जा रहा था. भूख लगने लगी थी. मुन्नर ने इधर उधर निगाह दौडाई. आधे चाँद की हलकी सी रोशनी में देखा पास में ही झरबेरी का एक पेड़ था. उठकर कुछ बेर तोड़ लाये और चबूतरे पर बैठकर खाने लगे. थोडी देर बाद वहीं चबूतरे पर लेट गए. &lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;"घर पर क्या हो रहा होगा! अब तक तो शोक भी ख़त्म हो गया होगा. लोग अपने अपने काम में लग गए होगें. जीवन भर तो कोई किसी के लिए नहीं रो सकता...." न जाने कितनी देर तक सोचते रहे. मन और शरीर दोनों ही बुरी तरह से थके हुये थे.  नींद आ गयी.&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;रात भर बेखबर सोते रहे. नींद खुली तो सवेरा होना वाला था. उठकर नदी के किनारे जाकर नित्य क्रिया कर्म करके जब लौटे तो धीरे धीरे प्रकाश होने लगा था. नहाकर कुरते को नदी के पानी में धो दिया था और पास में ही एक झाड़ पर सूखने को डाल दिया था. वापस आकर नंगे बदन ही चबूतरे पर बैठ गए .&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अब आगे क्या करें? हे भगवान तुम्ही कोई ठिकाना दो !!! मंदिर की तरफ मुँह करके आँख बंद कर लिए और सुन्दर काण्ड का सस्वर पाठ करने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव के बहुत से  लोग नित्य क्रिया कर्म के लिए नदी के किनारे इस तरफ आते थे. देखा कि एक व्यक्ति नंगे बदन चबूतरे पर बैठकर रामायण का पाठ कर रहा है. बाल बेतरतीब बिखरे हुए , दाढ़ी बढ़ी हुयी. कुछ लोग कौतुहल वश खड़े हो गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब लगभग दस-पंद्रह मिनट बाद मुन्नर ने आँखे खोली तो देखा कि चार पाँच लोग उनके पास खड़े थे. सबकी आँखों में यही कौतुहल था कि वह कौन है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कौन हो महाराज, कहाँ से आये हो ???" बच्चन ने थोडा हिचकिचाते हुए पूछा. मन में भय था कि कहीं कोई सिद्ध महात्मा न हों और गुस्सा न कर बैठें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर ने कुछ कहा नहीं बस बच्चन की तरफ निगाह उठाकर देखा. खुद को इस हालत में पाकर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें. उन्हें चुप देखकर बच्चन थोडा सकपका गये कि कहीं कोई गुस्ताखी तो नहीं हो गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम भी बौड़म की तरह सवाल करते हो बच्चन,  अरे देख नहीं रहे हो बाल बरमचारी हैं, कितना तेज फूट रहा है माथे से ......” ललिता पंडित ने बात को संभालते हुए कहा."कितना ओज है वाणी में ......महराज यहीं रुकना है अभी या आगे की यात्रा है ?” ललिता पंडित मुन्नर के रामायण पाठ से बहुत प्रभावित लग रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कहाँ जाना है यह तो उपरवाला ही तय करेगा." मुन्नर ने एक गहरी साँस छोड़ते हुये बिलकुल शांत स्वर में आध्यात्मिक ढंग से कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बहुत ऊँची बात कही आपने महाराज ....." ललिता पंडित ने कहा. तभी उन्हें काशी  के साधु बाबा की कही  बात याद आ गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ललिता पंडित धार्मिक प्रवृत्ति के एक सरल व्यक्ति थे. जजमानी के अलावा तीन चार बीघे जमीन की खेती भी थी. किसी तरह से गुजर-बसर हो जाती थी. जब कोई जुगत बैठता तो तीरथ-बरत भी कर आते थे. साधु-महात्मा से बहुत शीघ्रता से प्रभावित हो जाते थे. अधिक धन पाने के लिए कभी कोई गलत काम तो नहीं करते थे परन्तु दूसरे आम लोगों की तरह ही धनवान होने की इच्छा मन में कभी कभी जोर मारने लगती. कभी सोने से पहले आँखे बंद करके सोचते कि काश! घर में या किसी खेत में से कभी सोने-चाँदी से भरा एक घडा निकल आता. लक्ष्मी माता की पूजा नित्य करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले सावन में जब संकठा सिंह के साथ काशी गए थे, बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने,  तब गंगा घाट पर एक साधु मिले थे. पूरे दो रुपये दक्षिणा देकर अपना भविष्य बँचवाया था. बाबा ने कहा था- "बहुत जल्दी ही तुम्हारा भाग्योदय होने वाला है. कोई अनजान व्यक्ति तुम्हारे जीवन में आएगा और तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे." सोचे तो थे कि साधु बाबा बताएँगे कि धन की प्राप्ति कैसे होगी परन्तु यह तो...चलो जो भी है भाग्योदय होगा तो अच्छा ही है,  भले ही किसी और के कारण हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक उनके मन में विचार उठा कि हो न हो यह सन्यासी उनका भाग्य परिवर्तित करने के लिए ही आया है. इस बीच में दूसरे लोग भी कुछ बातें करने लगे. बातों का कुल मिलाकर उद्देश्य, यह जानना था कि मुन्नर कौन हैं , कहाँ से आये हैं और कहाँ जायेंगे. यदि कोई सिद्ध महात्मा हैं तो गाँव के लोगों का दुख कैसे दूर कर सकते हैं. धीरे धीरे और लोग भी जमा होने लगे थे. जवान, बच्चे, बूढे सभी थे. एक छोटी सी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जून का दूसरा पखवाड़ा चल रहा था. दिन में धरती तवे की तरह जल रही थी. आसमान पर बादल कभी दिखाई भी देते तो घूम फिर कर लौट जाते थे. गर्मी से लोग बेहाल तो थे ही उसके अलावा असाढ़ की बुआई के लिए बरसात का ही भरोसा था. लोग आस लगाए बैठे थे कि कब बारिश हो और जुताई शुरू की जाय. बरसात होने में देरी गाँव वालों की चिंता दिन पर दिन बढाये जा रही थी. इन्द्र देव के मनुहार के लिए जगह जगह कढाइयाँ चढ़ाई जा रही थी. तीन चार दिनों से बादल आते थे पर घूम कर लौट जाते थे,  बरसते नहीं थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव वालों की मुन्नर से वार्तालाप चल ही रही थी कि बादल घिर आये और बरसात शुरू हो गयी. गाँव वाले तितर बितर होने लगे. बरसात ने शीघ्र ही जोर पकड़ लिया था.     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"महराज, मंदिर के अन्दर आड़ ले लो.." ललिता पंडित ने बरसात से बचने के लिए भागते हुए कहा. लोग भागकर भुक्खन की झोपडी में शरण ले लिए जो वहां से दस पंद्रह फर्लांग दूर थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर चबूतरे पर ही बैठे रहे. उन्हें अच्छा लग रहा था भींगना. लग रहा था जैसे वर्षा की शीतल बूँदों से मन का ताप धीरे धीरे मिट रहा हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झोपड़ी में खड़े खड़े लोग देख रहे थे कि मुन्नर अभी भी बरसात में बैठे भीग रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे देखो, बाबा तो अन्दर मंदिर में गये ही नहीं, वहीं चबूतरे ही पर बैठे बैठे बरसात का मज़ा ले रहे हैं " किसना ने चुटकी लेने के अंदाज़ में कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हमेशा चुहुल नहीं किया जाता किसन......" ललिता पंडित ने गंभीर होते हुए कहा 'सिद्ध महातमा हैं,  उनके लिए क्या बारिश और क्या ठंडी-गर्मी."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लेकिन सन्यासी की तरह लग तो नहीं रहे है....मुझे लगता है कि पुलिस का कोई जासूस है. बिसंभर के यहाँ पड़ी डकैती का टोह लेने के लिए भेष बदल कर आया होगा" किसना का साथी झम्मन ने कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम लोग स्कूल, कालेज जा रहे हो लेकिन ज्ञान एक पैसा का भी नहीं है ...." ललिता पंडित के मन में अपनी बात न मानने से थोडा रोष पैदा हो गया था, "..... इस उमर में कोई पुलिस में भरती होता है क्या .... हप्ता भर से कढैया चढ़ रहा था एक बूँद भी पानी बरसा ?" सबको संबोधित करते हुए बोले... ' आज देखो उनके चरण पड़ते ही क्या हरहराकर पानी बरसने लगा." लोग चुप हो गये. किसी ने कुछ नहीं कहा. सबको उनकी बात में कुछ सत्यता दिखने लगी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बस यहाँ कुछ दिन रुक जाएँ तो गाँव का उद्धार हो जाएगा " इस बार थोड़ा धीमी आवाज में बोले जैसे स्वयं से ही कह रहे हों, “लेकिन रमता जोगी , बहता पानी , देखो कब तक रुकते हैं….. गाँव की किस्मत ". अब उन्हें विश्वास होने लगा था कि यह वही व्यक्ति है जो उनका भाग्य परिवर्तन करेगा.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक- डेढ़  घंटे लगातार बरसने के बाद बादल छाँट गये लोग झोपड़ी से निकल कर इधर उधर अपने घर और काम पर जाने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव में मुन्नर को लेकर तरह तरह की बातें फैल गयीं. कोई कहता - धनेसरी माई के मंदिर पर एक सिद्ध महात्मा पधारे हैं. बहुत ही ग्यानी, सारे वेद, पुराण, रामायण, गीता सब कंठस्थ है. देखने में तो अभी लड़के लगते हैं लेकिन इतने प्रतापी हैं कि उनके गाँव में पैर रखते ही बरसात शुरू हो गयी. कुछ लोग आशंका भी व्यक्त करते- पता नहीं कहाँ से आया है , कौन है? कुछ नवयुवक उनके जासूस या बहुरूपिया होने की शंका भी जाहिर कर रहे थे. जितने मुँह उतनी बातें हो रही थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कुछ भी हुआ उससे मुन्नर को इतना फायदा तो हुआ कि लगभग दो दिन से जल रही क्षुधा के लिए भरपेट भोजन मिल गया था. पिछले पंद्रह सोलह दिनों से लगातार मानसिक यंत्रणा सहने के बाद लोगों की आँखों में अपने लिए सम्मान देखना सुखद लगा, भ्रमवश ही सही. अब वे इस भ्रम को बनाए रखना चाहते थे. कनेर के पीले फूल मोहक लग रहे थे - बहुत दिनों बाद उन्हें प्रकृति की किसी वस्तु में आकर्षण दिखा. मन की भावनाएँ वापस लौटती हुयी प्रतीत होने लगी थी.    &lt;br /&gt;                             &lt;br /&gt;                                                  XXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी शाम  होने में लगभग घंटा-डेढ़ घंटा बाकी था. परन्तु दोपहर की बरसात ने मौसम सुहाना कर दिया था. हवा में थोड़ी शीतलता आ गयी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बब्बन पांडे, सिराहू सिंह और राम आधार पांडे के अलावा गाँव के दो-एक और माननीय लोग संकठा सिंह के द्वार पर नीम के पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठकर भूँजे का आनंद ले रहे थे. सरपत से बनी छोटी छोटी दो- तीन टोकरियों में भुना हुआ चना और लाई रखा हुआ था. साथ में लहसुन, मिर्च और नमक की चटनी और गुड़.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकठा सिंह गाँव के सबसे सम्पन्न लोगों में से एक थे और बहुत ही जिंदादिल आदमी थे. खाना, खिलाना, गपशप करना उनका शौक था. शाम के समय प्रायः गाँव के मित्र लोग दरवाजे पर आ जाते थे. ताजे भुने हुए दाने की  सोंधी महक और स्वाद के साथ निंदा रस की भी नदियाँ बहतीं. गाँव की हर घटना पर इन लोगों की राय अपना एक महत्त्व रखती है और हर बात की यहाँ चर्चा होती है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात उड़ते उड़ते यहाँ तक भी आ पहुँची थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लगता है बाऊ साहब, आजकल गाँव के नक्षत्र ठीक नहीं चल रहे हैं ....." बब्बन पांडे अपने स्वर में जीतनी चिंता और गंभीरता ला सकते थे, लाकर एक लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले.  सभी की प्रश्नवाचक दृष्टि उन पर गड़ गयी.  आगे बोलना शुरू किये,  "ललिता पंडित उसके सिद्ध महात्मा होने का प्रचार कर रहे हैं . हम कहते हैं कि अगर वह संत है तो अब से पहले कहाँ था, कहाँ से आया है और इस गाँव में क्यों आया है? सभी को उनके प्रश्न जायज लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हमें तो लगता है कि वह या तो पुलिस का जासूस होगा या किसी गिरोह से ताल्लुक रखता होगा. गाँव की टोह लेने आया होगा."  आम आधार पांडे न अपना मत व्यक्त किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पुलिस का जासूस इस गाँव में क्या लेने आयेगा?" सिराहू सिंह ने असहमति जताते हुए रूखे स्वर में कहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काहें , हरवंश के यहाँ डकैती नहीं पड़ी थी ?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम भी गजब बात करते हो, डकैती पड़े हुए छः महीने बीत गए. तीन डकैतों को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया है. अब जासूस क्या लेने आएगा." सिराहू सिंह ने राम आधार पांडे की बात को सिरे से नकार दिया.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तब किसी गिरोह से ही होगा" दूसरी संभावना उठ खड़ी हुयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'गिरोह -उरोह से कुछ नहीं,  तुमने देखा है उसे ??? अठारह उन्नीस साल का भोला भाला सा लड़का है. कौन सा  गिरोह बनाएगा.' सिराहू  सिंह खेत पर जाते समय  एक उड़ती निगाह मुन्नर पर डाल आये थे. "मेरे विचार से वह या तो घर से भागा हुआ है या कोई यतीम होगा जो यहाँ -वहाँ भटक रहा है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब राम जाने कौन है, पर जो भी है गाँव के लिए अनजान है. उससे खबरदार रहना चाहिए." संकठा सिंह ने बात को ख़त्म सा करते हुए कहा.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी उधर से गुजरते हुए ललिता पंडित पर नजर पड़ी. लम्बे लम्बे डग भरते हुए जल्दी में चले जा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे पंडित जी, इधर तो आओ...यह हम क्या सुन रहे हैं कि कोई महात्मा पधारे हैं ........." संकठा सिंह ने ललिता पंडित को आवाज दी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अब क्या पता की महात्मा है या बहुरुपिया है कोई." बब्बन पांडे ने धीमे स्वर में कहा. तब तक ललिता पंडित चारपाई के पास पहुँच चुके थे.  बब्बन  पांडे ने थोड़ा खिसक कर ललिता पंडित के बैठने के लिए जगह दे दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं पंडित जी, बहुरुपिया तो नहीं है......" ललिता पंडित ने एक एक शब्द पर बल देते हुए कहा,  ' हैं तो कोई सिद्ध महात्मा ही "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सुने हैं कि बहुत ही कम उम्र के हैं और रात से ही वहीँ धनेसरी माई के मंदिर में पड़े हुए थे ??? " राम आधार पांडे ने प्रश्न किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अब साधु महात्मा की उम्र क्या होती है. लगता है बाल बरमचारी होंगे.....कब आये ये तो पता नहीं....सुबह जब नदी से लौट रहा था तो लगा कि कहीं कोई रामायण बाँच रहा है. मैंने सोचा कि यहाँ नदी के किनारे रामायण कौन बाँचेगा. इधर उधर नज़र दौडाई तो क्या देखता हूँ कि मंदिर पर कोई बैठा है . पास गया तो महराज आँखे बंद किये हुए , पद्मासन लगाए , नंगे बदन  बैठे हुए थे.. साक्षात्  देवता के तरह लग रहे थे ...रामायण की चौपाईयाँ मुहजबानी गाये जा रहे हैं ... इतनी मिठास आवाज़ में कि जैसे सरसती का वास हो." कहते कहते ललिता पांडे की आँखे चमकने लगी और वे भाव विभोर होने लगे. “और देखो हम उनसे अभी बात ही कर रहे थे और कह ही रहे थे कि महाराज सूखे से हम तंग हो गये हैं अचानक बादल घिरा और बरसने लगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ बैठे लोग ललिता पांडे की बात पर पूर्णतः विश्वास तो नहीं कर पाये पर पूरी तरह विरोध भी नहीं किये. पानी तो बरसा था, जो एक सत्य था और आज ही बरसा था जब मुन्नर  गाँव में आये थे.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो आपने उनसे बात की,  क्या लगा कि यहाँ रुकेंगे या चले जायेंगे???" संकठा सिंह ने पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वे तो सुबह ही जा रहे थे, पर मैंने उनसे चिरोरी की कि महराज कुछ दिन रुक जाईये, गाँव का भला हो जाएगा,  लेकिन उन्होंने कुछ आश्वासन नहीं दिया...अच्छा मैं अभी चलता हूँ , गोसाईं के पूरा तक जाना है." वे उठ खड़े हुए ,  "देखो रुकते हैं कि चले जाते हैं." कहते हुए ललिता पंडित चले गए .  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकठा सिंह को साधु, महात्मा लोगों में अधिक रूचि न थी और न ही ललिता पंडित की बातों पर विश्वास ही हो रहा था और वो ये भी जानते थे कि ललिता पंडित साधुओं से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. उनके जाने के बाद उस विषय में थोडी बहुत और बात हुयी. उसके बाद  चकबंदी की चर्चा शुरू हो गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम बात जो उस सम्बन्ध में हुयी, उसका सार यह था कि जो भी हो थोड़ा होशियार रहना चाहिए. किसी पर आँख बंद करके विश्वास नहीं कर लेना चाहिए. वैसे तो अठारह उन्नीस साल का लड़का गाँव का क्या बिगाड़ सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम के समय ललिता पंडित मुन्नर के लिए फिर खाना ले आये. मुन्नर दोपहर में खाना कुछ ज्यादा ही खा लिए थे. पेट भरा भरा सा लग रहा था. मना कर दिया खाने से. बस खाने के साथ जो गाय का एक गिलास दूध था उसे पी लिया. ललिता पंडित ने सोचा कि बाबा एक ही वक़्त खाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"रात में विश्राम करने के लिए हमारे दरवाजे पर ही चले चलिए महराज! " ललिता पंडित ने आग्रह किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं मैं यहीं सो रहूँगा, इसी चबूतरे पर." मुन्नर ने कहा.  अचानक जो एक नयी परिस्थिति बन आई थी, उसमे मुन्नर सोच समझ कर कदम उठाना चाहते थे. लोगों के मन में उनके प्रति सन्यासी होने का जो भ्रम बन रहा था, उसे खत्म नहीं करना चाहते थे. कम से कम सम्मान तो मिल रहा था. और इतना बड़ा गाँव है एक दो वक़्त का खाना तो मिल ही जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लेकिन बाबा, यहाँ तो खतरा है, रात में कोई जीव-जंतु....." उनका संकेत साँप, बिच्छुओं  की ओर था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जो ईश्वर की इच्छा होगी, वही होगा." उन्होंने दार्शनिक अंदाज में कहा, " होइहें वही जो राम रचि राखा...."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ललिता पंडित लाजवाब हो गए और घर चले आये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते में सोचते रहे- वैसे तो महात्मा हैं, उन्हें साँप-बिच्छू क्या छुएगा, दूसरे, देवि के चबूतरे परकिसी जीव की चढ़ने की हिम्मत न होगी. फिर उन्हें ख्याल आया कि आज तो बरसात के कारण मौसम थोडा ठीक हो गया था. लेकिन कल से दिन में बाबा कहाँ रहेंगे. मंदिर के चबूतरे पर तो पूरी धूप आती है. मंदिर के अन्दर तो इतनी जगह नहीं है कि कोई पैर फैला सके. कनेरों के नीचे छाया रहती है पर जमीन पर कैसे लेटेंगे. कोई चारपाई डाल दूँ? नहीं महात्मा लोग चारपाई पर नहीं सोते. तख्त चाहिए. पर उसे बनवाने के लिए लकडी कहाँ है?  फिर ख्याल आया कि कनेरों से ज्यादा छाया पारिजात के नीचे रहती है. बहुत पुराना पेड़ है. बरगद की तरह शाखाएँ फैली हुयी हैं. "क्यों न पारिजात के पेड़ के तने से सटाकर एक मिट्टी का चबूतरा बना दिया जाय''  मन में बात कौंधी और जँची भी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन सुबह अपने छोटे बेटे और निराहू राजभर के साथ फावड़ा लेकर आये. एक कोने से मिट्टी खोद खोद कर चबूतरा बनाने  लगे. शाम होते होते चबूतरा बन कर तैयार हो गया. उस पर गोबर से लिपाई कर दी गयी. जजमानी में मिली एक दरी भी डाल दिए उस पर. इसके अलावा एक छोटी सी बाल्टी और लोटा भी रख दिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर, सब कुछ अपने पुण्य और पापों का फल समझ कर स्वीकार कर रहे थे। दिन में पारिजात के नीचे लेटे लेटे लू के थपेडों से जब चेहरा और शरीर झुलस सा उठता तो सोचते, "यही प्रायश्चित है मेरा." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं था कि गाँव में केवल ललिता पंडित अकेले ही थे जो मुन्नर में एक सिद्ध महात्मा देखते थे. उनके अलावा कई दूसरे लोग भी थे जो मुन्नर का एक महात्मा की तरह सम्मान करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन बेचन महतो जब अपने दस साल के लड़के को, जो  महीने भर से बीमार चल रहा था और जटाशंकर वैद्य से  लेकर शिवमूरत  डाक्टर तक की दवाईयों से बुखार न उतर सका , तहसील के बड़े अस्पताल में दिखाकर लौट रहे थे तो सोचा कि  बाबा का भी आशीर्वाद दिला दें बच्चे को. उस दिन शाम को जब बुखार उतरा फिर उसके बाद दोबारा न आया. तीन-चार दिन में ही लड़का घूमने फिरने लगा. बेचन महतो लोगों से कहते फिरते- 'डाक्टर, वैद्य तो दवाईयाँ देते ही हैं, लेकिन फायदा करेगी या नहीं यह तो भगवान की मर्जी होती है.  संत, महात्मा के आशीर्वाद में बड़ा दम होता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन रात गृहस्थी की चक्की में पिसते हुए, समाज और संस्कारों के बोझ को काँधे पर उठाये,  ताकतवर लोगों की वरिष्ठता के दंभ की ताप को सहते हुए, सुबह से शाम तक रोटी की जुगाड़ में जी तोड़ मेहनत  करने वालों के लिए अंतिम आसरा तो ईश्वर ही होता है. परन्तु वह सदा ही अदृश्य, मूक और बधिर रहता है. ऐसे में यदि कोई जीता जागता, मनुष्य रूप में, सहारा दीखाई देता है तो मन का आकृष्ट होना नितांत स्वाभाविक होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम के समय दो चार लोग कनेरों के झुरमुट की तरफ आ ही जाते थे. चर्चा के लिए कोई रामायण का प्रसंग उठ जाता या सामान्य आध्यात्मिक बातें. प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक जीवन दर्शन होता है, जिसे वह बड़ी गंभीरता से दूसरे को सुनाना चाहता है. दिन भर की एकाकी के बाद मुन्नर का भी मन बहल जाता. जी में आता तो कुछ चौपाईयाँ गा देते. स्वर अच्छा था उनका. लोगों को उन्हें सुनना भाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;XXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग एक सप्ताह गुजर चुका था उन्हें इस गाँव में आये. एक दिन संकठा सिंह पड़ोस के गाँव से किसी पंचायत का फैसला करके अपनी साईकिल पर लौट रहे थे. दोपहर के बारह बज रहे होगें. लू और बवंडर उठ रहा था. अपने चेहरे  को पूरी तरह गमझे से ढँके हुए थे, फिर भी चेहरे पर ताप लग रही था. आँखे तक जलने लगीं थी.  देखा कि मुन्नर पारिजात के नीचे चबूतरे पर लेटे हुए थे. संकठा सिंह थोडी दूर, पगडण्डी से गुजर रहे थे फिर भी इतना वे देख पा रहे थे कि मुन्नर चेहरे को दोनों बाहों के बीच में घुसाकर लू के थपेडों से बचने का अथक प्रयत्न कर रहे थे. घुटने और कुहनियाँ लगभग सट रहीं थी और शरीर दोहरा हो रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखकर उनका मन द्रवित हो उठा. "पता नहीं कहाँ से आया है. इस लू की चपेट में आ गया तो राम नाम सत्य हो जाएगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव में घुसे तो राम आधार पांडे के ओसार में ललिता पंडित भी मिल गए. कुछ और लोग भी बैठे थे. वे अपनी साईकिल रोक लिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आईये, बाऊ साहब, किसके पक्ष में फैसला हुआ पंचायत का? " राम आधार पांडे ने उनका स्वागत करते हुए पूछा. तब तक वे ओसर में आ गए और एक चारपाई पर बैठ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पंचायत की बात तो अभी बताता हूँ, पहिले जो देखकर आ रहा हूँ वह सुनो." फिर ललिता पंडित को संबोधित करके बोले, "पंडित जी, वो तुम्हारे महात्मा को देखा. वहीं पारिजात के नीचे लू में पड़पड़ा रहे हैं ...अरे यार कहीं कुछ हो-हवा गया तो एक नीरीह आदमी के मरने का पाप गाँव के माथे चढ़ जाएगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब हम क्या करें, हमने तो कहा था कि आकर मेरी मड़ई में शरण ले लो, पर वे माने ही नहीं."  ललिता पंडित अपनी जगह ठीक थे, "हम तो उस दिन सुबह से शाम तक लग कर पेड़ के नीचे चबूतरा बना दिए कि कम से कम छाँव तो रहेगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ऐसा क्यों नहीं करते कि वहीं पर एक मड़ई डलवा दो'  संकठा सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" बाऊ साहब, अब हमारी हैसियत कहाँ है मड़ई डलवाने की"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"एक काम करो मेरे बँसवार से दो बाँस कटवा लो और ककटी वाले खेत के पास से सरपत. देखता हूँ कुछ रहेट्ठा और लकडा पड़ा होगा. टटरी बनवाकर चारो तरफ से घिरवा देना."  संकठा सिंह की बात सुनकर ललिता पंडित ऐसे  खुश हुए जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी हो. कई बार मन में यह बात उठी तो थी पर माली हालत के कारण उसे मन में ही दबा देना पड़ा था. बाबा इस सेवा से अवश्य खुश हो जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे शाम से ही मड़ई बनवाने की व्यवस्था में जुट गए . दूसरे दिन शाम तक कनेर के झुरमुट के बीच जहाँ पेड़ थोड़े दूर- दूर थे , साफ सफाई करके एक झोपड़ी डाल दी गयी. गाँव के बहुत से लोगों ने यथा शक्ति योगदान किया. मुख्य सामन तो संकठा सिंह के यहाँ से मिल ही गया था. बनिया ने बाँधने के लिए बाध मुफ्त में दे दिया. बेचन महतो अपने परिवार और आस पड़ोस के साथ मड़ई बनाने में पूरा श्रमदान दिए. राम आधार पांडे के यहाँ लकडी का एक बोटा पड़ा था, लोहार ने उससे एक तख्त बना दिया. दरी तो पहले से ही थी, वह तख्त पर बिछ गयी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज रोज गाँव से खाना आना मुन्नर को अच्छा नहीं लगता था. इसलिए एक दिन ललिता पंडित से स्वयं खाना बनाने की इच्छा प्रकट की. ललिता पंडित ने और लोगों की मदद से खाना पकाने के लिए आवश्यक बर्तन रखवा दिए.मुन्नर स्वयं खाना पकाने लगे. जब मन होता तो दोनों वक़्त बना लेते, नहीं तो एक वक़्त से ही गुजारा कर लेते. गाँव से जो भी मिलने आता साथ में कुछ आटा, चावल या दाल जो भी जिसकी इच्छा और सामर्थ्य होती,  ले आता.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मुन्नर के खाने, पहनने और रहने की समस्या का स्थायी समाधान हो चुका था.  मड़ई के बनने के बाद से वहाँ अधिक लोग आने भी लगे थे और ज्यादा देर तक बैठने लगे थे. मुन्नर भी अब खुश रहते थे और बहुत ही मनोयोग से तुलसी रामायण का पाठ करते और उसकी व्याख्या करते जो उन्होंने बाबूजी से सीखा था. यह नयी जीवन शैली उन्हें भाने लगी थी. न तो किसी से दुश्मनी थी और न ही किसी से बैर. भक्तों की  कृपा से  रामायण के अलावा  कुछ एक और धार्मिक ग्रन्थ भी उनकी झोपड़ी में आ चुके थे. जब भी खाली समय रहता उसमे उनका अध्ययन करते. मन का क्लेश मिटने लगा था. किन्तु अपने गाँव घर का मोह कभी कभी उन्हें आकर घेर लेता था. "घर पर लोग कैसे होंगे, उनके आने के बाद क्या हुआ होगा ?" यह विचार कभी कभी मन में फन उठाकर खड़ा हो जाता और वे थोड़े अनमने हो उठते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, जिंदगी ने एक रास्ता पकड़ लिया था. एक निश्चित दिनचर्या में दिन गुजरने लगे थे. धीरे धीरे वह स्थान "कुटी" के नाम से जाना जाने लगा था और मुन्नर "कुटी वाले बाबा" के नाम से.           &lt;br /&gt;                                                     &lt;br /&gt;XXXXXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय के साथ साथ मुन्नर, बाबा के रूप में कुटी पर स्थापित हो चुके थे और उनके चमत्कार के छोटे मोटे किस्से कुछ एक दिनों के बाद प्रकाश में आने लगे थे-- कभी एक ही क्लास में दो साल से फेल हो रहा मँगरू पास हो जाता. कभी पंद्रह दिन से बीमार चल रहे रामजनम के बेटे का बुखार बाबा के स्पर्श मात्र से ही उतर जाता. कभी परवतिया का भूत बाबा के सामने आने से ही भाग खडा होता.  कभी जीतन की भैस, जो दो बार से पड़वा जन्म रही थी इस बार पड़िया जन्म देती. कभी गाँव में डकैती डालने की योजना बना रहे डकैत , डकैती से पहले ही पुलिस के द्वारा पकड़ लिए जाते. गाँव की बहुत सी छोटी बड़ी घटनाएँ बाबा के तपोबल से प्रभावित होने लगी थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि किसी को बाबा के आशीर्वाद का इच्छित फल नहीं मिल पाता तो वह यही सोचता कि श्रद्धा में कहाँ कमी रह गयी या फिर ईश्वर ही विपरीत हैं? आस पास के गाँव के लोग भी गाहे बगाहे बाबा का आशीर्वाद लेने चले आते थे. ललिता पंडित के ऊपर बाबा की विशेष कृपा थी. वे बिना बाबा के आशीर्वाद के एक खर भी इधर से उधर  नहीं करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उस दिन गजब हुआ जब पड़ोस के गाँव के चन्द्रबली सेठ अपनी कार से उतरे और बाबा के पैरों में लेट गये. साथ में आई लारी से फलों की टोकरी, मिठाई के डिब्बे , गद्दे , रजाई, सखुआ की लकडी का बना सुन्दर तख्त जिसके पायों पर नक्काशी की गयी थी, उतरने लगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा अपनी झोपड़ी में तख्त पर बैठे थे. सामने एक दरी बिछी हुयी थी जिस पर श्रद्धालु आकर बैठते थे. चन्द्रबली का घुटना जमीन पर टिका था और माथा बाबा के पैरों पर. आँखों से आँसुओं की धार बह निकली थी. ख़ुशी के आँसू थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज से एक साल पहले यही चन्द्रबली इसी झोपड़ी में बाबा का  दर्शन करने पत्नी सहित  आये थे. मुख पर क्लेश था. होता भी क्यों नहीं. कहाँ कहाँ नहीं जा चुके थे . कोई भी मंदिर -मजार,  पीर- फकीर, साधु -महात्मा , डाक्टर-वैद्य उनकी जानकारी में न बचा था, जहाँ वे सर न नवा चुके हों. किन्तु फिर भी पत्नी की गोद हरी न हो पायी थी. हर जगह नाउम्मीदी ही हाथ लगी थी. भगवान का दिया सब कुछ था. अच्छा खासा कारोबार. धन दौलत , घोड़ा गाडी सभी कुछ. कुछ न था तो वो महल जैसे घर के आँगन को अपनी किलकारियों से भरने वाली संतान. संतान सुख के लिए दिन रात छटपटा रहे थे. विवाह हुए सात साल हो चुके थे किन्तु संतान का मुख देखने को तरस गए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन जब बाबा के चरणों में सर नवाकर अपना दुखडा सुनाये तो बाबा ने कहा था - " ईश्वर पर भरोसा रखिये, सब ठीक हो जाएगा" और पास में पड़ी कठौती में से लाचीदाना का प्रसाद उठाकर पति-पत्नी दोनों को दिए थे। जो भी बाबा के पास कोई भी याचना लेकर आता था , बाबा उसकी मनोकामना पूर्ण करने के लिए इसी मंत्र का प्रयोग करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चन्द्रबली के घर आज बेटे ने जन्म लिया है. जिस ख़ुशी के लिए वर्षों से तरस रहे थे आज वह आँसुओं में ढलकर बाबा के चरणों को प्रक्षालित कर रही थी. बाबा ने उन्हें शांत कराकर बैठाया. दरी पर कुछ और भी भक्त गण बैठे हुए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बाबा ! आप तो साक्षात देवता हैं, आपके आशीर्वाद  से ही मेरा सौभाग्य उदित हुआ. आप मेरे लिए भगवान हैं...." चन्द्रबली सेठ भाव विभोर हो उठे थे और बाबा की शक्तियों की आराधना करने लगे .  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जर-जवार में बच्चा बच्चा जान गया कि कुटी के बाबा असीम शक्तियों के स्वामी हैं . कुछ भी करने में सक्षम. गाँव के कुछ संभ्रांत लोग जिनके मन में अभी तक शंका थी, उन्हें भी बाबा के चमत्कारों पर अब अविश्वास न रहा. जो लोग पहले बाबा की कुटी तक कभी नहीं जाते थे या किसी के साथ चले भी गए तो दूर से ही प्रणाम करके निकल लेते थे. अब उनके पास जाकर पूरी श्रद्धा से सर नवाते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुटी की कायापलट होने लगी. चन्द्रबली सेठ ने दो पक्के कमरे बनवा दिए , एक दूसरे से जुड़े हुए. एक में बाबा के सोने  के लिए पलंग थी और दूसरे में बाबा दोपहर के भोजनोपरांत ध्यान लगाते थे. एक छोटा सा मंदिर  भी बन गया था, जिसमे रामजी की मूर्ति थी , सीता मैया के साथ और एक दीवार से लगी भक्त हनुमान की मूर्ति थी. गाँव के लोग भी यथाशक्ति  बाबा के आराम के साधन जुटाते रहे .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे धीरे बाबा की कुटी तक आधुनिक संसाधन भी आने लगे. अभी तक गाँव में सरकारी ट्यूबवेल के अलावा कुछ एक बहुत ही सम्पन्न लोगों के घर पर ही  बिजली थी लेकिन  अब बाबा की कुटिया भी बिजली की रोशनी में चमकने लगी थी. बिजली के पंखे भी लग गए थे.  रिकॉर्ड प्लेयर आ गया था. बाबा रोज सुबह उठकर मुकेश का गाया राम चरित मानस का रिकॉर्ड लगा देते थे. पूरी कुटी भक्तिमय स्वर लहरियों में डूबने लगती थी. अनेकों वाद्य यन्त्र भी आ गए थे. गाँव के कई गवैये और भक्त शाम को कुटी पर आ जाते थे और कीर्तन होता था. ढोल, मजीरों की आवाज से कुटी गूँज उठती थी. अब कुटी सुबह- शाम चहल पहल से भरी रहने लगी.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;XXXXXXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय पंख लगाकर उड़ जाता है. पाँच साल से ज्यादा हो चुके हैं मुन्नर को इस गाँव मे आये हुए. लेकिन आज भी जब वह दिन याद आता है तो आँखों आँखों के सामने सारे दृश्य सजीव उठते हैं. अपने गाँव में बीता अंतिम दिन, जेल की यातनाएँ और इस गाँव में, लू के थपेडों के बीच खुले आसमान के नीचे  बिताये गए शुरूआती दिन. एक गहरी उच्छ्वास लेते मुन्नर - "जिंदगी भी क्या क्या करवट लेती है."  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह शाम तो कुटी पर लोगों की आवाजाही रहती है परन्तु दोपहर में प्रायः एकांत होता हैं. बस ललिता पंडित का बड़ा लड़का भोला, जो शरीर और दिमाग दोनो से ही थोडा असामान्य था, रहता है. वह मुन्नर का शिष्य जैसा हो गया है. सुबह आँख खुलते ही कुटी पर आ जाता, शाम को खाना खाने के बाद घर जाता. मुन्नर के सारे काम , खाना बनाना , कपडे धोना इत्यादि सब वही करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर को जब मुन्नर खाना खाने के बाद आराम करते, तो कई बार न चाहते हुए भी मन उड़कर अपने गाँव में पहुँच जाता. माई का चेहरा आँखों के सामने आ जाता. भईया , मुन्नी , छुटकी सभी की याद आती. यह भी विचार उठता कि मेरे आने के बाद क्या हुआ होगा. कैसा चल रहा होगा सब कुछ घर पर. घर का आँगन, द्वार पर का नीम का पेड़, कुँआ सब कुछ ही चित्र से आँखों के सामने आ खड़े होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग पच्चीस साल के हो चुके थे मुन्नर. कभी कभी जून की दोपहर की तपती लू की तरह यौवन का गुबार उठता और तन-मन दोनों को झुलसा देता. जाड़े की सर्द रातों में बिस्तर में अकेले करवट बदलते हुए एकाकीपन का अहसास अपनी चरम पर पहुँच जाता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन जब लक्ष्मी, जो ससुराल से पहली बार वापस मायके आई थी, सहेलियों के साथ बाबा के दर्शन करने आई थी. जब उनके अभिवादन के लिए पैरों को स्पर्श किया था, उसकी कोमल उँगलियों की छुवन से पूरे शरीर में एक बिजली सी कौंध गयी थी. कलाई में सजी लाल और हरी चूडियों की चमक उनके आँखों से मन में उतर गयी थी. सामान्य शक्ल सूरत वाली लक्ष्मी उन्हें गुलाबी साड़ी में कितनी मोहक लगी थी. बहुत देर तक उसे देखते रहे थे. मन में दबी एक चिनगारी  कुलबुला उठी थी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी चाँदनी रात में मंदिर के चबूतरे पर बैठकर कनेर के पत्तों से जमीन पर छनती चाँदनी को एकटक देखते और सोचते कि काश कोई होती जिसकी उँगलियों को पकड़कर पारिजात के पेड़ के पास ले जाते और तने से पीठ टिकाकर उसकी आँखों में अपने सपनो को उतरते हुए देखते………कोई होती जो इस समय उनके बगल में आकर बैठ जाती और उनका हाथ अपने हाथ में ले लेती. उनके दिल की धड़कने उसे छूने लगती. कितने ही सपने, कितनी ही चाहतें आँखों में अचानक तैर जातीं. जिनके कभी पूरा हो पाने की कोई भी संभावना दूर दूर तक नज़र नही आ रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वैसे तो कितने लोग आस पास हैं, पर मेरा कौन है. मैं तो इतना विवश हूँ कि किसी से मन की बात भी नहीं कह सकता. न तो कोई बात करने वाला और न ही सुख दुःख बाँटने वाला....कल यदि मुझे कुछ हो गया तो मेरी लाश को यहीं उठाकर नदी में प्रवाहित कर देंगे ..न तो कोई संस्कार होगा न ही कोई अंत्येष्टि " ऐसे कई विचार मुन्नर के मन में प्रायः उभर आते और मन अनमना हो जाता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन के चार बजने  वाले थे. मुन्नर अपने साधना कक्ष में तैयार हो रहे थे. भोला ने चन्दन घिस कर रख दिया था.  इक्का- दुक्का लोग कुटी पर आने आगे थे. एक-दो घंटे में पूरा जमघट लग जाएगा और कीर्तन शुरू हो जाएगा. उसके पहले बाबा लोगों से मिलने के लिए ओसार में बैठते थे. जो झोपड़ी शुरुआत मे डाली गयी थी अब वहाँ छप्पर का एक बड़ा सा ओसार बन गया था. वहीँ पर बाबा तख्त पर बैठकर माला फेरते रहते और जो लोग आते बाबा का चरण स्पर्श करके सामने बिछी हुयी दरी पर बैठ जाते. जिसको जितनी देर तक बैठना होता, बैठता. फिर उठकर चला जाता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चन्दन लगाते हुए मुन्नर ने देखा दाढ़ी बढ़कर सीने तक आने लगी थी. माथे तक उगे घने बालों में पीछे की ओर कई लटें बन चुकी थीं. चन्दन लगाकर गेरुआ गमछा काँधे पर डाल लिया जिसका दोनों सिरा कमर तक लटक रहा था. एक हाथ में माला की थैली ली, खड़ाऊँ पहना और ओसार की ओर चल दिए. ओसार में सात आठ लोग पहले से ही थे. बाबा को देखकर खड़े हो गए. बारी बारी से पाँव छूने लगे. अभी वे तख्त पर बैठे ही थे कि एक व्यक्ति आकर पैरों पर गिर पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बाबा, बहुत दूर से आया हूँ, मन में एक मुराद लेकर...." कुछ रुक रुक कर वह बोले जा रहा था, “करीब पांच-छह साल पहले मेरा छोटा भाई कहीं चला गया ...” कहते कहते उसकी आँखें भर आयीं और गला रुँधने लगा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओसार में बाहर की अपेक्षा कम प्रकाश था. इसलिए अन्दर आने पर मुन्नर एकदम से पहचान न सके थे. भईया भी पाँच साल में कुछ बूढ़े से लगने लगे थे. सिर के बाल खिचड़ी हो चले थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भईया का मन पहले से ही संतप्त था. सोच में डूबे हुए थे इसलिए मुन्नर के चेहरे की ओर ध्यान से देख नहीं पाए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अजीब सा धर्मसंकट खड़ा हो गया था, गाँव के कुछ लोग भी बैठे थे, बड़ा भाई चरणों में पड़ा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आप धीरज रखिये......" मुन्नर तख्त से उठे. भईया का कंधा पकड़कर उन्हें उठाया और दरी पर बिठा दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भईया को आवाज कुछ जानी पहचानी लगी. दरी पर बैठकर वह मुन्नर की ओर देखने लगे. पाँच साल में कुछ तो परिवर्तन आ ही जाता है. ऊपर से लम्बी दाढी- मूँछ और बालों का लट, माथे पर त्रिपुंड. मुन्नर ने देखा भईया की आँखे उन्हें पहचानने की कोशिश कर रही हैं. कुछ देर तक समझ में न आया कि क्या करें. सब लोग खामोश बैठे हुए थे. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"आप मेरे साथ आईये" मुन्नर उठ कर खड़े हो गए और भईया की ओर इशारा करके बोले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भईया मुन्नर के पीछे पीछे उनके साधना कक्ष में आ गए. ओसार में बैठे लोग विस्मित थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या बात हुयी,  आज तक तो बाबा ने कभी ऐसा नहीं किया था " किसी ने चिंता प्रकट किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कोई बहुत ही गहन समस्या होगी, बाबा देखते ही कष्ट जान लिए. इसलिए ही तो अपने साधना के कमरे में ले गए" दूसरे ने प्रश्न का समाधान किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमरे में पहुँचते ही मुन्नर ने भईया का पैर छुआ. और बोल उठे ' भईया !!!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुन्नर !!!!" भईया की आँखें विस्मय और ख़ुशी से चमक उठीं, आँखों में आँसू छलछला उठे। छोटे भाई को गले से लगा लिया. यह मुन्नर के लिए नया अनुभव था. भईया ने आज तक उन्हें कभी गले नहीं लगाया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों भाई अन्दर तख्त पर बैठ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'माई की आँखों में आँसू आज तक नहीं सूख पाए हैं,  हर रोज सोचती है कि आज तुम वापस लौट आओगे......" कहते कहते भईया का गला भर आया. मुन्नर को भईया के चेहरे पर माई के मन की पीड़ा दीख रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुन्नर! घर वापस चले चलो, हियाँ परदेश में कौन है तुम्हारा......" भईया समझाने लगे थे, " और अभी तुम्हारी उमर ही क्या है...चल के अपनी घर-गृहस्थी बसाओ...यह उमर सन्यासी बनने की तो नहीं है. '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हूँ ..........."  मुन्नर ने सिर हिलाया.  अभी तक मुन्नर को रोज घर गाँव की याद सताती थी और मन में कई बार उठा था कि वापस लौट आयें. पर आज जब भईया ने वापस चलने को कहा तो एक हिचकिचाहट सी मन में उभर आयी. शायद इस कुटी के प्रति मोह उमड़ आया था. यहाँ का सुख और सम्मान दोनों ही मन को बाँधने लगे थे.  कुछ निर्णय न कर पा रहे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम्हारे आने के बाद तो बहुत ही मुश्किल समय आ पड़ा था...." मुन्नर को खामोश देखकर भईया ने बात आगे बढ़ाई,  " एक तरफ घर का राशन ख़त्म होता जा रहा था और दूसरी ओर माई तुम्हारे गम में बीमार रहने लगीं थी. कुछ समझ में नहीं आ रहा था क्या करुँ......"  मुन्नर की आँखें भईया के चहरे पर गडी हुयी थीं. बहुत उत्सुक थे जानने के लिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वो तो बृजमोहन उस समय अवतार बन कर आ गए थे..." भईया आगे कहना शुरू किये. बृजमोहन, उनकी बहन रमला के पति हैं. अच्छा खासा संपन्न परिवार है उनका.  "उस साल के लिए पूरा राशन भिजवा दिए थे." भईया की आँखों में कृतज्ञता उभर आयी थी. मुन्नर ने राहत की साँस ली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सब भगवान की लीला है. वही दुःख के भँवर में धकेलता है और निकलने का रास्ता भी वही बनाता है ....."  थोडा रुक कर बोले. "बृज मोहन की बहुत जान पहचान है. दो साल पहिले, खेत पर बैंक से कर्जा दिलाकर एक ट्रक्टर निकलवा दिए. उससे बहुत राहत हो गयी. दो साल में मुनिया की शादी के लिए पैसे का जुगाड़ हो गया...."     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"........ हाँ तुम्हे यह तो बताये ही नहीं की मुनियाँ की शादी तय कर दी है....इसी साल गर्मी में करेंगे... तारीख अभी पक्की नहीं हुयी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुनियाँ इतनी बड़ी हो गयी है ?..." मुन्नर की आँखों में थोड़ा आश्चर्य सा उभर आया. फिर स्वयं ही बोले, " हाँ तभी ग्यारह बारह साल की थी. पांच छह साल तो बीत गए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भाई, पिछली सारी बातों को बिसार दो और घर वापस चले चलो...अपने गाँव में भी दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ तो हो ही जाएगा." भईया की आवाज बहुत ही सर्द थी...एक अजीब सा दर्द था, "तुम्ही तो मेरे अपने हो, अपना खून हो और भगवान न करे अगर हमें कल कुछ हो जाता है तो तुम्हारे सिवाय कौन देखने वाला है... सब अनाथ हो जायेंगे" कहते कहते भईया की आँखे नम हो गयी. वह नमी मुन्नर की आँखों में भी उतर आयी. भईया का यह रूप पहली बार देख रहे थे.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ बात तो आपकी ठीक है...." भईया की बातों से मुन्नर का मन द्रवित हो उठा था और वापस जाने के लिए सोचने लगे. "पर ऐसे अचानक तो यहाँ से नहीं जा सकते."                    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"विचार कर लो किस तरह से निकलना है....."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी देर तक विचार विमर्श चलता रहा. अंततः यह तय हुआ कि मंगलवार को, आज से चार दिन बाद , भईया पास वाले स्टेशन पर टिकट लेकर इंतजार करेंगे. मुन्नर वहाँ भोर में ही पहुँच जायेंगे और पाँच बजे वाली पैसेंजर से दोनों लोग वापस गाँव चले जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;XXXXXXXXXXXX&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर को खिलाने के बाद रात का खाना खाकर  भोला घर चला गया था. बिजली शाम को ही कट गयी थी. आजकल दिन की पारी चल रही है.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्नर ने लालटेन जलायी और ओसार में आ गए. उनके हाथ में एक खुरपी थी. एक कोने से दरी को हटाया और लालटेन जमीन पर रखकर वहाँ खोदना शुरू किया. पाँच मिनट में ही घडे का मुँह आ गया , जिसे मुन्नर ने दबा रखा था. हाथ डालकर जो भी रूपया पैसा था सब बाहर निकाल लिए और घडे का मुँह बंद कर पुनः उसे मिट्टी से ढँक कर ऊपर की मिट्टी दबा दी और उस पर दरी बिछा दिए.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव के लोग जितना आटा, चावल, दाल इत्यादि लाते थे, वो सब मुन्नर और भोला के खाने से कहीं बहुत अधिक होता था. गाँव का बनिया बाकी का सामन ले जाता था और जरुरत की चीजों जैसे साबुन,  तेल,  प्रसाद , चन्दन, केरोसिन, खाने के अन्य सामान,  के बाद जो पैसा बचता था उसे  मुन्नर को दे देता था. लोग इस बात को जानते भी थे और इतना समझते भी थे कि कुटी का एक खर्च है जिसके लिए कुछ पैसों की जरुरत पड़ती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बाबा ने कितना पैसा जमा कर रखा है यह किसी को नहीं पता था. कभी कुछ लोग प्रसाद के साथ नकद रुपये भी चढाते थे. कुल मिलकर एक अच्छी खासी रकम थी. मुन्नर सोच रहे थे- इन पैसों से दो-तीन पछाहीं भैसें तो खरीदी ही जा सकती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिस्तर पर लेटे, लेकिन रात भर नीद नहीं आयी. आज जल्दी सवेरा भी नहीं हो रहा है. बार बार उठकर दीवार पर लगी घड़ी देखते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह के तीन बजे थे. नदी के साथ की पगडंडियों पर मुन्नर लम्बे लम्बे डग भरते हुए चले जा रहे थे. काँधे पर एक बड़ा सा झोला लटक रहा था. जिसमे तुलसी रामायण का एक गुटका, कुछ अंतर्वस्त्र और गेरुआ धोतियाँ और चार पांच साल में जमा की हुयी नकदी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन इन्ही पगडंडियों पर चलकर आये थे इस गाँव में. तब मन कष्ट के भरा था. विछोह का दुःख था. मन पर अनिश्चितता के बादल छाये हुए थे. कोई मंजिल न थी. कुछ था तो, अनजान रास्ता था, पीड़ा थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज अपने घर लौट रहे थे. "जैसा भी है अपना घर है. माई है, मुनिया और छुटकी है, बाबू तो अब पाँच छः साल का हो गया होगा. जब घर से निकला था तो छः सात महीने का था. इन सबके अलावा कोई और भी आएगा जिसे मैं नितांत अपना कह सकूँगा."&lt;br /&gt;                                                                  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"समाप्त"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1495878999715631673-7761417359869185321?l=kahaniyan-pratap.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/feeds/7761417359869185321/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2009/06/blog-post_29.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/7761417359869185321'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1495878999715631673/posts/default/7761417359869185321'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kahaniyan-pratap.blogspot.com/2009/06/blog-post_29.html' title='राम रचि राखा'/><author><name>प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08654132523168281005</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_FKlnHW05pkA/SUtrfDU6MYI/AAAAAAAAAA4/TP9ixHWw7DI/S220/DSC00425.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry></feed>
